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शनिवार, 9 मई 2026

54-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-54

(सदमा - उपन्यास

क तरफ तो ये सब चल रहा था। लेकिन दूसरी और सोम प्रकाश को अंदर एक भय समाया हुआ था। की कहीं उसे छोड़ कर नेहालता फिर चली तो नहीं जायेगी। तब वह अकेला क्या करेगा। उसे तो अभी कुछ भी समझ नहीं आयेगा। ये बात उसने नेहा लता को भी कही। परंतु नेहालता हंस दी और कहां की अब तो मेरा आप का साथ इस जन्म में पक्का हो गया। हमारे बीच में ना मिलने की जन्मों की खाई थी वह पाट दी गई। अब उस पर एक विश्वास का पूल बन गया है। आप घबराओ मत मैं अब कहीं नहीं जाने वाली। आप मेरी बात को अपने ह्रदय में सहज कर रख लो। और पास बैठी नानी से कहने लगी नानी आप बतलाओं अब आगे क्या किया जाये। माता-पिता ने तो नया घर बनाने की कह दी। अब हम क्या करें। हमें तो इस मकान में भी कोई कमी या दिक्कत नजर नहीं आ रही है। तब नानी ने कहां की बात तो ठीक है, बेटा परंतु हर पीढ़ी का रहन सहन, खाना पहनना अलग होता है। हमारे जमाने का ये घर हमारी जरूरत के हिसाब से बना था। परंतु इसे बने करीब पचास साल हो गये। अब समय के साथ सब कुछ बदल गया है। इसलिए नेहालता के माता-पिता की बात में भी दम है। मकान तो बनाना ही चाहिए। क्योंकि कल को तुम्हारे माता पिता जब तुम से मिलने के लिए आयेंगे तो उन्हें क्या हम बाहर ठहरायेंगे। इतनी देर में पेंटल भी आ गया। पेंटल होटल से अपना सामान ले कर सीधा सोम प्रकाश के पास आ गया। तब नेहा लता ने पूछा की मम्मी-पापा क्या होटल में ही है। तब पेंटल ने कहां नहीं भाभी वह श्री करकरे जी के यहां चले गए है। क्योंकि वह तो शायद यहां पर सप्ताह भर और रूकने वाले है परंतु मेरा तो जाना जरूरी है। इसलिए मैं तो सुबह ही चार बजे की पहली बस से चेन्नई के लिए चल दूंगा। जहाज श्याम पाँच बजे का है। इसलिए सुबह ही चल पड़ना ही ठीक होगा।

अभी सुबह की धूप खिली थी। वैसे तो सब पहले चाय पी चूके थे परंतु पेंटल के आने पर सब का मन एक-एक कप और चाय पीने को बन गया। पेंटल भी तो इस के लिए तैयार था। परंतु बीच में हरिप्रसाद ने भौंक कर सब को आगाह किया की अब वह और दूध नहीं पीना चाहता। तब सब हंस दिये कि महाराज इतना दूध अब हमारे पास है भी नहीं। नानी ये कहते हुए उठ ली की तुम बात करो मैं चाय बनाती हूं। परंतु साथ ही नेहालता भी अंदर रसोई में चली गई। तब कुछ देर बाद सोम प्रकाश ने आवाज दी की नेहा लता एक मिनट के लिए जरा बाहर आना। तब नेहा लता ने कहां हां जी क्या बात है। सोम प्रसाद ने कहां की तुम पाँच मिनट के लिए हमारे संग बैठ जो जाओ। फिर ये पेंटल कल चला जायेगा क्यों न जो मकान बनवाना है इस से राय ले ली जाये। ये तो शहर में बहुत नये-नये मकानों के नक्शे बनाता रहता है। तब नेहा लता ने कहां की मैं नानी को बोल कर अभी आती हूं। तब सोम प्रकाश ने कहना शुरू किया की अब आप अपनी राय दे की हमें क्या करना चाहिए नये मकान के लिए। क्योंकि नानी का मकान तो अभी बहुत अच्छी हालत में है। फिर इस में नाना की यादे जूड़ी हुई है इसलिए तोड़ कर बनवाना ठीक नहीं होगा।

पेंटल ने इधर उधर खड़ा होकर देखा की जगह तो यहां पर काफी है। तब हम उस कोने में नया मकान बनाते है। दो कमरों का एक सेट एक उपर एक नीचे। इतनी देर में नेहा लता भी चाय ले कर आ गई। सब ने चाय पीने के बाद यही उचित समझा की जगह को अच्छे से चिंहित कर लिया जाये। तब पेंटल खड़ा होकर देखा नानी की जगह काफी है। फिर भी पेंटल चाहता था की ऐसा मकान बने की वह अपने में पूर्ण हो। यानि की नानी का पुराना मकान वैसा का वैसा ही रहे। तब सामने जो एक खाली मैदान था। नानी के पुराने मकान के एक दम से समाने वहां जाकर पेंटल खड़ा हो गया। और कहने लगा की हम यहां पर बना सकते हे। बीच में एक रास्ता जो नानी के मकान से इन दोनों को जड़े और मैंन गेट इसे ही रखेंगे। बस चारों और करीब आठ फिट की चार दीवार करा देंगे। 45 x 30 और उसके साथ से चार फिट की सीढ़ीयां जो उपर की मंजिल पर जाने के लिए होंगी। और इसके सामने 8 X 45 का एक बरामदा भी आ जायेगा। 18 X 15 का बैंड रूम और 12 X 15 एक बाथरूम भी बन जायेगा। तब ड्राइंग रूम हमारे पास बचा 20 X 30 का क्या इतना बड़ा ठीक रहेगा। इसी तरह से एक सेट उपर भी बना सकते है। जिसे मेहमानों के लिए रखा जा सकता है। या उस में श्री हरि प्रसाद जी बैठ कर चौकीदारा करेंगे। पेंटल का ये मजाक सून कर पास खड़े हरिप्रसाद जी ने भौंक कर अपना समर्थन दिया।

सब लोग पेंटल के इस मकान ज्ञान से बहुत प्रभावित हुए। की देखों जो सा जटिल दिखने वाला काम भी आज कितना सरल हो गया। नानी तो अचरज कर रही थी। की हमने जब तेरे नाना थे, तो उसे तो मिस्त्री के हाथों में छोड़ दिया था। तब पेंटल ने कहां की पहल मिस्त्री खूद ही काम करते थे, इसलिए उन्हें अनुभव होता था। आपका मकान हवा पानी और धूप के हिसाब से बहुत सुंदर है। ये बात सब को बहुत जमी। और ये काम में एक कागज पर बैठ कर तैयार कर देता हूं। सामने एक लोहे का बड़ा सा गेट लग जायेगा। और चारों और आठ फीट की चार दीवारी। चलो एक सिरदर्द तो कम हुई। वह भी नहीं तो कोन सुलझता। अच्छा हुआ पेंटल जी यहां उपस्थित थे। नहीं तो बाद में बीस मीन मेख निकालते की ये नहीं किया वो नहीं क्या। ऐसा करते तो वो हो जाता।

दूसरी और करकरे जी के घर पर जब। श्री और श्रीमति मल्होत्रा जी जब पहुंचे तो दोपहर के खाने का समय हो गया था। खाना खाने के बाद वही बैठ कर शादी की चर्चा चली की कैसे की जाये। क्योंकि आपके रित रिवाज और दूरी के कारण कुछ दिक्कत तो आने वाली ही हे। तब श्री करकरे जी ने कहां की नाहक हम इतने परेशान हो रहे है। असली सवाल तो समाज के सामने एक औपचारिकता का ही तो है। की ये दोनों एक सामाजिक बंधन में बंध गए। सो हमें ज्यादा तड़क भड़क तो करनी नहीं है। आप पास ही कोई मंदिर या धर्म शाला में से कार्य कर सकते है। वहां का वातावरण भी सौम्य और मधुर होगा। होटल में तो शायद ये एक तड़क भड़क ही समझों फिर ये लोग ऐसा चाहेंगे भी नहीं। तब श्री मति मल्होत्रा जी ने कहां की कितने आदमी आप के यहां से आ सकते है। तब कुछ देर के लिए एक दम से शांति छा गई। कौन यहां से इतनी दूर जाना चाहेगा। अगर रेल से जाना भी हुआ तो कम से कम दो दिन तो लग ही जायेगे। तब करकरे जी ने सोनी की और देख कर कहां की सोम प्रकाश के यहां पर कोई खास रिश्तेदार तो है नहीं, बस स्कूल के कुछ अध्यापक है। परंतु मुझे नहीं लगाता की उनमें से किसी को इतनी दूर शादी में आशीर्वाद देने में रुची होगी। तब यहीं तय किया गया। यहां से कम से कम पाँच या छह ही व्यक्ति जा सकते है। और बाकी पेंटल जी के दफतर से एक दो दोस्त आ सकते है।

तब श्री मल्होत्रा जी ने कहां की फिर तो पास ही जो सुंदर आर्य समाज की धर्मशाला से उसे बुक कर लिया जाये और पास ही जो पंच्लिंगेश्वर महादेव मंदिर है वहां पर शादी की सारी रस्म निभाई जा सकती है। हम लोगों भी बस अति नजदीकी रिश्तेदार को ही बुलाना चाहेंगे। नहीं तो जितने मुख उतनी ही बातें होगी। कोई दो चार दोस्त नेहा लता के आ सकते है। तब यही ठीक समझा गया की यही सब ठीक है इसे ही आगे बढ़ाया जाये। अब सारा कार्य आपके यहां के काम यानि की मकान बनने की गति पर आधारित है। अगर नानी का मकान शादी से पहले बन जाये तो अति उत्तम होगा। तब करकरे जी ने कहां की फिर तो हमें शादी थोड़ा रूक कर ही करनी होगी। क्योंकि कम से कम मकान के बनने में छ: महीने तो लग जायेगें फिर इतने दिन में बरसात शुरू हो जायेगी।

तब यही निर्णय लिया गया की बाकी की बाते नानी के साथ बैठ कर श्याम को तय कर ली जायेगी। क्योंकि अभी तो पेंटल भी वहीं पर है, सुबह वह चला जायेगा। इसलिए श्याम की चाय कि लिए नानी के पास सब चलते हे। परंतु इस सब के लिए सोनी ने मना कर दिया। की मैं क्या करूंगी क्योंकि बच्चा परेशान हो जायेगा। ये सब बाते सून कर श्री मति मल्होत्रा जी भी तैयार थी की मेरा भी वहां पर कोई खास काम तो है नहीं इस लिए। आप दोनों चले जाये।


 

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