साथी मिला है हमदम, लुट लिया है
तन मन।
दूर बुलाती मंजिल,
मुझे मेरे ऐ दिल......तू ले चल वहां।
पत्थर को पूजते रहे,
पत्थर को सूझते रहे।
पत्थर की नाव है मिली,
पत्थर की मूर्ति सजी।
पत्थर के पंख से उड़ चलूं कहां.....
तुमने पुकारा जब से, उलझन मिटी
है मन से।
फिर पैरो में घुंघरू बंधे, जीवन
में नाद है बजे।
इस जीवन को पल-पल मैं पी लूं यहां....
साथी मिला है हमदम, लुट लिया है
तन-मन।
दूर बुलाती मंजिल, मुझे ऐ मेरे
दिल....ले चल वहां।
जग से बेगाने हम हुए, जब से दीवाने
हम हुए।
उड़ते है पंख के बिना, उत्सव से
भर गया जीना।
बता अब ऐ मेरे मन ले उड़ा कहां...।
साथी मिला है हमदम, लुट लिया है
तन-मन।
दूर बुलाती मंजिल, मुझे ऐ मेरे
दिल....ले चल वहां।
(ये गीत महान गीतकार-साहिर जी की कलम से लिख गया है,
संगीत महान बर्मन दा ने और आवाज के जादूगर रफी साहब ने इसे गया है। उस
कि धून पर ये बोल लिखने की कौशिक कि है।)
.jpg)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें