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गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

11-जीवन का आधार बन गया—(कविता) - परिजात के फूल

11-जीवन का आधार बन गया—(कविता) - मनसा-मोहनी 

कोई कल तक था  

एक अपरिचित सा.....

वो आज घने इस कोहरे में

पथ जीवन का आधार बन गया।

बांध रही एकाकी मन को..

यादों की जंजीर सुनहली,

निंदयारी पलकों ने खोई..

सपनों की जागीर रुपहली;

रोम-रोम पर एक अनजानी,

मीठी-सी सिहरन का पहरा,

दृष्टि-परिधि में भी न रहा जो..

सांसों का आगार बन गया।

कोई कल था जो अपरिचित सा।

वो जीवन का आधार बन गया।

 

आश्वासन के शब्द-पखेरू..

वचनों की शाकों पर चहके,

अभिलाषा के कमल वनों में..

सुरभित धीरज पद-पद महके;

उग आए हैं बोल प्यार के,

भोले-भोले प्रणय-अजिर में;

नाम किसी का अनजाने ही..

गीतों का आभार बन गया।

कोई कल था जो अपरिचित सा।

जीवन का आधार बन गया।

 

 

 

अंतर के दर्पण में मैंने..

ज्योति-विनिंदक रूप उतारा,

पर असीम को सीमित करना..

सहज नहीं इससे मैं हारा;

निर्वसन, असफल रेखाएं,

हाथ उठा कर गगन निहारें;

चित्र किसी का प्राण अजाने..

मेरा ही आकार बन गया!...

कोई कल था जो अपरिचित सा..

जीवन का आधार बन गया।

(परिजात के फूल)-कविता

मनसा-मोहनी दसघरा 

 

 


 

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