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रविवार, 10 मई 2026

55-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-55

(सदमा - उपन्यास

श्याम पाँच बजे अचानक श्री करकरे जी की कार जब आकर खड़ी हुई तो सब को थोड़ा तो विस्मय तो जरूर हुआ परंतु अच्छा भी लगा। करकरे जी तो न जाने कितने सालों बाद यहां आना हुआ है। एक तो उम्र का तकाजा दूसरा इधर कोई विशेष काम ही नहीं पड़ा। सब ने खड़े होकर उन का स्वागत किया। और आँगन में दो चार कुर्सियां और बिछा दी गई। सब आराम से बैठ कर बात करने लगे। इतनी देर में अंदर जाकर पेंटल वह कागज ले आया। जिस पर उसने मकान का नक्शा अभी-अभी बनाया था। उसने वह नक्शा लाकर श्री मल्होत्रा जी को दे दिया। की अंकल आप देखों ये मैंने मकान का ड्राइंग कि है। ये सब मकान आदि की जानकारी थोड़ी-थोड़ी करकरे जी को भी थी। सो वो भी इस में रूचि लेने लगे। तब पेंटल ने समझाया की ये एक बेड रूप हो गया इस के पास बाथरूम और साथ में एक बड़ा ड्राइंग रूम। साथ से उपर जाने के लिए सीढ़ीयां है। जो छ: फिट चौड़ी है। जगह की तो यहां पर कोई कमी नहीं है। ठीक ऐसा ही एक सेट उपर भी बन सकता है। जिस में आकर मेहमान आदि रह सके। और सामने आठ फिट का बरामदा है जिस में बरसात आदि में बैठ कर चाय आदि पी जा सकती है। इस में मैंने किचन नहीं बनाया। नानी और नेहालता कह रही थी की हमारा किचन वही पुराना खुब बड़ा है बस उस की कुछ टूट फूट ठीक करा दी जायेगी। इस तरह नानी का वो मकान ऐसे ही रहेगा। उस में भी कुछ रंग पेंट या मरम्मत की जा सकती है। और चारों और एक चार दीवारी जो करीब आठ फिट होगी। और गेट सामने ही रहेगा परंतु थोड़ा दायें हाथ की और बड़ा कर दिया जायेगा। जिससे की कार आदि अंदर आ सके।

नक्शे को देख कर सब लोग बहुत प्रसन्न हुए। इतनी देर में चाय आ गई थी। सब ने चाय पी और फिर चर्चा करने लगे की अब आगे क्या प्रोग्राम है। तब यही कहां गया की पहले तो मकान बना लिया जाता है। उसके बाद शादी की बात करेंगे। इस में करीब छ: या आठ महीने तो लग ही जायेगे। यानि की गर्मी में शादी का होना ना मुमकिन है। चलों फिर यही रहा की देव ठनी ग्यास के दिन ही शुभ दिन रखा गया है। हिंदु समाज इस दिन से ही शादी का शुभ आरंभ करते है। कहते है इस दिन हनुमान ने रावण की कैद से सभी देवताओं को मुक्त कराया था। हिंदूओं की गणना में जरा भी भूल चूक नहीं निकाल सकते। अब देखो न नाशिक से सीधा लंका तक का जो मार्ग बाल्मीकी जी ने दर्शाया गया मार्ग हंपी के ऋषिमुख पर्वत के शीर्ष पर देखा और अपने गहनों को एक कपड़े में बांधकर फेंक दिया। जटायु विशाल गरुड़ ने रावण जब सीता को हर कर उस मार्ग से ले जा रहा था। तो उसके साथ युद्ध किया तब रावण ने अपनी तलवार से उसके पंखों को काट दिया। और वह घायल हो गिर जमीन पर गिर पड़ा। जब राम सीता की खोज की तो जटायु को जमीन पर पड़ा देखा और उन्हें "हे पाक्षी" कहकर संबोधित किया, लेकिन वहां की भाषा में इसका अर्थ होता है ले पाक्षी इसलिए उनका नाम लेपाक्षी था। रावण का वह पुष्पक विमान का मार्ग देखे जब वह जबरन सीता को उसकी राजधानी श्रीलंका ले जा रहा था। हजारों साल पहले भी कैसे कोई जान सकता है। कितना सीधा मार्ग चुना रावण ने। ये एक चमत्कार है।

तब यहीं निर्णय लिया गया कि पहला काम मकान बनाने का है। और इस बीच नेहा लता यहीं पर रहेगी। बीच में दस पाँच दिन के लिए मुम्बई आना चाहे तो आ सकते है। तब नेहा लता ने पूछा की पापा आप और मम्मी क्या ऊटी घूमना पसंद करेंगे। तब करकरे जी ने कहां की बेटा उम्र के अनुसार आदमी का स्वभाव भी बदल जाता है। अब तो कोई धार्मिक स्थान पर जाना और वहां का एकांत ही अच्छा लगता है। ये सब सुंदरता एक उम्र के पड़ाव होते है। इस उम्र में इतनी उर्जा नहीं बची होती की इस सब में भटका जाये। हम एक सप्ताह यहां रहने वाले है फिर इसके बाद घर चले जाते है। यहां का सब काम तो परमात्मा की मर्जी से ठीक हो ही गया तुम्हारी मम्मी को भी तसल्ली हो गई। परंतु तुम ख्याल रखना। अब मकान बनने पर दो काम और करना एक तो टेलीफोन लगवा लेना दूसरा एक गाड़ी जरूर ले लेना।

रात का खाना खाने की जिद्द नानी और नेहालता करती रही। परंतु करकरे जी ने कहां की घर पर बना खाना नाहक खराब होगा फिर सोनी जी को और श्रीमति मल्होत्रा को हम बतला कर भी नहीं आये थे। अभी तो मिलते रहेंगे। हां पेंटल जी ने गाड़ी के लिए मना कर रहा था। इस बात का सब को अचरज हुआ की क्यों ? तब पेंटल ने कहां की आप बस कार सुबह भेज दि जिए बस स्टैंड तक वहाँ से बस का टिकट ले कर चेन्नई आराम से पहुंच जाऊंगा। नाहक ड्राइवर इतने लम्बे सफर पर परेशान होगा। बहुत लम्बा सफर आना और जाना। एक दम से वह अकेला थक जायेगा। बात में दम था इस लिए सब ने उसे स्वीकार कर लिया।

परंतु तब करकरे जी ने पेंटल को कहां की अब कब आना होगा। क्योंकि अभी तो आप को और छुट्टी नहीं थी मिलने वाली है। परंतु इस बीच कुछ लम्बे समय तक यहां पर आप को आना होगा। एक तो नानी का नये मकान की देखभाल भी तो आप को ही करना है। सोम प्रकाश इतनी भाग दौड़ नहीं कर पायेगा। एक दो महीने का अवकाश ले कर आप को जरूर आना होगा। मेरी उम्र भी अब काफी हो गई है। फिर अब जल्दी ही नेहा लता अपने स्कूल का कार्य भर सम्हाल लेगी।

तभी नेहा लता ने कहां की अभी तो मैं वहां स्कूल के बारे में कुछ भी नहीं जानती। और दूसरा अभी सोम प्रकाश भी धीरे-धीरे अपने भय से बाहर आ रहा है। इसलिए एक दम से हम पर इतना बोझ मत डाले। कम से कम एक दो साल तो आप हमारा साथ दे। आप घर पर क्या काम करेंगे। बस आप वहाँ आफिस में आकर बैठ जाये तब हमें एक तसल्ली बनी रहेगी। नेहालता की इस बात में दम था। इसलिए न चाहते हुए भी करकरे जी ने हामी भरनी पड़ी। सब काम सुविधा के अनुसार हो रहा था। एक बार जो बीज तब अंकुरित हो गया था, बस कुछ समय तक उसके रोपण की देख भाल तो अवश्य ही करनी होगी। वैसे तो प्रकृति अपने अनुसार भी देख रेख करती है। परंतु मनुष्य द्वारा रोपित पेड़-पौधा या पालना पोसना ही चाहे, हो वह भी एक का अतिरिक्त प्रेम चाहता है। वरना उसके बचने की संभावना लगभग आधी ही रह जाती हे। प्रेम प्रत्येक चेतन या अचेत से दिखने वाले पदार्थ के लिए भी एक उष्मा है, एक भोजन है। उसे पा कर प्रत्येक जीव चाहे वह चल हो या अचल वह अल्हादित हो उठता है। और वह अति पल्लवित भी हो जाता है। जैसे जल विहीन धरा शुष्क हो उठती है। इस तरह से प्रेम विहीन मानव भी शुष्क हो उठता है।

क्या जिसे हम प्रेम कहते या समझते है वहां प्रेम का कोई अंश है या वह केवल उपरी खोल है। जिसके अंदर कुछ भी नहीं है। प्रेम को उपरी सतह से नहीं समझा जाता। वह तो मात्र मोह या देख भाल है। प्रेम के आयाम को जानने के लिए अति अंतस में डूबना होता है। जहां पर प्रेम और भक्ति में एक महीन सा झीना सा पर्दा मात्र रह जाता है। जिसे हम देख नहीं सकते परंतु भावनाओं के पार जाकर के उसमें उतर सकते है डूब सकते हे। प्रेम केवल भावनात्मकत ही नहीं है। प्रेम में भावनाओं से अधिक गहराई है, प्रेम में भावनाओं से अधिक प्रामाणिकता है। भावनाएं तो क्षणिक होती हैं। अधिक या कम, प्रेम का संवेग ही है। प्रेम को एक अनुभव की तरह से मान कर उसे गलत समझ लिया गया है। एक दिन तुम किसी स्त्री या किसी पुरूष के प्रेम में पड़ते हो और अगले दिन यह चला गया होता हैऔर तुम इसे ही प्रेम कह देते हो। यह प्रेम नहीं है। यह एक संवेग है: तुमने स्त्री को पसंद कियापसंद किया, याद रखो, प्रेम किया नहींयह एक पसंद थी। ठीक ऐसे ही जैसे तुम आईसक्रीम को पसंद कर लेते हो। पसंद तो आती है जाती है। पसंद क्षणिक होती है, वे देर तक नहीं ठहर सकती; उसमें देर तक ठहर सकने का सामर्थ्य नहीं होता। तुम एक स्त्री को पसंद करते हो, तुमने उसे प्रेम किया, और बात खत्म! पसंद खत्म हो गई। यह ठीक ऐसे ही है जैसे तुमने आईसक्रीम को पसंद किया और उसे खा लिया। अब तुम आईसक्रीम की और देखते तक नहीं। और यदि कोई तुम्हें और अधिक आईसक्रीम दिए चला जाए तो, तुम कहोगे, ‘अब यह वमन पैदा करने वाली है। जरा रूको, अब मैं और नहीं खा सकता हूं।

पसंद प्रेम नहीं है। पसंद को प्रेम समझने की भूल मत करना, वरना अपना सारा जीवन तुम एक पानी पर बहती लकड़ी रहोगे... एक व्यक्ति से तुम दूसरे तक जाते रहोगे। न कभी गहराई और न ही कभी घनिष्ठता को तुम महसूस कर सकोगे।.....

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