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गुरुवार, 9 जुलाई 2026

34 - मौनी बाबा प्रधान मंत्री - (कविता) - ओशो की मधुशाला

34 - मौनी बाबा प्रधान मंत्री (कविता)

एक थे प्रधान मंत्री जी

उसे मौनी बाबा कहे तो

अतिशयोक्ति नहीं होगी

कोई पुकारता रहा, पर नहीं सूना।

दर्द बहता रहा,परंतु नहीं सहलाया।

लोग तड़पते रहे, मन ये सहता रहा।

दिल रोता रहा, भाव सुकड़ते रहे,

पीड़ा चिरती रही, आहें चीत्कार चीखती रही

वासना सिमटती रही, असमत लूटती रही।

देह नुचती  रही। आहें भरते रहे

तुम देखते ही रहे, न हिले ना डूले

मानों कोई मूर्ति मौन निहार रही है।

परंतु हाड़ मांस का एक पुतला

वो कोई त्यागी तपस्वी नहीं था। 

फिर भी इस पीड़ा से जरा नहीं हिला

वह सोता रहा आंखें खोले हुए

और तुम्हारा इस तरह से होना है,

क्या वहीं था केवल होने का एक प्रधान का ढंग  ....

मौनी बाबा बन कर यूं ताकते रहना

न सहला सके किसी के जख्मों को

ये कैसा साधु भाव है तुम्हारा

सब कुछ होते को देखना कहां से जाना

किसी तमाशे देखने वाले की तरह दूर खड़े

एक अपरिचित सा अंजान बनकर

बाँटता रहा....उस मौन की हदें,

जो बहुत पीड़ा दाई थी।

अपना ही बना रहा पराया।

क्‍या शरीर के साथ-साथ

ह्रदय भी पत्‍थर हो गया है तुम्हारा....

देश के प्रधान....मंत्री....मन....मो... नी जी।

तुम महान हो?

मनसा-मोहिनी दसघरा 

(ओशो की मधुशाला) 


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