एक गीत उठा जब प्राणों में, फिर क्यों
उसको मैं गा न सका।
कोई टीस उठी जब ह्रदय में, प्रीतम
तुझको दिखला न सका।
कोई समीर मधुर जीवन में चली,
फिर नाच उठा आँगन
सारा?
देखो जीवन
का बोझ लिए,
नित चल-चल कर अब मैं हारा।
क्यों मुझको वो बहला न सका।
इक गीत उठा जब प्राणों में,
फिर क्यों उसको मैं अब गा न सका।
रिसता प्राणों से जो क्षण-क्षण
जीवन सांसों का है बंधन।।
करता ह्रदय में जो क्रंदन,
नित आंखों से बहता अंजन।।
क्यों आकर मुझे बहला न सका।
इक गीत उठा जब प्राणों में,
फिर क्यों उसको मैं अब गा न सका।
ये छाया की यादें धुँधली,
इन नयनों में बिखरे-सपने
इन अनछुई यादें के परे
सब उलझ गये अब हम हारे।
सपने हम को सच लगते है,
सत्य से हम सब क्यों दूर हुए।
आना मद के उस यौवन का,
फिर क्यों मुझको उलझा न सका।
इक गीत उठा जब प्राणों में,
फिर क्यों उसको मैं अब गा न सका।
क्यों आकर मेरे जीवन में
मधु-मादकता भर जाते हो।
मैं ढूंढ रहा भव सागर में
न आते हो न पाते मुझे रुलाते हो।
जीवन की बिखरी कड़ियों को,
ना जोड़ सके तुम पल-पल कल
अंधकार भरे इस सूने पथ पर,
मैं दीप होश का जला न सका।।
एक गीत उठा जब प्राणों में, फिर क्यों उसको मैं गा न सका।
कोई टीस उठी जब ह्रदय में, प्रीतम तुझको दिखला न सका।
मनसा-मोहनी दसघरा
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