कुल पेज दृश्य

शुक्रवार, 8 मई 2026

53-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

  अध्याय-52

(सदमा - उपन्यास

ज जीवन के लिए एक नई सुबह लेकर आई थी। ये सुबह देखने में तो एक समान दिख रही थी। सूर्य उसी प्रकार उदय हुआ। अंबर में लालिमा छाई पक्षियों ने गीत गाये। पेड़ पौधे नाचे झूमें। बहार जो सब के लिए तो एक समान थी। परंतु इस का प्रभाव इसका अवतरण सब पर भिन्न-भिन्न प्रकार से हुआ था। श्री करकरे और सोनी के लिए एक राहत थी, की अब स्कूल का काम घर परिवार का ही आदमी देख सकेगा। श्री और श्रीमति मल्होत्रा जी को चिंता थी की इतनी दूर लड़की अकेली कैसे रहेगी। उन्हें राहत मिली जब अपनी लड़की को वहां एक परिवार की तरह से घुला मिला पाया। परंतु वह यह देख कर अति प्रसन्न व आश्चर्य चकित थी की नेहा लता तो एक दम से पूरी तरह से बदल गई थी। वो जिस नेहा लता को 23 साल से जानते थे वह तो यहां कही उसे दिखलाई ही नहीं दे रही थी। ये वैज्ञानिक शोध का विषय है जिसे हम मस्तिष्क से कभी समझ नहीं सकते। इसके लिए अचेतन के भावों की गहराई में जाना होगा। पहले उसके लिए सारे पुरवा ग्रह विज्ञान को छोड़ने होंगे। तब उस गहरी की परछाई को महसूस कर सकेंगे।

क्यों एक समान दिखने वाले जीव या प्राणी कहां एक समान होते है। न तो वे बाहर से न ही अंदर से समान । हम एक प्रतिछवि अपने चित पर रख कर निर्णय लेते है। हम उसी प्रतिछवि पर उसे उकेरना चाहते है। और चित की बेहोशी के कारण हमें वह एक जैसे लगने भी लग जाते है। उन्होंने जिस नेहालता को यहां पर देखा है, वह समय और स्थान पा कर अपनी पूर्णता की और अग्रसर हो रही है। जैसे वही बीज या वृक्ष जब किसी दूसरे स्थान पर बोया जाये तो वह स्थान भी उस पर अपना प्रभाव डालता है। वही सब यहां आने पर नेहा लता के साथ घटा था। जिसे जब उसके माता-पिता ने देखा तो उनके लिए वह उनकी नेहालता थी ही नहीं वह तो एक दम नई नेहालता थी।

अब आदमी अगर बाहर से देखेगा तो उसे सोम प्रकाश के व्यवहार में अब कोई बीमारी नहीं लग रही थी। जब तक की वह बोलने या बात करने न लगेगा। क्योंकि अंजान आदमियों से अब भी उसका चित घबराता था। ये स्थिति तो प्रत्येक मनुष्य के साथ होती है, परंतु मात्रा का ही तो भेद सहता है। इसी शायद हम उसे देख परख नहीं पाते। धीरे-धीरे वह अनुपात जैसे बदलेगा वह समाज और आस पास के वातावरण में घुल मिल सकता है। परंतु अंदर उसके अंतस में वह जो उसके जन्म की प्यास थी। वह विरह की एक तड़प, प्रेम की पीड़ा, एक भय, एक असुरक्षा जो विछोह का डर वह जन्मों से चित जो सहता चला आ रहा था। वह अब विश्वास का एक झरोखा पा कर अल्हादित हो रहा था। जैसे एक मुरझाये एक प्यासे पौधे को जल की चार बूंदे भी प्राप्त हुई की वह लहलहा उठता है। वह बाहर से देखने हमें वह पौधा जरूर बीमार सी प्रतीत तो होती है। परंतु वह होता नहीं, एक प्यास एक तृप्ति की चाह उसे उदास कर रही थी। परंतु बाहर से देखने में ऐसा प्रतीत हो रहा होता है की पौधा मुरझा कुम्हला गया है, शायद बीमार है। जीवन एक प्रवाह है। उसमें अवरोध के अनेक कारण हो सकते है। न जाने ये जीवन की गंगा कब से अविरल चली आ रही है। जीवन जहां से प्रगट होता दिखाई देता है, क्या सच में वहीं से इसकी शुरू आत है। परंतु अगर हम गहरे से देखें तो वहीं से इसकी शुरू आत नहीं है। असल में इसका न और ही है और न छोर ही नजर आता है, एक अंत हीन या है जीवन जो अनंत है। तभी तो मानव मन में एक बैचेनी एक अतृप्ति झलकती सी दिखलाई देती है। शायद इसी सब के रहते इसका नाम जीवन है। जीवन कोई पूर्णता नहीं है, वह घटनाओं का एक समूह है। जिसे भिन्न कर के हम कभी नहीं समझ सकते। इसलिए विज्ञान शायद उसे कभी नहीं समझ सके क्योंकि वह तोड़ता ही चला जाता है। तब तक हम इसे संपूर्णता से प्रकाशवान नहीं कर लेते तब तक बार-बार हमें इस सब से होकर गुजरना ही होता है।

सब के मन में एक प्रसन्नता के साथ-साथ कुछ चिंता भी थी। सबसे अधिक चिंता तो नानी जी को थी। की शादी जो इतनी दूर हो रही है तब वह इतनी दूर कैसे जा सकती इस उम्र में। बात में सच्चाई भी थी। परंतु आस पास सब लोग उसे एक साहास एक हिम्मत दे रहे थे। की नहीं नानी ये मोका जीवन में कितनों के आता है। आज अगर नेहालता और सोम प्रकाश के जीवन में ये सब जो घट रहा है। उसकी आप साक्षी रहेगी तो प्रकृति भी अति प्रसन्न होगी। वही आस पास जो इनके आपका प्रेम झरेगा वही तो काल में जा कर आशीष बन जाता है।

करकरे और श्री मति करकरे यानि सोनी को कोई खास चिंता नहीं थी। परंतु उसके जीवन में तो पहले ही एक आनंद का झरोखा खुल ही गया था। एक तो संतान का जीवन में आना फिर सोम प्रकाश का ठीक होना और श्री और श्रीमति मलोहत्रा का शादी के लिए मान जाना। जो लगभग असम्भव सा दिख रहा था। वह कार्य न जाने किस शक्ति से इतना सहज और सरलता से घट गया। शायद प्रेम शुद्धता चाहता है। तब ही वह पूर्णता प्राप्त कर सकता है। मेरे देख अगर किसी की चाहत में कोई खोट नहीं है, उसकी चाहत में कोई वासना नहीं है, तो उन दोनो का मिलन परमात्म का मिलन है। इसलिए किसी न ठीक ही कहा है।

‘’जुदा तो होते है खोट जिनकी चाहत में हो।‘’

वरना भला प्रकृति को क्या पड़ी है बीच में अवरोध बन कर खड़ी हो। फिर वह खोट किसी नजदीकी की या उनके प्यारे की भी हो सकती है।

दूसरा श्री करकरे और श्री मल्होत्रा जी के बीच में बैठ कर चर्चा हुई की अब आगे क्या किया जाये। क्या हम सगाई आदि की रस्म यहीं पर क्यों न कर दे। अंगूठी एक दूसरे को पहनवा देते है। एक काम तो पक्का होगा। तब सोनी और पेंटल भी इस बात के लिए तैयार थे। परंतु जब यही बात नेहा लता से पूछी गई तो उसने इस सब के लिए एक दम से इंकार कर दिया। की पापा आप नाहक इस दिखावे में पड़ रहे हो। तब श्री करकरे जी ने कहा की बेटी हमारा तो ये विचार है। आप की क्या राय है।

तब नेहालता ने कहां की पिता जी ये तो सब दिखावा और मन को तसल्ली देने की लिए जो रीति रिवाज परिपाटी,आचरण, रूढ़िवादी,परम्परा बनाये गये है। ये सब समाज के सामने किसी बंधन को स्वीकार कर लेने जैसे है। इसमें एक बंधन से कहीं अधिक भय होता है। ताकि कल अगर कुछ गलत हो तो समाज उस के साथ खड़ा हो सकते। परंतु क्या आज सब ऐसा है की कोई पती-पत्नी खुश नहीं है तो समाज उनके बीच आ कर उन्हें समझा सकेगा। ये बाते प्रचान में होती थी जिन की उस समय जरूरत भी। परंतु आज इन सब को कोई भी औचत्य नहीं रहा है। ये हमारा मिलन, न तो समाज ने तैयार किया है, तब हम इस सब से दूर रहना चाहते है। हम अपनी चाहत को खूला छोड़ देते है। हमारा जो मिलन है कई जन्मों का बंधन है। हम न तो अंगूठी को न ही सगाई आदि को महत्व देना चाहते है। फिर पापा जी मैं तो चाहूंगी की आप शादी भी बहुत ही सादगी से ही करें। क्योंकि आप यहां का माहोल तो देख ही रहे है। कितने लोग यहां से इतनी दूर हमारे वहां पर आ सकते है। पाँच या सात तब इतनी बरबादी या दिखावे की कोई भी जरूरत नहीं है। अगर मेरे भाग्य में सुख या दूख लिखा है तो समाज के सहयोग की मुझे जरूरत नहीं है। उसे में स्वयं ही स्वीकार करना चाहूंगी।

इस बात को सून कर सोनी और उनके पति करकरे जी नेहालता से बहुत प्रभावित हुए। की आज के बच्चे साहास रखते है। अपना एक नया मार्ग वो चून रहे है। उस पर चलने में संकल्प के साथ साहास भी चाहिए। तब करकरे जी ने कहां की बेटा नेहालता में आपकी बात से सहमत हूं। और उन्होंने श्री मल्होत्रा जी को देखते हुए कहां देखो साहब नेहा लता बहुत समझदार है। अब ये जो कह रही है उसे समझने की कोशिश करें। हां तो बेटी आप क्या कह रही थी।

तब नेहालता ने कहां की अंकल हम जिस स्थिति या हालात में मिलने है, वह कोई मानव के निर्मित संस्कारों की जरूरत नहीं है। तब बाकी आप सब समझदार ही है। मैं बस इतना चाहती हूं की ये सब जो भी हो सरलता और सादगी के साथ हो। कोई आडंबर या दिखावा न हो। पापा ने मकान के लिए जो चेक दिया है। वह हमारे सर आंखों पर। उसे हम ह्रदय से स्वीकार करते है। क्योंकि वह हमारे जीवन में एक सुविधा देगा। कल को पिता जी या माता जी जब यहां पर आये तो हमारे साथ ही रहे।

तब सब ने इस बात को स्वीकार कर लिया की नेहालता एक दम से ठीक कह रही है। सो मकान की मरम्मत को कितना समय लग सकता है। अभी स्कूल की छूटियों में भी कम से कम छ: महीने का समय है। क्या इस बीच सब तैयारी हो जायेगी। यहां की तैयारी की चिंता है, वहां तो शहर में कोई अधिक चिंता नहीं है। अगर आपके पास पैसा है तो सब सुख सुविधा आसानी से मिल जायेगी।

तब पेंटल ने कहां की अंकल हम क्यों ने महात्मा जी से ही शादी का शुभ महूरत या तिथि निकलवा लेते है। महीना हम उन्हें अपनी मर्जी का बतला सकते है। क्योंकि मुझे कल जाना भी है। क्योंकि अंकल (मल्होत्रा) जी की और देख कर कहां की ये सब जानते है। आफिस से कितनी मुश्किल से मुझे अवकाश मिला था। अगर ये नहीं होते तो मुझे छूटी नहीं मिलती। इसलिए पहले जन्म पत्री ले कर महात्मा जी से क्यों न मिल लिया जाये।

तब करकरे जी ने कहां की ये सब एक दम से ठीक है। तब आप हमारे यहां कम से कम एक सप्ताह तो रूके ऊटी के नजारे आप दोनो को दिखलाते है। पेंटल जी वहां से जाने के बाद होटल का कमरा खली कर इन का सामान यहां ले आना। अब इतना सब होने के बाद बेचारे श्री और श्रीमति मल्होत्रा जी क्या कहा सकते थे।

महात्मा जी से बात करने पर उन्होंने कहां की मई महीने की 21 तारीख शुभ है। उसके बाद तो फिर देव ठनी ग्यास का समय निकलता है। जो दीपावली के बाद आता है। अब निर्णय आप के हाथ में जो आपको सुविधा जनक लगे। सब काम बहुत आसानी से हो रहे थे। होटल का कमरा खाली कर के श्री और श्रीमति का सामान करकरे जी के बंगले में ले आया गया। अगले दिन एक खुशी अपने ह्रदय में समेटे पेंटल जी ने जाने की तैयारी कर ली। तब यहीं निर्णय लिया गया की सुबह ड्राइवर राम दास पेंटल जी को चेन्नई हवाई अड़े तक छोड़ने के लिए चला जायेगा। तब तक श्री और श्रीमति जी शादी की आगे की बात चित करकरे और श्रीमति करकरे यानि की सोनी के साथ बैठ कर विस्तार से चर्चा कर लेंगे।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें