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मंगलवार, 22 सितंबर 2026

69 - कारे बदरा अब तो आजा - (कविता) - ओशो की मधुशाला

 69 - कारे बदरा अब तो आजा - (कविता) - मनसा-मोहिनी 

कारे बदरा अब तो आजा, मेरी आंख के मोती ले जा।

दूर कहीं जब मिले पिहरवा, उन चरणों में जाकर गहजा।।

 

प्रीतम को यूं जाकर कहना, घुटन भरा ये हो गया जीना।

तपती धरा को अब है सहना, मानो फूलों का है गहना।

दूख पीड़ी को है पीते जाना, दिल के टुकड़े सीते रहना।

नासूर बना, जख्म जिगर का,याद के धागों से ही सीना।

बादल बरसे जीवन तरसे, बूंद स्वाती की तो देजा।

प्यास बुझी है तरूँ-धरा की, मेरे को भी तृप्ति देजा।

 

आने को है अब मेरा प्रीतम, बार-बार मन मुझको कहता।

बंजर धरती जलता ये मन, अंगारों की जलन अब सहता।

दूर कहीं जब पपीहा गाता,  मेरी  आस को और जगता।

गर्द की यादों के धुंधलके में, तेरी याद की छवि बनाता।

जीतना भी तूं मुझे सताता,मिलन प्यास की और बढ़ता।

आस बंधी है, न श्वास रुकी है,चुपके से कानों में कहजा।

हिचकी आई तेरी  याद की, जीवन से यूं जाकर कह जा।

आस बंधी है,पल-पल क्षण-क्षण, आँख के मोती आकर लेजा। 

 

कारे  बदरा अब तो आजा, मेरी  आंख के मोती ले जा।

दूर कहीं जब मिले पिहरवा, उन चरणों में जाकर गहजा।।

(ओशो की मधुशाला) 

मनसा - मोहनी दसघरा 

 


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