चल पड़ा पथ पर पथिक जब, कौन बाधा
रोकेगी उसको।
कौन डगर भटका सकेगी, दृढ़ हो विश्वास जिसको।।
देख राहों की रूकावट, तू न थकना, तू न रुकना।
आंधी और तूफान से भी, तू न डरना, न सहमना।
डिगने लगे विश्वास जब भी,
प्रेम पथ
के बीज बोना।
देख सागर की तू गर्जन,
लहर बन कर विलीन होना।
छुपा सकेगी क्या काली रातें, हो
सुबह की आस जिसको।
कौन डगर भटका
सकेगी, दृढ़ हो विश्वास जिसको।।
छीन ले पीड़ा जगत की, तू उन्हें नव साहस देना।
पथ पर रुके जब कोई मुसाफिर,फिर
नया उन्माद भरना।
मंज़िले जब खो रही हो,
प्रेम पथ की ठौर देना।
शुष्क होते उन लबों को,
जिन्दगी का गीत देना।
कौन राह रोकेगी उनको,
कौन उनको झुका सकेगी, पूर्णता
जिसमें समाई,
अटल हो विश्वास
जिसको।
कौन डगर भटका
सकेगी,
(ओशो की मधुशाला)
मनसा-मोहनी दसघरा
दृढ़ हो विश्वास जिसको।
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