देखना पीपल अब तू नहीं बच सकेगा?
सुकोमल सा था तब ये सब सहा तूने,
करता रहा तू तपती दोपहरी का
किस साहस से सामना,
रिमझिम बरसते सावन में
गर्दन तक डूब कर भी तू नहीं डरा।
जिस दिन वो दीवार बन रही थी,
नहीं घुटा तेरा दम और न ही तू मरा।
हां मैंने देखा डरा-सहमा कुछ तू जरूर था
पर साहस तेरा कम न हुआ
और ठिठुरती ठिठुरन में भी
तुम कांपा सुकड़ पर नहीं मिटा
कितने पैरो ने तुझे रौंदा,
जानवरों ने तुझे नोचा
बच्चों ने तुझे तोड़ा-मरोड़ा
तू नहीं मरा, सहा सब तुम
किस संकल्प और धैर्य से
फिर साहास लेकर खड़ा हो कर
चलता पड़ा तू अपने ही पथ पर
किसी अंजान अनंत पथ की यात्रा पर
एक विशाल वृक्ष होने की ओर
पर देखना अब तू नहीं बच सकेगा।
क्यों मैं ऐसा कहता हूं?
क्योंकि, जिस रहा पर तूं चला है
उस पर है अहंकार विभेद
अब तूं नहीं बच सकेगा
तुझे आज मरना होगा
अपने ही भगतों के हाथों
वह पूजा के नाम पर जला देंगे
दबा देंगे, और खत्म कर देंगे
तुझे जड़ मूल से।
अपनी पूजा, आस्था थोप देंगे तुझ
पर
और बना देंगे तुझे देवता
आज उस देवत्व का देना होगा तुझे कर्ज
गीता में भगवान कृष्ण ने तुझे दिया था
जो मान सम्मान वहीं आज तेरा ले डूबेगा
घोट देंगे दम तेरा-छिन लेंगे स्वतंत्रता तेरी।
हर लेंगे तेरी आजादी-उन्माद को
केवल झूठे पाप-पुण्य के नाम से
बलि चढ़ जायेगी तेरी
और तू कुछ नहीं कर सकेगा
क्योंकि वो तेरे आपने भक्त है?
देखना तू अब नहीं बचेगा
क्योंकि अब तू पूजा जाने लगा है?
ओर देवत्व भाव दे विशिष्ट कर
देंगे तेरे आपने ही तुझको।
और मैं केवल निहारता रहूंगा
तुझे.....असहाय सा।
(ओशो की मधुशाला)
मनसा-मोहनी दसघरा
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