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शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

12-ओ री बांसुरियाँ – (कविता) - परिजात के फूल

12-ओ री बांसुरियाँ – (कविता) - मनसा-मोहनी 

ओ री बांसुरियां जब होंठों से मेरे लग जाती हो

ह्रदय में उठी टीस को जग को कह सुनाती हो।

 

कभी मन का मोदक नाद सहज तुम गाती हो।

कभी खिली हंसी सी तुम क्यों लगती हो,

कभी सावन भादों बन झर-झर हमें रुलाती हो।

मत गा-मत गा वो गीत, अब रोता है सावन।

दूर कहीं चेन से सोता है प्रीतम मन भावन।

मेरा राग मेध तू लेजा, उन चरणों में जाकर गहजा।

थोड़े से आंसू दे जा, थोड़ा सा गम मुझे से ले जा।

जा के प्रीतम से कह दे, मुझे याद तेरी रुलाती है।

ओ री बांसुरियां जब होंठों से मेरे लग जाती हो

ह्रदय में उठी टीस को जग को कह सुनाती हो।

 

राग जिसे तुम कहते हो, मेरे ह्रदय की तरुणाई है।

ये सूर जो बहते छेदो से, मेरे तन की अंगड़ाई है।

है मेरे प्राणों का क्रंदन जो, खरज़ कहां लग पाई है। 

जब छूती है ताल तन को, मानो पुरवा बहआई है।

यू पोर-पोर सहलने से, मैं फिर जीवित हो जाती हूं।

 

ओ री बांसुरियां जब होंठों से मेरे लग जाती हो

ह्रदय में उठी टीस को जग को कह सुनाती हो।

(परिजात के फूल)

मनसा-मोहनी दसघरा 


 

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