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गुरुवार, 30 जुलाई 2026

37 - जीवन बगिया ऐसी उलझी - (कविता) - ओशो की मधुशाला

37- एक झूठा भ्रम—(कविता)  ओशो की मधुशाला

मनसा-मोहनी दसघरा

मैं ढूँढता रहा तारो को ज़मीं पर,

पर थी केवल यहां उनकी परछाई।।

 

मैं दौड़ा भागा,

थका और हारा,

पर हाथ न वो मेरे आई।।

काश मैं खोजता

फिर ठोकर खा गिर जाता

उस धरा में मिट जाता,

या उसे लपेट लेटा आपने तन मन पर

तो शायद पा जाता मैं अपने होने को

परंतु कहां गिरने देता है,

कहां मुड़ने देता है,

मेरा अहंकार मुझको

जब तक मैं टूट कर बिखर ही नहीं जाता

वह यूं ही अकड़ा खड़ा रहता....मेरे आस पास।

 

कितनी बार वह टूट बिखर के गिरा

परंतु फिर लिपट जाता में मुझसे

और में निस्सहाय साथ देखता रहता हूं

धूल-धरा की गोद में पड़ा हुआ उसे

वही धुल-धमास बताता है मेरे होने को

तब कहीं दूर शायद तू आकर

मेरे होने की थाह को पा ले।

और में तुझमें बस एक पल जी लूं।

 

फिर भी मैं पागल ढूँढ़ता रहता हूं

तुझे दूर क्षितिज उन तारों की छांव में।

देखता जब रज कण सा उस दैदीप्यमान

जो ओढ़े था एक सुरमई बेला को

वह तो था मेरी ही अपनी परछाई

मेरा ही होना मात्र यूं ही

लेकिन क्‍यों लगता है मुझको        

   जब तक न मिटा सकूंगा खुद को

उस अपने ही होने के अहं को

शायद नहीं हो सकूंगा कभी पूर्ण

न ही अपना

न किसी का,

क्‍या हूं मैं बस...बना रहूंगा

एक अहं मात्र का गुब्‍बार बनकर,

शायद वो जन्म-जन्म है मेरे साथ

 

मेरे होने से अधिक होने का भ्रम

शायद वो जीवन भर रहेगा मेरे साथ....

 एक झूठा भ्रम बनकर।

 यूं ही छलता रहेगा अनंत काल तक,

 चलता रहेगा मुझ किसी अंजान इशारे से।

    ये भ्रम उम्र भर संग मेरे

    एक पिंड की तरह

    मैं ताकता रहूंगा उसे बस दूर तक

    वह चलता रहेगा मुझमें जिजीविषा बन

 मेरी परछाई की तरह

 एक झूठ के पैबंद लगाकर।

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