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शनिवार, 18 सितंबर 2010

संभोग से समाधि की और—7

संभोग : अहं-शून्‍यता की झलक—3

     क्‍या आपने कभी सोचा है? आप किसी आदमी का नाम भूल सकते है, जाति भूल सकते है। चेहरा भूल सकते है? अगर मैं आप से मिलूं या मुझे आप मिलें तो मैं सब भूल सकता हूं—कि आपका नाम क्‍या था,आपका चेहरा क्‍या था, आपकी जाति क्‍या थी, उम्र क्‍या थी आप किस पद पर थे—सब भूल सकते है। लेकिन कभी आपको ख्‍याल आया कि आप यह भूल सके है कि जिस से आप मिले थे वह आदमी था या औरत?  कभी आप भूल सकते है इस बात को कि जिससे आप मिले थे, वह पुरूष है या स्‍त्री? नहीं यह बात आप कभी नहीं भूल सके होगें। क्‍या लेकिन? जब सारी बातें भूल जाती है तो यह क्‍यों नहीं भूलता?

संभोग से समाधि की ओर—6

संभोग : अहं-शून्‍यता की झलक—2
    
     एक पौधा पूरी चेष्‍टा कर रहा है—नये बीज उत्पन्न करने की, एक पौधा  के सारे प्राण,सारा रस , नये बीज इकट्ठे करने, जन्‍म नें की चेष्‍टा कर रहा है। एक पक्षी  क्‍या कर रहा है। एक पशु क्‍या कर रहा है।
      अगर हम सारी प्रकृति में खोजने जायें तो हम पायेंगे, सारी प्रकृति में एक ही, एक ही क्रिया जोर से प्राणों को घेर कर चल रही है। और वह क्रिया है सतत-सृजन की क्रिया। वह क्रिया है ‘’क्रिएशन’’ की क्रिया। वह क्रिया है जीवन को पुनरुज्जीवित, नये-नये रूपों में जीवन देने की क्रिया। फूल बीज को संभाल रहे है, फल बीज को संभाल रहे है। बीज क्‍या करेगा? बीज फिर पौधा बनेगा। फिर फल बनेगा।

संभोग से समाधि की ओर—5

संभोग: अहं-शून्‍यता की झलक—1

    
मेरे प्रिय आत्‍मन,
      एक सुबह, अभी सूरज भी निकलन हीं था। और एक मांझी नदी के किनारे पहुंच गया था। उसका पैर किसी चीज से टकरा गया। झुककर उसने देखा। पत्‍थरों से भरा हुआ एक झोला पडा था। उसने अपना जाल किनारे पर रख दिया,वह सुबह के सूरज के उगने की प्रतीक्षा करने लगा। सूरज ऊग आया,वह अपना जाल फेंके और मछलियाँ पकड़े। वह जो झोला उसे पडा हुआ मिला था, जिसमें पत्‍थर थे। वह एक-एक पत्‍थर निकालकर शांत नदी में फेंकने लगा। सुबह के सन्‍नाटे में उन पत्‍थरों के गिरने की छपाक की आवाज उसे बड़ी मधुर लग रही थी। उस पत्‍थर से बनी लहरे उसे मुग्‍ध कर रही थी। वह एक-एक कर के पत्‍थर फेंकता रहा।

संभोग से समाधि की ओर—4

संभोग : परमात्‍मा की सृजन-ऊर्जा—4

      वह दूसरा सूत्र है मनुष्‍य का यह भाव कि मैं हूं’, ‘’ईगो’’, उसका अहंकार, कि मैं हूं। बुरे लोग तो कहते है कि मैं हूं। अच्‍छे लोग और जोर से कहते है ‘’मैं हूं’’—और मुझे स्‍वर्ग जाना है और मोक्ष जाना है और मुझे यह करना है और मुझे वह करना है। कि मैं हूं—वह ‘’मैं’’ खड़ा है वहां भीतर।
      और जिस आदमी का ‘’मैं’’ जितना मजबूत होगा, उतनी ही उस आदमी की सामर्थ्‍य दूसरे से संयुक्त हो जाने की कम होती है। क्‍योंकि ‘’मैं’’ एक दीवान है, एक घोषणा है कि ‘’मैं हूं’’। मैं की घोषणा कह देती है; तुम-तुम हो, मैं-मैं हूं। दोनों के बीच फासला है। फिर मैं कितना ही प्रेम करूं और आपको अपनी छाती से लगा लूं, लेकिन फिर भी  हम दो है। छातियां कितनी ही निकट आ जायें। फिर भी बीच मैं फासला है—मैं से तुम तक का। तुम-तुम हो मैं-मैं ही हूं। इसलिए निकटता अनुभव भी निकट नहीं ला पाते। शरीर पास बैठ जाते है। आदमी दूर बने रहते है। जब तक भीतर ‘’मैं’’ बैठा हुआ है, तब तक ‘’दूसरे’’ का भाव नष्‍ट नहीं होता।

संभोग से समाधि की और—3

संभोग : परमात्‍मा की सृजन उर्जा—3

     रामानुज एक गांव से गुजर रहे थे। एक आदमी ने आकर कहा कि मुझे परमात्‍मा को पाना है। तो उन्‍होंने कहां कि तूने कभी किसी से प्रेम किया है? उस आदमी ने कहा की इस झंझट में कभी पडा ही नहीं। प्रेम वगैरह की झंझट में नहीं पडा। मुझे तो परमात्‍मा का खोजना है।
      रामानुज ने कहा: तूने झंझट ही नहीं की प्रेम की? उसने कहा, मैं बिलकुल सच कहता हूं आपसे।

संभोग से समाधि की और—02

संभोग : परमात्‍मा की सृजन उर्जा—2
      लेकिन आदमी ने जो-जो निसर्ग के ऊपर इंजीनियरिंग की है, जो-जो उसने अपने अपनी यांत्रिक धारणाओं को ठोकने की और बिठाने की कोशिश की है, उससे गंगाए रूक  गयी है। जगह-जगह अवरूद्ध हो गयी है। और फिर आदमी को दोष दिया जा रहा है। किसी बीज को दोष देने की जरूरत नहीं है। अगर वह पौधा न बन पाया, तो हम कहेंगे कि जमीन नहीं मिली होगी ठीक से, पानी नहीं मिला होगा ठीक से। सूरज की रोशनी नहीं मिली होगी ठीक से।
      लेकिन आदमी के जीवन में खिल न पाये फूल प्रेम का तो हम कहते है कि तुम हो जिम्‍मेदार। और कोई नहीं कहता कि भूमि नहीं मिली होगी, पानी नहीं मिला होगा ठीक से, सूरज की रोशनी नहीं मिली होगी ठीक से। इस लिए वह आदमी का पौधा अवरूद्ध हो गया, विकसित नहीं हो पाया, फूल तक नहीं पहुंच पाया।

संभोग से समाधि की ओर—01

संभोग : परमात्‍मा की सृजन-ऊर्जा—(1)
प्रवचन-01 

      मेरे प्रिय आत्‍मन,
प्रेम क्‍या है?
      जीना और जानना तो आसान है, लेकिन कहना बहुत कठिन है। जैसे कोई मछली से पूछे कि सागर क्‍या है? तो मछली कह सकती है, यह है सागर, यह रहा चारों और , वही है। लेकिन कोई पूछे कि कहो क्‍या है, बताओ मत, तो बहुत कठिन हो जायेगा मछली को। आदमी के जीवन में जो भी श्रेष्‍ठ है, सुन्‍दर है, और सत्‍य है; उसे जिया जा सकता है, जाना जा सकता है। हुआ जा सकता है। लेकिन कहना बहुत कठिन बहुत मुश्‍किल है।
      और दुर्घटना और दुर्भाग्‍य यह है कि जिसमें जिया जाना चाहिए, जिसमें हुआ जाना चाहिए, उसके संबंध में मनुष्‍य जाति पाँच छह हजार साल से केवल बातें कर रही है। प्रेम की बात चल रही है, प्रेम के गीत गाये जा रहे है। प्रेम के भजन गाये जा रहे है। और प्रेम मनुष्‍य के जीवन में कोई स्‍थान नहीं है।

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

संतों की अपनी-अपनी कमजोरी—

धर्म गुरूओं को एक सम्‍मेलन हुआ। देश से बड़े-बड़े धर्म गुरु आये, सब ने अपने-अपने ज्ञान की गहराई ऊँचाइयों, के बखान किये, सभी श्रोता गण मंत्र मुग्‍ध हो धन्‍य हो गये। इसके बाद चारों एक कमरे में आराम करने चले गये। वहां उनकी चर्चा चली। अब सब सम्‍मेलन तो निपट गया था। वह बैठ कर आपस में चर्चा करने लगे। ऊंची बातें तो हो चुकी, नकली बातें तो हो चुकी। अब वे बैठ कर असली गप-शप कर रहे है।

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

सात शरीर और सात चक्र— ( 6 )

छठवाँ शरीर—आज्ञा चक्र---
      छठवाँ शरीर ब्रह्म शरीर है, काज़मिक बॉडी है; और छठवाँ केंद्र आज्ञा चक्र है। अब यहां से कोई द्वैत नहीं है। आनंद का अनुभव पांचवें शरीर पर प्रगाढ़ होगा। अस्‍तित्‍व का अनुभव छठवें शरीर पर प्रगाढ़ होगा—एग्‍ज़िसटैंस (अस्‍तित्‍व) का, बीइंग (होने) का। अस्‍मिता खो जायेगी छठवें शरी पर—हूं, यह भी चला जायेगा....हूं, ‘’मैं हूं’’—तो मैं चला जायेगा पांचवें शरीर पर हूं, चला जायेंगा पांचवें को पार कर के...है, इजनेस, का बोध होगा, ‘’तथाता का बोध होगा....ऐसा है उसमें ‘’मैं’’ कहीं भी नहीं आयेगा, उसमें अस्‍मिता कहीं नहीं आयेगी—जो है, बस वहीं हो जायेगा।

सात शरीर और सात चक्र— 5

पाँचवाँ शरीर—विशुद्ध चक्र
     पांचवां चक्र है विशुद्ध; यह कंठ के पास है। और पांचवां शरीर है स्‍पिरिचुअल बॉडी—आत्‍म शरीर है। विशुद्ध उसका चक्र है। वह उस शरीर से संबंधित है। अब तक जो चार शरीर की मैंने बात कहीं। और चार चक्रों की, वे द्वैत में बंटे हुए थे। पांचवें शरीर से द्वैत समाप्‍त हो जाता है।

सात शरीर और सात चक्र— 4

चौथा शरीर—अनाहत चक्र

      चौथा शरीर है; यह ह्रदय के पास है, हमारा मेंटल बॉडी, मनस शरीर—साइक। इस चौथे शरीर के साथ हमारे चौथे चक्र का संबंध है अनाहत का। चौथा जो शरीर है, मनस इस शरीर का जो प्राकृतिक रूप है, वह है कल्‍पना—इमेजिनेशन, स्‍वप्‍न–ड्रीमिंग। हमार मन स्‍वभावत: यह काम कल्‍पना करता रहता है। और सपने देखता रहता है। रात में भी सपने देखता है, दिन में भी सपने देखता है—और कल्‍पना करता रहता है। इसका जो चरम विकासित रूप है........

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

बुद्धों के शरीर से--काम वासना कैसे तिरोहित हो जाती है?(2)

 
भोजन तिरोहित नहीं हो जाएगा; बुद्ध को भी आवश्‍यकता होगी भोजन की, क्‍योंकि यह एक निजी आवश्‍यकता है। कोई सामाजिक आवश्‍यकता नहीं है। कोई जातिगत आवश्‍यकता नहीं  है। निद्रा तिरोहित नहीं होगी, वह एक व्‍यक्‍तिगत आवश्‍यकता है। वह सब जो व्‍यक्‍तिगत है( मौजूद रहेगा। वह सब जो जातिगत है, तिरोहित हो जाएगा—और इस तिरोभाव का एक अपना ही सौंदर्य होता है।

बुधवार, 1 सितंबर 2010

बुद्धों के शरीर से--काम वासना कैसे तिरोहित हो जाती है?(1)

बहुत सारी चीजें समझने जैसी है।
      पहली: कामवासना भोजन की भांति कोई सामान्‍य जरूरत नहीं है। वह बहुत असामान्‍य होती है। यदि भोजन तुम्‍हें नहीं दिया जाता है तो तुम मर जाओगे, लेकिन बिना काम वासना के तुम जी सकते हो। यदि पानी तुम्‍हें नहीं दिया जाता है तो शरीर मर जाएगा। लेकिन बिना कामवासना के तुम जी सकते हो। यदि वायु तुम्‍हें नहीं मिलती है तो तुम मर जाओगे कुछ पलों के भीतर ही। लेकिन कामवासना के बिना भी तुम जी सकते हो जीवन भर।

सात शरीर और सात चक्र—3

तीसरा शरीर—मणिपूर चक्र
तीसरा चक्र; यह नाभि से थोड़ा उपर, जहां कोड़ी होती है। मैंने कहां, एस्‍ट्रल बॉडी है, सूक्ष्‍म शरीर है। उस सूक्ष्म शरीर के भी दो हिस्‍से है। प्राथमिक रूप से सूक्ष्‍म शरीर संदेह,विचार, इनके आसपास रुका रहता है। और अगर,ये रूपांतरित हो जायें, संदेह अगर रूपांतरित हो तो श्रद्धा बन जाती है। और विचार अगर रूपांतरित हो तो विवेक बन जाता है।

सोमवार, 23 अगस्त 2010

पत्र-पाथेय-- ( 6 ) संन्‍यास नया जन्‍म है

प्रिय योग यशा,

प्रेम। नये जन्‍म पर मेरे शुभाशीष।
संन्‍यास नया जन्‍म है।
स्‍वंय में, स्‍वयं में स्‍वयं का।
वहीं मृत्‍यु भी है।
साधारण नहीं—महा मृत्यु।
उस सब की जो तू तक थी।
और जो तू अब है, वह भी प्रतिपल मरता रहेगा।
ताकि, नया जन्‍मे–-नया जन्‍मता ही रहे।
अब एक पल भी तू-तू नहीं रह सकेगी।
मिटना है प्रतिपल और होना है प्रतिपल।
यही है साधना।
नदी की भांति जीना है।
सरोवर की भांति नहीं।
सरोवर गृहस्‍थ है।
सरिता संन्‍यासी है।






रजनीश का प्रणाम
 (11-11-1970)
(प्रति : मा योग यशा, विश्रव्नीड़, आजोल, गुजरात)

पत्र-पाथेय--( 5 ) संन्‍यास जीवन का परम भोग है।

प्रिय योग प्रिया,

प्रेम, तेरे संन्‍यास से अत्‍यंत आनंदित हूं।
जिस जीवन (वृक्ष) में संन्‍यास के फूल न लगें, वह वृक्ष बांझ है।
क्‍योंकि, संन्‍यास ही परम जीवन-संगीत है।
संन्‍यास त्‍याग नहीं है।
वरन, वही जीवन का परम-भोग है।
निश्‍चय ही जो हीरे-मोती पा लेता है, उससे कंकड़-पत्‍थर छूट जाते है।
लेकिन, वह छोड़ना नहीं छूटना है।





रजनीश का प्रणाम
15-10-1970

(प्रति : मा योग प्रिया, विश्रव्नीड़, आजोल, गुजरात)

पत्र-पाथेय--( 4 ) संन्‍यास दायित्‍वों से भागने का नाम नहीं है।

प्रिय योग समाधि,

प्रेम। संन्‍यास गौरी-शंकर की यात्रा है।
चढ़ाई में कठिनाइयां तो है ही।
लेकिन दृढ़ संकल्‍प के मीठे फल भी है।
सब शांति और आनंद से झेलना।
लेकिन संकल्‍प नहीं छोड़ना।
मां की सेवा करना, पहले से भी ज्‍यादा।
संन्‍यास दायित्‍वों से भागने का नाम नहीं है।
परिवार नहीं छोड़ना है, वरन सारे संसार को ही परिवार बनाना है।
मां को भी संन्‍यास की दिशा में उन्‍मुख करना।
कहना उनसे : संसार की और बहुत देखा, अब प्रभु की और आंखे उठाओ।
और तेरी और से उन्‍हें कोई कष्‍ट न हो। इसका ध्‍यान रखना।
लेकिन इसका अर्थ झुकना या समझौता करना नहीं है।
संन्‍यास समझौता जानता ही नहीं है।
अडिग और अचल और अभय—यही संन्‍यास की आत्‍मा है।

                            रजनीश का प्रणाम
                             15-10-1970
(प्रति : मां योग समाधि, राजकोट, गुजरात)


पत्र-पाथेय--(3)सन्‍यासी बेटे का गौरव

प्रिय आनंद मूर्ति,

प्रेम, फौलाद के बनों—मिट्टी के होने से अब काम नहीं चलेगा।
संन्‍यासी होना प्रभु के सैनिक होना है।
माता-पिता की सेवा करो।
पहले से भी ज्‍यादा।
संन्‍यासी बेटे का आनंद उन्‍हें दो।
लेकिन, झुकना नहीं।
अपने संकल्‍प पर दृढ़ रहना।
इसी में परिवार को गौरव है।
जो बेटा संन्‍यास जैसे संकल्‍प में समझौता कर ले वह कुल के लिए कलंक है।
मैं आश्‍वस्‍त हूं तुम्‍हारे लिए।
इसी लिए तो तुम्‍हारे संन्‍यास का साक्षी बना हूं।
हंसों और सब झेलो।
हंसों और सब सुनो।
यही साधना है।
अंघिया  आएँगी और चली जाएंगी।

                        




रजनीश का प्रणाम
 (15-10-1970)

(प्रति : स्‍वामी आनंद मूर्ति, अहमदाबाद)

पत्र-पाथेय--(2)संघर्ष-संकल्‍प ओर संन्‍यास

प्रिय मधु,
      प्रेम। संघर्ष का शुभारंभ है।
      ओर, उसमें तुझे धक्‍का देकर मैं अत्‍यंत आनंदित हूं।
      सन्‍यास संसार को चुनौती है।
      वह स्‍वतंत्रता में जीना ही संन्‍यास है।
      असुरक्षा अब सदा तेरे साथ होगी, लेकिन वही जीवन का सत्‍य है।
      सुरक्षा कहीं है नहीं—सिवाय मृत्‍यु के।
      जीवन असुरक्षा है।
      और यही उसकी पुलक है—यही उसकी सौंदर्य है।
      सुरक्षा की खोज ही आत्‍मा घात है।
      वह अपने ही हाथों, जीते-जी मरना है।
      ऐसे मुर्दे चारों और है।
      उन्‍होंने ही संसार को मरघट बना दिया है।
      उनमें प्रतिष्‍ठित मुर्दे भी है।
      इस सबको जगाना है, हालांकि वे सब जागे हुओं को भी सुलाने की चेष्‍टा करते है।
      अब तो यह संघर्ष चलता ही  रहेगा।
      इसमें ही तेरे संपूर्ण संकल्‍प का जन्‍म होगा।      
      और मैं देख रहा हूं दूर—उस किनारे को जो कि तेरे संघर्ष की मंजिल है।

                              रजनीश के प्रणाम,
                               (25-10-1970)

पत्र-पाथेय-- (1)वे इक्‍कठे होंगे-जिनके लिए मैं आया हूं

 प्रिय मधु,
प्रेम । कम्यून की खबर ह्रदय को पुलकित करती है।
बीज अंकुरित हो रहा है।
शीघ्र ही असंख्‍य आत्‍माएं उसके वृक्ष तले विश्राम पाएंगी।
वे लोग जल्‍दी ही इकट्ठे होंगे—जिनके लिए कि मैं आया हूं।
और तू उन सब की आतिथेय होने वाली है।
इसलिए, तैयार हो—अर्थात स्‍वयं को पूर्णतया शून्‍य कर ले।
क्‍योंकि, यह शून्‍यता ही आतिथेय, होस्‍ट बन सकती हे।
और तू उस और चल पड़ी है—नाचती, गाती, आनंदमग्न।
जैसे सरिता सागर की और जाती है।
और मैं खुश हूं।
सागर निकट है—बस दौड़....ओर दौड़।
           

  


रजनीश का प्रणाम
(15-10-1970)

(प्रति: मां आनंद मधु, विश्रव्‍नीड़, आजोल, गुजरात)
(मां आनंद मधु ओशो की पहली संन्‍यासी थी, उनके पति इस कारण ओशो को छोड़ कर चले गये कि उनकी पत्‍नी को सन्‍यास पहले क्‍यों दिया। ओशो ने कहां में पहली सन्‍यासी औरत को ही बनाना चाहूँगा। ये श्री मोरारजी देसाई  की भानजी है, जो बुद्धत्‍व को प्राप्‍त कर अभी भी ऋषि केश में रहती है।)


सात शरीर और सात चक्र—(2)

दूसरा शरीर—स्‍वाधिष्‍ठान चक्र
      दूसरा शरीर हमारे दूसरे चक्र से संबंधित है, स्‍वाधिष्‍ठान चक्र से। स्‍वाधिष्‍ठान चक्र की भी दो संभावनाएँ है। मूलत: प्रकृति से जो संभावना मिलती है। वह है, भय, घृणा, क्रोध, हिंसा। ये सब स्‍वाधिष्‍ठान चक्र की प्रकृति से मिली हुई स्‍थिति है। अगर इन पर ही कोई अटक जाता है। तो इसकी जो दूसरी, इसके बिलकुल प्रतिकूल ट्रांसफॉर्मेशन की स्‍थिति है—प्रेम, करूणा, अभय, मैत्री, यह संभव नहीं हो पाती।

सात शरीर और सात चक्र—(1)

पहला शरीर—मूलाधार चक्र

     जैसे सात शरीर है, ऐसे ही सात चक्र भी है। और प्रत्‍येक एक चक्र मनुष्‍य के एक शरीर से विशेष रूप से जुड़ा हुआ है। भौतिक शरीर, फिजिकल बॉडी, इस शरीर का जो चक्र है वह मूलाधार है; वह पहला चक्र है। इस मूलाधार का भौतिक शरीर से केंद्रीय संबंध है; यह भौतिक शरीर का केंद्र हे। इस मूलाधार चक्र की दो संभावनाएं है। एक इसकी प्रकृतिक संभावना है, जो हमें जन्‍म से मिलती है। और एक साधना की संभावना है, जो साधना से उपलब्‍ध होती है।

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

जाति-स्‍मरण: गुप्त सूत्रों का रहस्‍य (3 )

 
एक स्‍त्री ने एक छोटी सी किताब लिखी है—एक छोटे बच्‍चे के साथ बच्‍चा होकर रहने की। उस स्‍त्री को उम्र तो सत्‍तर साल है। सत्‍तर सालक की स्‍त्री ने एक छोटे सा प्रयोग किया। एक पाच साल के बच्‍चे के साथ दोस्‍ती करने का। मुश्‍किल है बहुत, आसान मामला नहीं है। पाँच साल के बच्‍चे का बाप होना आसान है, मां होना आसान है, भाई होना आसान है, गुरु होना आसान है, दोस्‍त होना इतना आसान नहीं है। कोई मां-बाप दोस्‍त नहीं हो पाता। जिस दिन दुनिया में मां-बाप बच्‍चों के दोस्‍त हो सकेंगे उस दिन हम दुनिया को आमूल बदल देंगे। यह दुनियां बिलकुल दूसरी हो जायेगी। यह दुनिया इतनी कुरूप,इतनी बदशक्‍ल नहीं रह जायेगी। लेकिन दोस्‍ती का हाथ ही नहीं बढ़ पाता।

जाति-स्‍मरण: गुप्त सूत्रों का रहस्‍य (2 )

 
तो पहले तो स्‍मरण करना पड़ेगा जन्‍म तक, जन्‍म के दिन तक। लेकिन वह असली जन्‍म-दिन नहीं है। असली जन्‍म दिन तो उस दिन है। जिस दिन गर्भाधान शुरू हुआ था। जिस को हम जन्‍म दिन कहते है। वह जन्‍म के नौ महीने के बाद का दिन है। जिस दिन गर्भ में आत्‍मा प्रवेश करती है। उस दिन तक स्‍मृति को गर्भ तक ले जाना कठिन नही है। और न ही इसमें बहुत ही खतरा है। क्‍योंकि वह इसी जीवन की स्‍मृति है। और उसे ले जाने के लिए जैसा मैंने कहा, भविष्‍य से मन को मोड़ ले। और थोड़ा सा ध्‍यान कर पात है, उन्‍हें कोई कठिनाई नहीं है भविष्‍य को भूलने में। भविष्‍य में याद करने को है भी क्‍या। भविष्‍य है ही नहीं। उन्मुखता बदलनी है। भविष्‍य की तरफ न देखें। पीछे की तरफ देखें। और अपने मन में धीरे-धीरे क्रमश: संकल्‍प करते जाये। एक साल लोटे, दो साल लोटे, दस साल लोटे, बीस साल लोटे, पीछे लोटते ही जाएं। और वह बड़ा अजीब अनुभव होगा।

जाति-स्‍मरण: गुप्त सूत्रों का रहस्‍य (1 )


जाति-स्‍मरण अर्थात पिछले जन्‍मों की स्‍मृतियों में प्रवेश की विधि पर आपके द्वारा शिविर में चर्चा की है। आपने कहा है कि चित को भविष्‍य की दिशा से पूर्णत: तोड़ कर ध्‍यान की शक्‍ति को अतीत की और फोकस करके बहाना चाहिए। प्रक्रिया का क्रम आपने बताया। पहले पाँच वर्ष की स्‍मृति में, फिर तीन वर्ष की स्‍मृति में, फिर जन्‍म की स्‍मृति में, फिर गर्भाधान की स्‍मृति में लौटना, फिर पिछले जन्‍म की स्‍थिति में प्रवेश होता है। पूरे सूत्र क्‍या है? आगे के सुत्र का कुछ स्‍पष्‍टीकरण करने की कृपा कीजिएगा?
          पिछले जन्‍म की स्मृतियाँ प्रकृति की और से रोकी गई है। प्रयोजन है उनके रोकने का जीवन की व्‍यवस्‍था में जिसे हम रोज-रोज जानते है, जीते है, उसका भी अधिकतम हिस्‍सा भूल जाए, यह जरूरी है। इसलिए आप इस जीवन की भी जितनी स्मृतियाँ बनाते है। उतनी स्मृतियाँ याद नहीं रखते। जो आपको याद नहीं है, वह भी आपकी स्‍मृति से मिट नहीं  जाती। सिर्फ आपकी चेतना और उस स्‍मृति का संबंध छूट जाता है।

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

बैताल पचीसी—अद्भुत अध्‍यात्‍म रहस्‍य कथाएं (2)

  
 किसी तरह नाक को अवरूद्ध कर के वृक्ष पर चढ़ा। हाथ-पैर कंप रहे थे । वृक्ष पर चढ़ना भी बहुत मुश्‍किल था। किसी तरह उस लाश की डोरी काटी। वह लाश जमीन पर धम्‍म से नीचे गिरी, न केवल गिरी , बल्‍कि खिलखिला कर हंसी। विक्रमादित्‍य के प्राण निकल गये होगें। सोचा था मुर्दा है, वह जिंदा मालूम होता है। और जिंदा भी अजीब हालत में। घबड़ाया हुआ नीचे आया। और उससे पूछा क्‍यों हंसे? क्‍या मामला है।
         बस, इतना कहना था कि लाश उड़ी वापस जाकर वृक्ष पर लटक गई थी। और लाश ने कहा कि शांत होना, तो ही तुम मुझे उस फकीर तक ले जा सकते हो। तुम बोले और चुक गये।

बैताल पचीसी—अद्भुत अध्‍यात्‍म रहस्‍य कथाएं( 1 )

 
तुमने बैताल पच्चीसी का नाम सुना होगा। तुम कभी सोच भी नहीं सकते कि वह भी कोई ज्ञानियों की बात हो सकती है। बैताल पच्चीसी। पर इस देश ने बड़े अनूठे प्रयोग किए है। इस देश ने ऐसी किताबें लिखी है, जिनको बहुत तलों पर पढ़ा जा सकता है। जिनमें पर्त दर पर्त अलग-अलग रहस्‍य और अर्थ है। जिनमें एक साथ दो, तीन, चार या पाँच अर्थ एक साथ दौड़ते रहते है। जैसे एक साथ पाँच रास्‍ते चल रहे हो। पैरेलल, समानांतर।

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

उद्दालक और श्‍वेतकेतु—(कथा यात्रा-007)

उद्दालक और श्‍वेतकेतु

उपनिषद में कथा है:- उद्दालक का बेटा श्‍वेतकेतु ज्ञान लेकर घर लौटा; विश्‍वविद्यालय से घर आया। बाप ने देखा, दूर गांव की पगडंडी से आते हुए। उसकी चाल में मस्‍ती कम और अकड़ ज्‍यादा थी। सुर्य पीछे से उग रहा था। अंबर में लाली फेल रही थी। पक्षी सुबह के गीत गा रहे थे। पर उद्दालक सालों बाद अपने बेटे को घर लोटते देख कर भी उदास हो गया। क्‍योंकि बाप ने सोचा था विनम्र होकर लौटेगा। वह बड़ा अकड़ा हुआ आ रहा था। अकड़ तो हजारों कोस दूर से ही खबर दे देती है अपनी। अकड़ तो अपनी तरंगें चारों तरफ फैला देती है। वह ऐसा नहीं आ रहा था की कुछ जान का आ रहा है। वह ऐसे आ रहा था जैसे मूढ़ता से भरा हुआ। ऊपर-ऊपर ज्ञान तो संग्रहीत कर लिया है। पंडित होकर आ रहा है। ज्ञानी होकर आ रहा है। विद्वान होकर आ रहा है। प्रज्ञावान होकर नहीं आ रहा। ज्ञानी हो कर नहीं आ रहा। कोई अपनी समझ की ज्‍योति नहीं जली है। अंधेरे शास्‍त्रों का बोझ लेकर आ रहा है। बाप दुःखी और उदास हो गया!

   बेटा आया, उद्दालक ने पूछा कि क्‍या–क्‍या तू सीख कर आया?

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

सोमरस

जो श्रेष्‍ठतम हे, उसे वेदों ने सोमरस कहा है। सदिया हो गई, न मालूम कितने लोग सोमरस की तलाश में रहे है। वैज्ञानिक हिमालय की खाइयों में,  पहाड़ियों में, सोमरस किस पौधे से पैदा होता था, उसकी अनथक अन्वेषण करते रहे है। अब तक कोई जान नहीं पाय कि सोमरस कैसे पैदा होता था? सोमरस क्‍या था?

सोमवार, 9 अगस्त 2010

मूर्तिपूजा-व्‍यक्‍तिपूजा:-- (कमजोरी व कायरता)

बुद्ध ने कहां था, अपने शिष्‍यों से कि मेरी मूर्ति मत बनाना। आज जमीन पर बुद्ध की जितनी मूर्तियां है। उतनी किसी दूसरे आदमी की नहीं। अकेले बुद्ध की इतनी मूर्तियां है, जितने किसी दूसरे आदमी की नहीं। उर्दू में तो बुत शब्‍द बुद्ध का ही बिगड़ा हुआ रूप है। बुद्ध का मतलब ही मूर्ति हो गया। बुद्ध की इतनी मूर्तियां बनीं कि बुद्ध का मतलब ही मूर्ति हो गया। एक-एक मंदिर में दस-दस हजार बुद्ध की मूर्तियां है।
      चीन में एक मंदिर है, दस हजार मूर्तियों वाला मंदिर। उसमें बुद्ध की दस हजार मूर्तियां हैं। और बुद्ध ने कहां की मेरी पूजा मत करना।

सत्यह शब्दों में नहीं—गुरु के चरणों में नहीं—



धर्म का सबसे बुनियादी प्रश्‍न ईश्‍वर नहीं है। धर्म का सबसे ज्‍यादा प्रश्‍न स्‍वयं का होना है।
      सत्‍य की यात्रा बाहर की तरफ नहीं है। सत्‍य की यात्रा भीतर की तरफ है। बाहर जो यात्रा चल रही है, खोज चल रही है, उससे सत्‍य कभी भी उपलब्‍ध नहीं होता। ज्‍यादा से ज्‍यादा काम-चलाऊ बातें ज्ञात हो सकती है।

रविवार, 8 अगस्त 2010

ओशो की विश्‍व यात्रा—2

बुद्ध की जन्‍म स्‍थली नेपाल में—

     3 जनवरी, 1986 को काठमांडू एयरपोर्ट पर नई दिल्‍ली से आने वाली पहली उड़ान का इंतजार बड़े जोश-खरोश से चल रहा था। विशिष्‍ट व्‍यक्‍तियों के स्‍वागत की नेपाली परंपरा के अनुसार पानी से भरे 108 कलश एयरपोर्ट के आगमन द्वार से पार्किग एरिया तक दो क़तारों में लगे हुए थे—और उनके पीछे सैकड़ों पूरबी पश्‍चिमी संन्यासियों का समूह नाच गा रहा था। रंग बिरंगी तख्‍तियां गर्व से घोषणा कर रही थी—‘’बुद्ध की धरती नए बुद्ध का स्‍वागत करती है।‘’

ओशो की विश्‍व यात्रा—1

29 अक्‍तूबर 1985 को जब अमरीका की सरकार ने बिना किसी अपराध और बिना किसी वारंट के ओशो को गिरफ्तार कर लिया-–तो प्रताड़ना से भरे उन बाहर दिनों में—एक बात स्‍पष्‍ट हो गई कि रोनाल्ड रीगन और उसकी सरकार ओशो की क्रांतिकारी आवाज को बंद करने के लिए किसी भी हद को पार कर सकती है। ऐसी स्‍थिति में ओशो के मित्रों ने उनसे प्रार्थना की अमरीका में रहकर पाखंडों के खिलाफ अपनी लड़ाई जानी रखने की बजाएं भारत लौट चलें। जहां वे शारीरिक रूप से अधिक सुरक्षित रह सकेंगे।
     14 नवंबर, अमरीका की धरती ने ओशो को अंतिम प्रणाम किया। जैट स्‍टार 731 पर सवार होकर ओशो नई दिल्‍ली की और रवाना हो गए।
     लेकिन ओशो के लिए यह यात्रा अपनी जन्‍मभूमि पर वापस लौटने की यात्रा नहीं थी। वरन, यह शुरूआत थी उस ऐतिहासिक विश्‍व यात्रा की, जिसमें 46,000 मील का आकाश नाप कर उन्‍होंने विश्‍व के उन सब बड़े-बड़े देशों का पर्दाफाश किया जो लोकतांत्रिक होने का दावा करते है। एक निहत्‍था,कोमल-सा-व्‍यक्‍ति सिर्फ अपने हवाई जहाज पर बैठा-बैठा ही बड़े से बड़े बम बनाने वाली सरकारों को कंप कँपाता रहा—और हंसता रहा। चलो चल हम भी उस यात्रा पर.......

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

संत भर्तृहरि—

   
 भर्तृहरि ने घर छोड़ा। देखा लिया सब। पत्‍नी का प्रेम, उसका छलावा, अपने ही हाथों आपने छोटे भाई विक्रमादित्‍य की हत्‍या का आदेश। मन उस राज पाठ से वैभव से थक गया। उस भोग में केवल पीड़ा और छलावा ही मिला। सब कुछ को खूब देख परख कर छोड़ा। बहुत कम लोग इतने पककर छोड़ते है इस संसार को जितना भर्तृहरि ने छोड़ा है। अनूठा आदमी रहा होगा भर्तृहरि। खूब भोगा। ठीक-ठीक उपनिषद के सूत्र को पूरा किया: ‘’तेन त्‍यक्‍तेन भुंजीथा:।‘’ खूब भोगा। एक-एक बूंद निचोड़ ली संसार की। लेकिन तब पाया कि कुछ भी नहीं है। अपने ही सपने है, शून्‍य में भटकना है।

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

संत झुन्‍नून—

मिश्र में एक अद्भुत फकीर हुआ है झुन्‍नून। एक युवक ने आकर उससे पूछा, मैं भी सत्‍संग का आकांक्षी हूं। मुझे भी चरणों में जगह दो। झुन्‍नून ने उसकी तरफ देखा—दिखाई पड़ी होगी बही बुद्ध की कलछी वाली बात जो दाल में रहकर भी उसका स्‍वाद नहीं ले पाती। उसने कहा, तू एक काम कर। खीसे में से एक पत्‍थर निकाला और कहा, जा बाजार में, सब्‍जी मंडी में चला जा, और दुकानदारों से पूछना कि इसके कितने दाम मिल सकते है।