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सोमवार, 31 अगस्त 2026

52 - धूप का एक टुकड़ा - (कविता) - ओशो की मधुशाला

 52 - धूप का एक टुकड़ा - (कविता) - मनसा-मोहनी
 

धूप का एक टुकड़ा,

सूर्य से टूट कर

कितनी ही अविरल अकंठ

उन बाधाओं को पार कर

मेरे आँगन की दीवार पर आकर

विश्राम की मुर्दा में बैठा मुझे निहार रहा था।

वह कैसे बाल वत सुकोमल सा दिखता था

मानो अगर मैंने उसे छू लिया तो,

वह तुरंत शरमा के रूठ जायेगा।

परंतु कहीं किसी ह्रदय के

गहरे कोने में अचानक

एक भय ने जन्‍म लिया 

मुझे लगा अगर मैंने इसे छूआ

या मैं उसके पास भी गया

तो कहीं वह डर सिहर कर सिकुड़ न जाये

न भूल जाये अपनी इस पल की आजादी को।

तब अचानक वह मुझसे रूठ जायेगा

और फिर मुझसे दूर न चला जाये

इस लिए मैं उसे अतृप्त आंखों से

दूर से देखता रहा उसे निहारता रहा

उसकी वो आभा जो उसे घेरे थे

कैसी अटूट रंगों में फैली थी उसकी परछाई

कितनी अबोध सी झिलमिला रही थी।

मानो कुछ क्षण के लिए

मेरे अंगन में कोई खुशियां उतर आई हो।

एक अबोध अविरल आनंद।

जो नित मेरे मन में

बस कर रहा उतरने का इंतजार

मेरे तन मन और

मेरा अंग-अंग मेरा पौर-पौर।

पा रहा था एक अनूठा विस्तार

मानो वो कोई धूप का टुकड़ा न होकर

सम्पूर्ण सूर्य ही नहीं अस्तित्व

ही आ गया हो।

वो देव-तुल्य बन कर

कैसे इतरा रहा था।

और मेरा मन-मयूर उसे

देख-देख को आनंद मगन हो रहा था

न जाने कब इस आनंद में

मेरी आंखें बंद हो गई

और डूब गया मैं अपने ही गहरे में

समय का भान मानो खत्म हो गया

जब आंखें खुली तो

धूप का वह टुकड़ा....वहां नहीं था

परंतु उसकी उपस्थिति बहुत प्रगाढ़ थी।

अब भी...जो अमिटता लिए हुए

बस गई थी उस आँगन में।

(ओशो की मधुशाला)

मनसा-मोहनी दसघरा

 


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