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बुधवार, 10 जून 2026

21- ज्योति विनिंदक रूप-(कविता) - (ओशो की मधुशाला)

21- ज्योति विनिंदक रूप-(कविता)


अंतर के दर्पण में मैंने..

ज्योति-विनिंदक रूप उतारा,

पर असीम को सीमित करना..

सहज नहीं इससे मैं हारा;

निर्वासन, असफल रेखाएं,

हाथ उठा कर गगन निहारें;

चित्र किसी का प्राण अजाने..

मेरा ही आकार बन गया!

आड़ी तिरछी रेखाओं से

एक नया रूप आकार बन गया।

नयनों में तुम ही तो बसता,

सांसों में एहसास तुम्हारा

तुमको जब से देखा प्रीतम

जीवन बना मधुमास हमारा

तेरी हलकी सी एक छुअन से

अहिल्या सा उधार हो गया।

इन चरणों में प्रीतम प्यारे

ये लोहा था फिर भी तैर गया।

कैसे कर दूं तुझपर प्रीतम

जीवन तर्पण जीवन अर्पण

हर रूप तुम लगते प्यारा।

कैसे कह दूं वो प्राण आधार

तुमने क्यों दिल छला हमारा।

नयनों में तुम, श्वासों में तुम

तुम समरस बन गया जीवन सारा। 

(ओशो की मधुशाला)

मनसा-मोहनी दसघरा 

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