एक बार फिर जीवन के
दिन फिर एक बार ढल
कर पूर्ण हुआ, परंतु
मैं तो अधूरा था और अधूरा ही रहा।
सिसकती सुरमई रात रह गई
किसी लूटी हुई परित्याज्य सी
हमने कुछ यादों को बुलाते रहे
आवाज दे आ जाओ हमारे पास
उन्होंने एक बार तो हमें देखा
परंतु वह तो ऐसे चली गई
जैसे हमें जानती ही नहीं
कितने युगों से जो थी हमारे साथ
इस अंतिम समय पर कैसे भूल गई
कैसी बे पीर है उसके ह्रदय में
कितनी निष्ठुर है उसकी आंखों
किसी पाषाण सी।
हमने लाख मनाया
उन सुहाने पलों की याद दिलाई
और कहा कुछ पल तो रुको
बस और नहीं केवल
दिल का हाल ही तो है कहना
हमने कितने शब्द पिरोए
कितनी यादों के हार बनाये।
बस तेरी याद में जीना चाहा।
पर तुमने तो पल भर में....ही
कहां!
हां तुम अच्छा लिखते हो।
तुम्हारी भाव भी अति सुंदर है
तुम अच्छा सोच लेते हो।
उन भाव को कविता कहकर
ये सब सून कर मैं कैसा लूटा सा
ठगा सा खड़ा रह गया।
मैं तो गाता था केवल तुम्हारे गीत
मेरी कविता केवल होती थी
मेरे ह्रदय की पुकार
य सब सून कर
कितना मेरा दिल दुखा
दिल का हाल कहना चाहा।
किया था दर्द दिल का बखान
वो तो ऐसे हंसी
उसके कोमल होठों हिले तक नहीं
और फुसफुसाई कि मैं सब जानती हूं
फिर क्यों उसे दोहरा रहे हो
हर बार...हर जन्म में
वो भी अंतिम समय पर।
और तुम गाते हो.....
तुम गीत बनो में राग, तुम तान
बनो में साज।
हम तुम ऐसे घुले-मिले, जग जान
सके न राज।
सुंदर मधुबन सजा हुआ इत, दूब सजी
है पांव में।
पथ पर आकर फूल सजाता, प्रीतम
तुम्हारे पांव में।।
(ओशो की मधुशाला)
मनसा-मोहनी दसघरा
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