कुल पेज दृश्य

मंगलवार, 30 जून 2026

28 - प्रियतम तुम न आये- (कविता) ओशो की मधुशाला

28 - प्रियतम तुम न आये- (कविता)


कोयल हरसूं गाये, फिर आम गए बोराये।

पुरवा मस्ती लाये, प्रियतम तुम न आये।

 

ये पलाश तुम जंगल के माथे का सिंदूर है,

छाया है सूखे पतझड़ में, बस तेरा ही रूप।

कैसा दिखता है तू संन्यासी भाव लिए,

तेरी खामोशी कैसे वीरान सूनसान घेरे रहती है,

तेरे इस साधु भाव से पतझड़ भी उपवन सा लग रहा है।

तेरे होने मात्र से जंगल को उत्सव से भर रहा है।

बसंत तू ही लेकर आया है....सच

 

प्रीतम को दिल आज पुकारे,

आजा प्रियतम मन के द्वारे।

आस लगी है इन नयनों को

आकर इनकी प्‍यास बुझा रे।

दिल की तड़प अब बन गई धड़कन

फिर कौन सहेगा इतना क्रंदन

औस की बूंद सूख रही है

आस को मेरी यूं न मिटा रे...

 

भोर का तार भी जाग उठा है,कब जागेगी ऋतु मेरी

तुम आओगे एक आस जगी है,आंखों में बस मूर्त तेरी

मनसा-मोहनी दसघरा 

ओशो की मधुशाला 

 


 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें