कारे बदरा अब तो आजा, मेरी आंख के मोती ले जा।
दूर कहीं जब
मिले पिहरवा, उन चरणों में जाकर गहजा।।
प्रीतम को यूं जाकर कहना, घुटन
भरा ये हो गया जीना।
तपती धरा को अब है सहना, मानो
फूलों का है गहना।
दुख पीड़ा को पीते जाना, यूं दिल
के टुकड़े सीते रहना।
नासूर बना जख्म जिगर का, किन यादों से अब है सीना।
बादल बरसे जीवन तरसे, एक बूंद
स्वाती की तो देजा।
प्यास बुझी है तरूँ-धरा की, मेरी
आँख से मोती लेजा।।
आने को अब है मेरा प्रीतम, मेरा
ये मन मुझको कहता।
बंजर धरती जलता ये मन, बार-बार
ये दिल अब सहता।
दूर कहीं जब पपीहा गाता, मेरी आस
को और जगता।
गर्द की यादों के धुँधले में, तेरी
याद की छवि बनाता।
जीतना भी तू मुझे सताता, मिलन
प्यास की और बढ़ता।
आस बंधी है, यूं सांस रुकी है,
चुपके से कानों में कहजा।
हिचकी आई तेरी याद की, जीवन से
यूं आकर कहजा।
कारे बदरा अब तो आजा, मेरी आंख
के मोती ले जा।!
दूर कहीं जब मिले पिहरवा, उन
चरणों में जाकर गहजा।।
(ओशो की मधुशाला)
मनसा-मोहनी दसघरा
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