(सदमा - उपन्यास)
घर
पहुंचते-पहुंचते उन्हें संध्या हो गई थी। सब लोग सारा दिन के घर से निकले हुए थे इसलिए
थक भी बहुत गये थे। नानी और नेहालता ने पहले कपड़े बदले फिर दोनों ने मिल कर खाना
बनाया। उसके बाद सब ने बड़े चाव से खाना खाया और दिन भर की कुछ बाते की। फिर यही
निर्णय लिया गया की अब सोम प्रसाद को दवाई दे कर सब को सो जाना चाहिए। सुबह उठ कर
जब नेहा लता और सोम प्रकाश घूमने के लिए निकले तो आज दोनों का बदन दर्द कर रहा था।
इसलिए वह अधिक दूर तक नहीं जा सके तब सोम प्रकाश ने नेहालता को कहा की आज इतना ही घूमना
काफी है। मैं आज से बीच के छोटे रास्ते से पेदल ही स्कूल चला जाया करूंगा। पहले भी
तो इसी रास्ते से होकर ही तो जाता था। एक पंथ दो काम हो जायेंगे। ये बात सून कर
नेहा लता को बहुत अच्छा लगा। क्योंकि अब वह एकांत से भय नहीं खा रहा था। लोगों से
मिलने की झिझक भी उसकी कम होती जा रही थी। ये बात नानी को भी बहुत अच्छी लगी परंतु
ये सब हरि प्रसाद को नहीं भा रही थी। जब सुबह तैयार हो कर सोम प्रकाश स्कूल की और
गया तो नेहा लता उसे कुछ दूर तक छोड़ने के लिए साथ गई। तब साथ में हरि प्रसाद भी सोम
प्रकाश के साथ चल दिया। परंतु अब आगे जा कर उसे समझ नहीं आ रहा था की अब किस के
साथ चले। क्योंकि सोम प्रकाश आगे पगडंडी पर स्कूल की और चला गया और नेहा लता वहीं
खडी रह गई। ये बेचारे हरिप्रसाद की समझ के बहार की बात थी। फिर वह पहले भाग कर सोम
प्रकाश के पास पहुंचा। तब सोम प्रकाश ने उसे प्रेम करते हुए कहां की तुझे को तो
नेहा लता के साथ जाना चाहिए क्योंकि वह अकेली है। और मानो वह सारी बात समझ कर नेहा
लता के पास वापस आ कर पूछ हिला कर कह रहा हो की चलो अब घर मैं आ गया।
उधर बम्बई में नेहा लता के माता पिता परेशान थी। वह बार-बार यहां आने की जिद्द करते और नेहा लता किसी न किसी बहाने से उन्हें टाल देती थी। परंतु इस बार उन्होंने निर्णय कर लिया अब उसकी एक बात नहीं सुननी। और वह पेंटल के दफ्तर चले गए। पेंटल ने जब उन्हें दफ्तर में देखा तो उन्हें बड़ा अचरज हुआ। अरे आप मुझे बतला देते। तब श्री जे. के. मल्होत्रा ने कहां की चलो आप से मिल ही लेते है। नेहा लता की कोई खोज खबर आप के पास तो होगी ही। पेंटल थोड़ा झेप गए। की वह काम में इतना व्यस्त रहे है की समय ही नहीं निकाल पा रहे है।
तब श्री जे. के. मल्होत्रा ने कहां की अब हम से नहीं रहा जाता है बेटा। देखो तुम चल सकते हो तो ठीक है नहीं तो हम अगले महीने ऊटी जा रहे है। आप भी साथ चलते तो अच्छा होता। इतनी देर में चाय आ गई दोनो ने चाय पी और उसके बाद अपने बॉस के पास चले गए। साथ में श्री जे. के. मल्होत्रा भी उनके थे। उनके बॉस ने खड़े होकर श्री जे. के. मल्होत्रा को हाथ मिला कर स्वागतम किया। और कहां की बैठ जाये। आप चाय या काफी लेंगे तब पेंटल ने कहां की हम चाय पी चूके है सर। ये काफी देर से आये हुए है। आपको मैंने बतलाया था की मुझे ऊटी जाना है, उसी सिलसिले में ये आये है। कुछ नाराज भी है की आप मेरी लड़की की सुध-बुध नहीं ले रहे। अब इस बात से पेंटल के बॉस जरा उलझन में पड़ गये की अब क्या किया जा सकता है।तब श्री जे. के.
मल्होत्रा ने कहां की किसी भी तरह से एक हफ्ते का समय इन्हें दे दि दीजिए। तब
बेचारा बॉस क्या करता और उन्होंने कहां मैं आप को मना तो मैं नहीं कर सकता। परंतु
यहां काम में....। तब पेंटल ने कहां की मैं शुक्रवार को चला जाता हूं और अगले
रविवार को आ जाता हूं सोम वार को काम पर आ जाऊंगा। और देर तक काम कर दिया करूंगा।
और इस सब से माहोल में कुछ राहत मिल की बात बन गई। आज बुद्ध वार था बस कल का ही
दिन बीच में था। सो अब श्री जे. के. मल्होत्रा ने बॉस को धन्यवाद देते हुए कहां की
आप की बहुत मेहरबानी साहब। हम बहुत बैचेन है। बेटी को करीब आठ महीने हो गए है देखे
हुए। तब दोनों खुशी-खुशी बहार आये और श्री जे. के. मल्होत्रा ने कहां की मैं
शुक्रवार की टिकट ले लेता हूं। और यहीं निर्णय लिया गया की देर रात शुक्रवार की
जहाज की टिकट ले लता हूं और आप को फोन पर बतला देता हूं। श्री जे. के. मल्होत्रा इस
बात से उन्हें कुछ राहत मिली। टिकट लेने जब गए तो उन्हें पता चला की जहाज दिन के 12-30
के बाद रात 10 बजे जाता है। तब श्री जे. के. मल्होत्रा ने फोन से पेंटल जी को पूछा
की अब क्या किया जाये। तब पेंटल ने कहां की रात का जहाज ही ठीक रहेगा। क्योंकि
हमें अगले दिन सुबह तीन-चार बजे तक चेन्नई पहुंच जायेगें,
उसके बाद भी कम से कम पाँच या छ: घंटे का सफर तय करना है। तब यहीं
कहा गया की आप रात 10 बजे की टिकट ले लिजिए। और मैं आपको एयरपोर्ट पर ही मिल
जाऊंगा।
अब क्या किया जाये।
तब उसने सोचा की क्यों शुक्रवार को सुबह सब कपड़े एक बैग में डाल सामान तैयार कर
पेंटल दफ्तर में चला गया ताकि अगर लेट से आये भी तो अधिक समय न लगे पैकिंग में। साथ
और यहां का काम जल्दी खत्म कर के श्याम तीन बजे तक घर के लिए निकल लिया। वह उस दिन
जल्दी दफ्तर आ जायेगा। और उसने लगभग अपना सारा काम खत्म कर दिया। श्याम शुक्रवार
को वह टाइम से एयरपोर्ट पर पहुंच गया। तीनों ने अंदर जाकर अपना सामान जमा कराया और
सूचना का इंतजार करने लगे। कुछ ही देर में घोषणा हो गई की मद्रास (चेन्नई) जाने
वाले यात्री गेट नम्बर दो से प्रवेश कर सकते है। हां इस बीच पेंटल ने सोनी को फोन
कर बतला दिया की अचानक श्री जे. के. मल्होत्रा जी दफ्तर में आये और यहां आने को
प्रोग्राम बन गया है। हम शनिवार की श्याम तक ऊटी पहुंच जायेगें। तब सोनी बहुत खुशी
थी की क्यों ने नेहा लता के माता पिता उनके ही घर पर रूके। तब पेंटल ने कहां की इस
बात का निर्णय तो वही ले सकते है।
इस खबर को सून कर
सोनी बहुत प्रसन्न थी। वह भी कब से इंतजार कर रही थी की पेंटल आये और वह उससे मिले
और वह इस बच्चे का मुख पहली बार देखें। जब ये बात नेहा लता को पता चली तो वह घबरा
गई। उस की इस घबराहट को देख कर नानी और सोम प्रकाश ने पूछा क्या बात है। तब उसने
सारी बात बतलाई तो वह कहने लगे तो इसमें घबराने की क्या बात है। उन्हें आने दो वह आप
को देखना चाहते है। आप से मिलना चाहते है। कितने दिन हो गए आप को यहां आये हुए
उनका मन कर रहा होगा की देखे उनकी लड़की कैसी है। परंतु बेटी क्या वो हमारे इस
छोटे घर में रह सकेंगे। नानी ने ये बात नेहा लता को कही। तब नेहा लता जानती थी
अपनी मां का स्वभाव वह किसी भी हालत में इस तरह के मकान में नहीं रहने वाली। और
दूसरा उन्होंने उसे भी अगर देख लिया की मैं इस मकान में रहती हूं, तो बहुत क्रोधी होगी। तब नेहा लता ने कहां की कोई बात नहीं कुछ दिन के
लिए ही तो आ रहे है किसी होटल में रूक जायेगें।
नानी को कुछ अजीब
लग रहा था। की अपना घर होते हुए क्या होटल में रूकना ठीक होगा। नहीं तो सोनी के घर
पर ही रूक जाये कहो तो उससे बात करूं। तब नेहा ने नानी के कंधे को प्रेम से पकड़
कर कहा की ना नानी आप चिंता ने करें इन सब बातों की उन्हें आदत डालनी होगी। और रूकने
को तो रूक सकते है। ये उनकी मर्जी की बात है। परंतु साथ में पेंटल भी आ रहे है। सोम
प्रकाश ने कहां की तब तो ठीक है। मुझे कुछ डर सा लग रहा है। नेहा लता का हाथ पकड़
कर सोम प्रकाश ने कहां की तुम मुझे छोड़ कर तो नहीं चली जाओगी। नेहा मैं यहां
बिलकुल अकेला हो जाता है। तुम्हारे बिना सब सूना-सूना लगता है। तुम्हारे रहते हुए
मुझे किसी बात की चिंता नहीं रहती। तब नेहा लता ने कहां की आप क्यों घबराते है।
मैं आपके साथ हूं। एक दम से नानी ने जब सोम प्रकाश का चेहरा देखा तो वह घबरा गई। सोम
प्रकाश एक दम से बाल बुद्धि सा व्यवहार कर रहा था। जैसे एक कमजोर वृक्ष की उंचाई
को देख तो हम रहे होते है परंतु वह उस लकड़ी के सहारे खड़ा हुआ है। अगर अभी वह
उसके सहारे की लकड़ी हटा दि जाये तो वह पल भर भी खड़ा नहीं हो सकता। ये बात नानी
को भी दिखलाई दे रही थी। क्याकि ये बात नेहा लता को भी दिख रही थी। अपनी बात की
जिज्ञासा के लिए नेहा लता की और देखते हुए नानी ने कहां की बेटा देखो ये तुम्हारे
बिना तो कैसा अबोध हो जायेगा। मुझे तो हमेशा डर लगता है। परंतु बेटी अभी कुछ दिन
और तुम इसके साथ रहो तो इसे अधिक सम्हलने का समय मिल जायेगा। परंतु तुम भी तो
कितने दिन से यहां पर हो। देखना अब की बार जरूर तुम्हें तुम्हारे माता पिता
तुम्हें ले जायेगें।
मैं उनके चरण पकड़
कर दया की भीख मांगूंगी की कुछ दिन नेहा लता को और यहां रहने दो। तब नेहा लता ने
नानी की आंखों से आंसू पोंछते हुए कहां की नानी आप क्यों घबराती हो, मैं अब कहीं नहीं जाने वाली आपका ये घर अब मेरा स्वर्ग है। एक दिन सब
लड़कियों को अपने माता पिता का घर छोड़ना होता है। सो सब के भाग्य में माता पिता
का दिया सूख जरूरी नहीं होता। अपना भी भाग्य होता है बच्चे का मैं इतने दिन में ये
महसूस कर रही हूं। की जो जीवन मैंने अभी कुछ महीनों में या सालों में जाना है उसकी
मैं कल्पना तक नहीं कर सकती थी। प्रेम क्या होता है। ये मेरे लिए एक किताबी ज्ञान
था। असल में जिसे हम प्रेम कहते है वह आदमी की जरूरत है। परंतु सच प्रेम कुछ और ही
होता है। उसका फूल जब किसी के ह्रदय में खिलता है। तो आप परमात्मा के अति करीब
होते है। सोम प्रकाश और आपके प्रेम के कारण आज जैसा मैं महसूस कर रही हूं। इसे
शब्दों में नहीं बाधा जा सकता है।
और नेहा लता ने
नानी को अपने ह्रदय से लगा लिया। बेटा मैं क्या भाग्य लेकर आई थी इस का तो पता
नहीं परंतु आज मैं आपने आप को दुनियां को सबसे भाग्यशाली मां महसूस कर रही हूं। एक
जमाने में मुझे लगता था, मेरा ये बांझ का जीवन अंत
में न जाने कैसा होगा। और तुम्हारे नाना के मर जाने के बाद तो एक दम से अकेली हो
गई थी। तब तो सोम प्रकाश भी बहुत छोटा था। जीवन मैं आगे कुछ न दिखाई देता था और न
ही कोई मार्ग नजर आ रहा था। बस उस पर किसी तरह से चलते रहते थे, किसी तरह से और तब सोम प्रकाश तुझे लेकर यहां आया तो मुझे पहले तो बहुत
ही डर लगा। परंतु तुझ से धीरे-धीरे मेरा भी लगाव बढ़ता गया। आज सोचती हूं मैं बांझ
होकर भी कितनी भाग्य शाली हूं। बेटा अगर मेरा एक बेटा हो जाता या बेटी हो जाती तो क्या
तुम दोनो इस सरलता से जीवन में प्रवेश कर सकते थे।
सच प्रकृति की गोद
में क्या छिपा होता है, हम नहीं जानते है। क्या एक
बीज में उस वृक्ष का आकार प्रकार दिखलाई देता है। किसी को कहो की इस बीज को देख कर
बतलाओं की कितना विशाल बनेगा कितने फल लगेंगे। और कितनी पक्षी इस पर बैठ कर गीत
गायेंगे। नहीं पता चलेगा ना। तब हमारे
कर्म भी एक बीच रूप में होते है। जिसे आज हम नहीं समझ सकते अगर हम प्रकृति या
परमात्मा की मर्जी समझ कर ग्रहण कर लेते है, तो वह कभी गलत
नहीं होता। गलत अगर होता है निर्णय हमारे मन से लिया हुआ। जैसे आज कल के बच्चे जिस
को प्रेम समझते है, किसी की सूरत को देख कर, या धन को देख कर, सुख सुविधा को देख कर। तो क्या वह
व्यक्ति प्रेम को समझ पा रहा है। अब तुम ही ले लो तुम्हारे जीवन की वह दुर्घटना
क्या उस समय तुम सकारात्मक सोच सकती थी। नहीं लगता परमात्मा ने क्या किया। ठीक इसी
तरह से सोम प्रकाश जब तुम्हें यहां पर लेकर आया तो क्या हम सोच सकते थे। की इतना
दूर जाकर जब यह वृक्ष बनेगा तो इसकी छांव कितनी सितल होगी इस पर कितने मधुर फूल-फल
लगेंगे। अब जीवन की पूर्णता ही मुझे उस सूख में डूबो रही है। एक परितृप्ति अपने
में समेटे की जीवन में कुछ और पाने की कामना नहीं बची। अगर में कल मर भी जाऊं तो
परमात्मा ने इतना सब दिया है की उसका धन्यवाद किन शब्दों में कैसे दूं। पता नहीं
बेटा जब से तु आई है जीवन में सरलता शीतलता फेल रही है। अब तो जब ध्यान में बैठती
हूं तो कैसा लगता है तुझे बता नहीं सकती हूं। कैसे अपने मन का विचारों का और शरीर
का भार ही नहीं लगता। पता नहीं मैं ठीक बतला रही हूं या नहीं।
परंतु तुम ने मुझे
जो ध्यान की विधि बतला दी है वह मुझे बहुत रास भी आ रही है। सच कहूं तो बेटी अब जीवन
में रस झर रहा है। पूजा पाठ करती थी परंतु उसमें उतना डूब नहीं पाती थी। कहीं मन
तैरता ही रहता था। कभी कोई लहर उठ जाती कभी कोई दूसरी। तब उन उथल-पुथल के कारण मन
में बैचेनी छा जाती थी। परंतु बेटी तू मेरी बेटी भी है,
और मेरी धर्म की गुरु भी है। जो मार्ग दिखलाये वही तो गुरु होता है।
क्या तुम्हारे बिना ये सब मैं जान पाती कभी नहीं। और बेटी आज मैं बांझ होने पर भी
एक बेटे और एक बेटी की मां भी हूं। शायद इसीलिए मुझे परमात्मा ने औलाद नहीं दी। और
ये ही मेरा कर्म मेरा तप है। की मैं गर्व से पैदा नहीं कर सकती परंतु यशोदा की तरह
तो प्रेम कर ही सकती हूं। जब सोम प्रकाश मेरे घर आया था, तब
मुझे पहली बार इस बात का विश्वास हो गया था।
और अब तो मैं
साफ-साफ देख रही हूं की ये सब परमात्मा की मर्जी है। हमारी मर्जी तो कितनी क्षुद्र
बातों में अटकी रह जाती है। हम तो इतने उंची और दूर की सोच भी नहीं सकते।
नानी की आज इस तरह
से बाते सून कर नेहा लता को झटका लगा। वह नानी को सरल तो समझती थी, परंतु इतनी सुलझी हुई थी। नानी की कही बात को जो उसे भी समझने में सालो लग
गये। वह बात नानी ने बिना किसी के बतलाये किसे किस सरलता के सब जान लिया। आज वह
नानी की आंखें और उसका चेहरा देख रही थी। की क्या रूप है नानी का इस उम्र में भी
क्या उर्जा से सराबोर है। अब उसे समझ में आया की उसे यहां रहना क्या इतना मधुर और
अच्छा क्यों लग रहा है। सोम प्रकाश से भी एक खिंचाव है,
परंतु ह्रदय की भाषा उसके तार तो नानी के साथ जूड़े है। सोम प्रकाश की तरंगे तो इस
समय सकारात्मक नहीं है। वह तो नेहा लता को बैचेन कर देती है। परंतु नानी का संग एक
शीतल छांव देता है। कितनी अद्भुत है ये प्रकृति मुक भाषा में कितनी मधुर गान गाती
सी दिखती है। परंतु हम कहां उसकी मंद्र तानो को सून पाते है। कहां उन में आनंद
उत्सव मना पाते है। हम तो मन के ही ईद गिर्द घुमते रहते है। और फिर मिट जाते है।

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