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बुधवार, 20 मई 2026

07-चाँद गगन में - (कविता) - (ओशो की मधुशाला)

07-चाँद गगन में (कविता)

चारों तरफ अँधेरा छाया, चाँद गगन में हैं मुस्काता।      

हमने जग को राह दिखार्इ,ऐसा भ्रम है उसको आया।


थोड़ा सा आगे चलने पर, बहुत भयंकर जंगल आया।

पथ, घट-घन गहरे थे उसके, चलते-चलते वो घबराया।

इतने में एक झील देख कर,वो ठि‍ठका, कुछ शरमाया।

शांत झील में देख छवि को, है इठलाया और मुस्‍काया।

मुग्‍ध हुआ अपने ही रूप पर, भूल गया वो तो है छाया।

खेला उन लहरों पर, अपने प्रतिबिम्‍ब को दोस्त बनाया।

लहरों झकझोरो में उलझ गया, फिर अपने जकड़ा पाया।

कैसे उड़ चलूंगा फिर से नभ में, वो रोया और छटपटाया।

नाहक मुग्‍ध हुआ इस छवि पे, कैसा जी का जंजाल बनाया।

इतने में घना बादल आया।      

मुख मंडल पे कुहासा छाया।

 

फिर पपीहा ने पुकार लगाई, वो तड़पा और फिर अकुलाया।

तभी हवा का इक झोंका आया, बादल को बिन पंख उड़ाया।

चाँद गगन में फिर मुस्‍काया, क्या पपीहे न मुक्‍त  कराया।

प्रणय पुकार पपीहे कि सुन, उसे पीड़ा का एहसास जो आया।

खुद भटका हो, अपने जाल में,कहां भटको को राह दिखलाया।

पहले खुद पथ-पथ्य चुन लूं, ऐसा बौद्ध तब उसको है आया।

चारों तरफ अँधेरा छाया, चाँद गगन में हैं मुस्काता।      

हमने जग को राह दिखार्इ,ऐसा भ्रम है उसको आया।

(ओशो की मधुशाला)

मनसा-मोहनी दसघरा 

 


 

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