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गुरुवार, 9 जुलाई 2026

35 - जीवन संध्या—(कविता) - ओशो की मधुशाला

 35 - जीवन संध्या—(कविता)

रोज श्याम,

जीवन संध्या आकर,

कानों में कुछ कहकर,

कुछ पुकार कर,

कुछ हंस कर,

कुछ फूस फूसा कर

कुछ गुन-गुना कर।

पूछती है,    

अब धुंधलका छाया तब छाया।

क्‍या तुमने अपना दीप जलाया।    

फिर कब जलाओगे।

या यूं ही बैठे रह जाओगे।

या फिर एक बार यूँ ही

बुझे हुए ही मर जाओगे।

देख आगे  है  कितना  शाह  अँधेरा।

ये जीवन नहीं है बस विचारों का ही पहरा।

या इसके बाद भी जीवन में आता है कोई सवेरा।

यूँ ना सो आंखें खोल, देख यह तो है रैन बसेरा।

करो पराक्रम, इस अंधकार में तुम,

वही कहीं चेतना का  बीज छुपा है।

शायद  काले   शाह पटल  पर।

एक दिन वो जुगनू सा चमक उठे।।

यूँ थकते नहीं है मुसाफिर,

देखो लाखों ने मंजिल पाई है।

अगर थके गिरे तो क्या,

पहले जिन्दगी योंही तो गँवाई है!

कम से कम तुम चले तो सही,

क्‍या हुआ मंजिल की फिक्र नहीं।

जीवन एक गति ही सही।

क्‍या मुरदों को भी भ्रम होता है, जीने का।

मत उलझ इस शस्त्रों में

नहीं मर्म है इनमें धर्म का।

क्या जीवन का भ्रम

मात्र उठते गिरते सीने का है।

या चलती फिरती

लाशों को तुम देते हो एक नाम।

और फिर बना लेते हो कोई संबंध,

या उठते गिरते सीने का अहसास।

या केवल आती जाती हुई  श्वास।

या दिल की धड़कन का

थोड़ा सा स्पंदन।

का नाम ही जीवन है।

या कुछ और  भी है।

अन्वेषण के लिए...

बस एक कदम और इस तमस के बाद,

फिर छटेगा ये कोहरे का घना बादल।

आगे मूक निःशब्द, आनंद ही आनंद।

इस पल का तू हो ले,

बस अपने को मिटा ले।

बाकी होने का तू नाहक भ्रम है पाले

या फिर जीवन संध्‍या पर बैठ कर रो ले।

या पल में जीवन की उलझी

गुत्थी को सुलझा लें।।

मनसा-मोहिनी दसघरा 

(ओशो की मधुशाला)

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