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गुरुवार, 7 मई 2026

52-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-52

(सदमा - उपन्यास

श्री और श्रीमति मल्होत्रा ने होटल में जाकर कुछ देर विश्राम किया। सुबह मन पर जो बोझ था वह अब हल्का हो गया था। श्रीमति राजेश्वरी मल्होत्रा न उठ कर चाय का आर्डर दिया। श्याम के समय तब तक भी श्री मल्होत्रा गहरी नींद सो रहे थे। चाय पीने के बाद दोनों तैयार हो गये। कि क्या बात करेंगे, श्री करकरे जी। तब श्री मति मल्होत्रा ने कहा की मेरी एक बात समझ में नहीं आ रही की नेहालता शादी के बाद यहां रहेगी तो हमारा क्या होगा। और वह यहां कैसे रह सकती है। दूसरा अगर सोम प्रकाश को मना भी ले तो नानी तो ये अपना पूस्तेनी मकान छोड़ कर शहर में रहना नहीं चाहेगी। तब क्या किया जा सकता। तब श्री मल्होत्रा जी ने कहा की देखा उन लोगों का जीवन है। हम अपना जीवन जी चूके है, अब अपने जीवन का बोझ बच्चों पर न डाला जाये तो ही अच्छा होगा। अगर वो वहां रहते है तो भी ठीक और यहां रहते है तो भी ठीक। परंतु इस बात से श्रीमति राजेश्वरी मल्होत्रा को समझ में नहीं आ रहा था। कि इस मकान में कैसे रह सकती है नेहालता। तब श्री मल्होत्रा ने कहां की आपकी लड़की करीब दो साल से इसी मकान में रह रही है। माना तब बीमार थी परंतु अब तो वह स्वास्थ्य है। वह करीब छ: आठ माह से यहां अपनी मर्जी से खुश-खुश रह रही है। अपने उसके चेहरे पर जरा सी भी शिकन शिकायत देखी आपने। कैसे वह नानी को मां तरह से लड़ कर रही थी। और नानी भी उसे ह्रदय का टूकड़ा समझ कर प्रेम करती सी दिख रही थी। प्रेम की प्यास अगर जग जाये तो फिर धन-दौलत, धन-वैभव कोई महत्व नहीं रखते।

प्रेम में बड़ी ताकत है, राजे राजेश्वरी जी। हम जहां रहते है वह स्थान लगभग मृत प्रायः: हो गये है। वहां की हवा पानी, और मिट्टी सब शुष्क हो गई। परंतु प्रकृति की गोद में आज भी संवेदना है। मैं यहां पर आ कर जीवन में जितना प्रसन्न हूं, उसे ह्रदय से महसूस कर रहा हूं। उसे शब्दों में कह नहीं सकता और न ही आप को बता नहीं सकता हूं। मेरी हमेशा एकांत में जाने की तमन्ना थी। परंतु साहास नहीं जुटा पाया। सो नेहालता के कारण तब यहां आया तो लगा की अब जीवन के अंतिम क्षण में प्रकृति की कुछ और चाहती है। एक स्वर्णिम अवसर दे रही है। देखो तुम्हें एक बात बता देता हूं।

अगर ये लोग शहर में नहीं रहना चाहते है तो दबाव मत डालना। हम अपना बचा कूचा व्यवसाय भी समेट लेंगे। और जीवन के दो महीने यहां आकर नेहालता के पास रहेंगे। और दो महीने इसे शहर बुला लेंगे। बाकी एक दो महीने किसी तीर्थ पर चले जाया करेंगे। अब जीवन ही कितना बचा है। इतना धन हमारे पास है। मैंने एक निर्णय लिया है आप को बतला रहा हूं आप इसके लिए ना मत करना। क्योंकि देखों जो आज हमारा है, वह कल हमारी बेटी का ही तो है। आज या कल को लम्बा क्यों किया जाये। फिर अगर शहर में शादी करते तो कितना अधिक धन लूटाते। और वह सब किसी के भी काम नहीं आता। एक रात के लिए लाखों रूपये स्वाहा कर दो। ये कहां की अक्ल मंदी है।

पहले तो एक बात करते है, पाँच लाख रूपये नानी को दे कर इनका मकान बनवा देते है। क्योंकि हम अपनी बेटी के लिए मकान बनवा रहे है। इसलिए उस के अंदर हमारी बेटी और हमारे दामाद ही तो रहेंगे। और दूसरा हमारे पैसे पर उसका पूरा हक है। या तो वह शहर में रहने को तैयार हो जायेगें फिर इस सब के करने की जरूर नहीं होगी। अगर नहीं माने तो उन्हें हमारी ये शर्त माननी ही पड़ेगी।

ये बाते चल ही रही थी कि इतनी देर में ड्राइवर राम दास ने आकर घंटी बजाई। कमरा खोला कर श्री मति मल्होत्रा ने कहां की राम दास बस अभी हम आते है। पाँच मिनट में। और सच ही वह दोनों तैयार तो थे, बस श्री मल्होत्रा जी ने आपन ब्रीफकेस उठाया और चल दिये। श्री मति मल्होत्रा ने इस बच होटल के कमरे का ताला लगा कर गाड़ी में जाकर बैठ गये। बस पाँच-दस मिनट का रास्ता तो था ही। इतना पता होता तो वह तो घूमते हुए ही आ जाते नाहक बेचारे राम दास को परेशान किया। श्री करकरे जी की कोठी में सुंदर आँगन था। उस एक बगिया भी कहा जा सकता है। उसमें भांति-भांति के पुष्प खिले थे। देखने में ही कितनी खुली और रमणीय लग रही थी, करकरे जी की कोठी। सुंदर तो थी ही परंतु करकरे जी की कोठी को आस पास पर दृश्य ने उसे और भी सुंदर बना दिया था। कोठी के सामने ही बहुत बड़ा सा जो लॉन था। वहीं पर खड़े हो कर श्री और श्रीमति करकरे जी उन लोगों का इंतजार कर रहे थे। वहां पर खिले फूल पौधे ने वहां के वातावरण को और भी मधुर-मुग्ध बना दिया था। ड्राइवर राम दास श्री और श्रीमति मल्होत्रा को उतार कर सीधा नानी के घर की और चल दिया। गाडी जब नानी के मकान पर पहुंची तो देखा की सोम प्रकाश, पेंटल और हरिप्रसाद तो पहले ही चले गये थे, करकरे की कोठी की और। नेहालता और नानी राम दास का इंतजार कर रही थी। मकान का ताला लगा कर वह भी कार में आकर बैठ गई। जब वह वहां करकरे जी कोठी में पहुंची तो देख की सब उनका इंतजार कर रहे थे। तब नेहालता ने सोम प्रकाश को कहां की आप लोगों इतनी जल्दी कैसे पहुंच गए। तब क्या सोनी जी का मकान इतना पास है हमारे मकान के। तब सब हंसने लगे की आप गोल-गोल चक्कर लगाती रह गई सड़क पर। और हम सीधा एक उंची चढ़ाई पार कर के यहां पहुंच गए। सोम प्रकाश ने कहां की मैं तो हमेशा स्कूल या बाजार भी पैदल यही से तो जाता हूं। कितना बड़ा है हमारा ये ऊटी शहर मुट्ठी भर ही तो है। आपके शहर में तो अगर नानी चली जाये तो दंग रह जायेगी। और नानी समझ गई की उनके जाने की बात हो रही है। तब वह घबरा गई की ना बेटा अब इस उम्र मैं ये स्थान छोड़ कर कहीं नहीं जाना चाहती।

चाय तैयार थी सब ने चाय पी और लॉन में बैठ गये। हवा में अभी ठंडक थी। परंतु तन मन को अच्छी लग रही थी। श्री करकरे जी अब काफी बूढ़े लग रहे थे। इन कुछ ही दिनों में बीमारी के कारण उनका शरीर काफी गिर गया। तब उन्होंने ही कहां की अब तो बेटी नेहालता हमारे ऊटी की ही हो गई है तो आप इसे हमें ही दे दीजिए। तब थोड़ी देर के लिए एक दम से शांति छा गई श्री करकरे जी को लगा की उन्होंने कोई आच्छादित बात कह दी। वह इधर उधर देखने लगे। तभी नेहा लता की मम्मी ने कहां की करकरे जी बेटी तो पराई होती है। परंतु मन करता है इतने पास तो हो की महीने दो महीने में उस से मिल सके। अब आप देखिए की हजारों मील दूर। मिलने आना क्या इतना सरल और सहज है क्या। परंतु आप सब की बात सर आंखों पर। जिसका भाग्य जहां लिखा है उसका विरोध नहीं करना चाहिए। महात्मा जी से बात कर में समझ गई। हम इस के लिए तैयार है।

तभी करकरे जी कहने लगे की अब मेरी उम्र भी होती जा रही है। स्कूल का काम मुझसे सम्हलता नहीं। इसलिए मैं उस सब से अवकाश लेना चाहता हूं। और बेटी नेहालता की अंग्रेजी अच्छी है। तब क्यों ने नेहा बेटी हमारे स्कूल को सम्हाल ले। मैं जानता हूं मैं एक छोटे मुख और बड़ी बात कर रहा हूं। परंतु जब बेटी को यहां ऊटी में रहना ही है तो उस सब का उपयोग भी सही समय और स्थान पर होगा। मैं नेहा लता को स्कूल का प्रधानाचार्य और आंतरिक निदेशक मंडल का सदस्य बनाना चाहता हूं। इस बात को सून कर सोम प्रकाश और पेंटल काफी खुश हुए। परंतु नेहालता काफी बैचेन हो गई। अचानक ये सब घटते देख कर नेहा लता को विश्वास नहीं हो रहा था। उसने दबी आवाज में कहां की अंकल मुझे अनुभव नहीं है। आप सोम प्रकाश को बना देते तो अच्छा होता। परंतु करकरे जी के साथ सोनी जी ने भी कहां की नहीं हम अपने ऊटी की बहु को कुछ तो ऐसा उपहार दे जिससे वह हमारे ऊटी में कैद हो जाये। इस बात पर सब बहुत खुश थे। पास घूम रहे हरिप्रसाद ने भी भौंक कर इस बात का स्वागत किया। इस बात से सब बहुत प्रसन्न थे, इस बात की तो किसी को कल्पना भी नहीं की थी। तब करकरे जी ने कहां की बेटा आप अब मेरे सपनों के स्कूल को एक अमानत की तरह से सम्हाल कर रखना और मैं जानता हूं जिस मेहनत से मैंने इसे खड़ा किया है। शिक्षा के प्रचार को मध्यम बना कर तुम इसे इससे भी आगे ले जा सकती हो।

अब की बार बोलने की बारी थी श्री के. के. मल्होत्रा की तब उन्होंने कहना शुरू किया-इस बात की हमें भी बहुत खुशी होगी बेटी यहां अपनी शिक्षा का सद् उपयोग करेगी। परंतु आप को कुछ बाते हमारी भी माननी होंगी। तब नानी ने कहां की आप की सब बातें सर आंखों पर। तब श्रीमति मल्होत्रा जी ने कहना शुरू किया पहली बात तो ये की साल में कम से दो बार इन को हमारे यहां शहर में रहने आना होगा। क्योंकि अब तो स्कूल का कार्य मिल गया सो गर्मी की छुट्टियां ये दोनों आराम से आ सकते है। एक दशहरे की छुट्टियां में जब स्कूल से अवकाश मिल जाये तो ये हमारे साथ रहेंगे तो हमें भी कुछ अच्छा लगेगा। इस सब के लिए सब ने हाँ भर दी की आप का भी तो अब इन पर पूरा अधिकार है। और दूसरी बात श्री के. के. मल्होत्रा जी कहीं। आप हमारी इस बात का गलत अर्थ मत करना। क्योंकि हमारे पास जो भी है वह हमारे साथ हमारी बेटी और दामाद दोनों का है। सो एक तो हम यहां पर नेहा के मकान को बनवाने के लिए कुछ पैसे देना चाहते है। तभी सोम प्रकाश ने कहां की इस की क्या जरूरत है। और बीच में नेहालता बोल रही थी हां पिता जी...। इस सब के लिए श्री मल्होत्रा जी ने कहां की मैं आप सब को पहले ही बोल चूका हूं। और उन्होंने पाँच लाख का चेक नानी की गोद में रख दिया।

नानी बेचारी भोली भाली क्या जाने इन चेक आदि को तब वह चेक को सर माथे पर लगा कर बेटी नेहालता की गोद में रख दिया और कहने लगी की ये तो आप बेटी को दे तो अच्छा होगा। मुझे तो पढ़ना तक नहीं आता। तब श्रीमति मल्होत्रा ने कहां की जा तो बेटी के पास ही रहा है। परंतु आप के पावन हाथों से होकर ये और भी पवित्र हो उठा है। हम जानते है, और देख भी रहे है। हमारी बेटी इस मकान में भी रह सकती है, वह यहां रह ही नहीं रही परंतु अति प्रसन्न है। इतनी प्रसन्न तो वह हमारे घर में भी नहीं थी। परंतु फिर भी भगवान का दिया जब सब है तो क्यों ने इस का उपयोग किया जाये। जगह तो नानी के पास काफी है। उसे थोड़ा और रमणीय बना दिया जाये तो उस में क्या खराबी है। कल को जब हम दोनों को ऊटी आना हुआ तो क्या हमें भी होटल में रहना क्या ठीक होगा। जब छुट्टियों में यहां आया करेंगे तो बेटी के साथ हम भी रह सकते। इस बात के आगे सब की जबान बंद हो गई। क्योंकि बात तो सही थी। अब इतनी दूर से आकर होटल में तो रहा नहीं जा सकता। तब उसी अपने पूस्तेनी मकान को थोड़ा और सुंदर बनाने में क्या खराबी है। फिर इस बात के लिए सब खुश हो गए। और एक चेक उन्होंने स्कूल के नाम का श्री करकरे जी को दिया की हमारी और से इसे आप शुभ कार्य के लिए लगाये। क्योंकि मैं देख रहा था की अब धीरे-धीरे स्कूल छोटा पड़ता जा रहा है। हम पास की जमीन ले कर उसमें खेल मैदान बना सकते है। और स्कूल के लिए कुछ नये कमरे भी बनवा सकते है।

इस बात की किसी को उम्मीद नहीं था। अब बोला भी क्या जा सकता है। तो अब हमें ये बतलाओ की बारात ले कर आप कब आ रहे है। अब इस बात के लिए सब एक दूसरे का मुख देख रहे थे। बारात भला यहां कौन भीड़ है जो बरात में जाना चाहेगा। इस चुप्पी को देख का श्री मति मल्होत्रा ने कहां की कम से कम रिति रिवाज से तो बेटी को बिदा कर लेने दो। इस बात के लिए तो सब तैयार थे। परंतु हजारों मील दूर बारात कैसे जा सकती है गिनती के चार-छ: आदमी ही यहां से जा सकते है। फिर यहाँ इतने यार दोस्त रिश्तेदार सोम प्रकाश के हैं भी नहीं। परंतु इस विषय पर कोई कुछ नहीं बोला। बस बोले तो श्री करकरे जी की जैसी आपकी मर्जी। आपकी बात हमारी सर आंखों पर आप वहां पर जा कर पंडित से शुभ महूरत निकलवा लिजिए। कम से कम छ: महीने तो आप को और इंतजार करना होगा। क्योंकि एक तो अभी बरसात है। दूसरा यहां काम का दबाव भी कुछ अधिक है। इस सब के लिए खुशी-खुशी श्री और श्रीमति मल्होत्रा जी हां भर दी। और आज सब ने बहुत प्रेम से एक साथ भोजन कर के उस माहोल को और भी सुंदर बना दिया। आज जो घटा वह अभूतपूर्व था आज खून के रिश्ते की बात नहीं चल रही थी। बात तो चल रही थी परंतु वह थी अंतस के प्रेम और मन के द्वार खुलने की। सब इस तरह से बाते कर रहे थे मानो सब एक परिवार का ही हिस्सा हो।

आज का दिन बहुत शुभ और सुंदर गुजरा मानो अब आगे आने वाला पथ प्रकाश मय होगा। अंधकार और कनिष्ठ कंटक का समय तो अभी बहुत पीछे रह गया। इस प्रेम प्रभा में ही परमात्मा का वास होता है।

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