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सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

09 - आने बाली नसलों को - (कविता) - परिजात के फूल

09 - आने बाली नसलों को -(कविता) - मनसा-मोहनी 

( 26/11 के वीरों शहीदों के नाम) 

कुदरत के इस अनमोल खजाने से,

आने वाली नसलों को हम क्‍या देंगे।

एक टूटते धर्म की ज़र-ज़र होती जंजीरें,   

या देश के नाम पर, टूटी-फूटी लकीरे।

वो तो समेटना चाहता है, सीने में,          

समुन्दर की विशालता को। 

उसके अरमान हिमालय से भी, ऊंचे हो शायद।

फिर क्‍यों हम हवाओं में, नफ़रत का जहर भर रहे है,

जिन अंजान-अपरिचित लोगों का खून बहाया जा है।

क्‍या तुम उन्हें जानते हो....है न नहीं जानते।

फिर क्‍यों नफरत है उनसे तुम्‍हें।

मात्र एक झूठा धर्म का, झूठा चश्मा पहन कर

देखने के कारण।  

जो तुम्हें जन्नत में जाने का मार्ग बता रहे है।

क्या वो धर्म का राज जानते है? नहीं।  

क्‍या जिसे मार कर तुम जन्नत का मार्ग बना रहे हो

उन्हें जीने का कोई हक, क्या वो जीवन तुमने दिया नहीं। नहीं है अब।

तब तुम्हें लेने का हक किस परमात्मा के बंदे ने दिया।

वो खुद तो यहां नर्क में धर्म का प्रचार कर रहे है

और तुम्हें जन्नत में भेज रहे है।

क्या प्रेम नहीं है हमारे पास, मौत ही देने को है हमारे पास,      

एक मरघट सा सूनापन, एक धुंध के कुहासे की चादर,               

एक मिटती हुई जीवन की तस्वीर।

वो एक मां की कोमल आंखें देखेगी कैसे ये मंजर, 

वो नाजुक हथेलियां,                 

इन खून से भरी दीवारों को छूकर,

जब पूछेगी कुछ सवाल हमसे,

कब‍, क्‍यों और कैसे?

क्‍या यहीं वसीयत लिखी है हमने,          

इन उठती हुई आ-जानो में, ये नासूर,

फफकते हुए काले साये,        

कैसे सुकडे रहे है,

इस अहं की फैली चादर को,

ये मुल्‍ला, पंडित, पोप मौलवी,             

तुम्हें नहीं दे सकेंगे कोई उत्तर।

कहां ढूंढते है हम उत्तर, नफरत के कुहासों में।         

फिर वो स्‍फटिक-निश्चल आंखें, केवल बंद कर लेगी,              

कैसे करोगे तुम उनका सामना।

वो फैली हुई बाहे, जड़ बन कर सिमट जाएंगी,

उसकी वो मूक वाणी,

सिसकियाँ नहीं बनेगी,

पहले ही घूँट जाएगी।

और फिर छलक जायेगा

वो दूध खून बन कर इस धरा पर।

परंतु नहीं बुझेगी प्यास....तुम्हारी फिर भी।

रुको और ठहरो।

झांको अपने अंतस में एक बार।

बस ही है उत्तर केवल होने का।

(परिजात के फूल)

मनसा-मोहनी दसघरा 


 

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