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सोमवार, 24 अगस्त 2026

49 - दूर डाल पर बैठ पपीहा-(कविता) - ओशो की मधुशाला

49 - दूर डाल पर बैठ पपीहा-(कविता) मनसा-मोहनी 

दूर डाल पर बैठ पपीहा, रहा पिहूं-पिहूं पुकार,

तेरे रूप को देखा जब से, बैठी हूं दिल हार,

मधुर तुम्हारे बेना लागे, होते दिल के पार।

 

कितनी छोटी नाव जीवन की, कितनी  लम्‍बी झील।

कितने सपनों को खोल रही, उलझी जीवन की रील।।

 

जर-जर मिट्टी की काया है, पीछे रेगिस्तान।

कोने-कातर से लटक रहे है, फटे पुराने प्राण।

क्‍या कर लूं, क्‍या न कर लूं, हूं दो दिन का मेहमान।

छिटक रहा जीवन का प्‍याला, अब खाली इसको जान।

कितना चला जब मुड़कर देखा, कोस, फर्लांग, या मील।।

कितनी छोटी नाव जीवन की, कितनी  लम्‍बी झील।

कितने सपनों को खोल रही उलझी जीवन की रील...

 

 

जीवन तपिश की धूप में, मिली नहीं  कहीं छांव।

घर अपना था जिस जगह, दिखा नहीं  वो गांव।

शूल, धूल और भूल  डगर पे, नंगे   मेरे   पांव।

आँख खोल कर देखा जग को, पाती नहीं है थाँव।

थोथे दंभ, और अहंकार है, झूठी जीवन की शील।।

कितनी छोटी नाव जीवन की, कितनी  लम्‍बी झील।

कितने सपनों को खोल रही उलझी जीवन की रील....

 

सूखे पत्‍ते, और टूटी  डंडी, ये कैसा मधुमास।

रात धुएं की छांव ढूँढ़ती, कोई  दूर नहीं पास।

अपने अपनों को ही छलते, किसकी करें अब आस।

अब ऐसे  खेतों को कहां ढूंढें,जहां बो सके विश्वास।

अपनी छवि को तरस गई, सूखी जीवन की झील।।

 

कितनी छोटी नाव जीवन की, कितनी  लम्‍बी झील।

कितने सपनों को खोल रही उलझी जीवन की रील.......

(ओशो की मधुशाला)
मनसा - मोहनी दसघरा) 

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