बादलों का कतरा-कतरा
टूट कर छीटकर दूर पड़ा है
और आसमान उसे समेटना
चाह रहा हे अपनी गोद में
देवदार के वो वृक्ष भी पकड़ लेना चाहते है
उन आवारा बादलों को अपनी साखों से
खेलती उन बादलों की वो अठखेलियां
कैसे अनछुई सी फैलती रहती है चारों और
जो छू-छू कर उड़ जाते है बार-बार
उन जाते है अंबर में बार-बार उड़ते
बादल जो पाखी बने से घूम रहे है
कभी दूर-दूर उड़े जा रहे है कही
अनंत अंबर के उस छोर तक
और वो विस्मय विमुग्ध बर्फ का
ताज पहने वो पहाड़ भी
बार-बार करता है मुझे रिझाने के
पल-पल नये जतन अनेक उपाय
और धरा पर नीचे बहता वह कल-कल
चरणों में व्यास नदी का कलरव
अपनी ही मौज में गा-गा कर
मंद स्वर अविरल सा कुछ
कोकिला के कंठों से भी अब
बे बुझा से कोई मधुर नाद उठा
वो भी पकड़ना चाहते है अपनी छवि
व्यास नदी के बहते जल में
जो छूटी-छिटक बनती मिटती
जा रही पल-पल मुझसे दूर कहीं
पास ही कतारों में खड़े देवदार
सिपाही बन सांयसांय को
थामना चाहते है अपने अंदर
अपने कोमल मुलायम पत्तों से
जो एक नन्हे बालक की तरह
ऊधमी बने नाच रहे है
मन भी पंख लगा उड़ जाता है
उन सब के साथ ओर मैं
उस शांत क्षणों में मैं रह जाता हूं
मन हीन अकेला शांत जल सा
ओर डूब जाता हूं आपने होने में
बरसता रहता है आनंद पौर-पौर
इत-उत बंद हो जाती है ये आंखें
थिर पड़ी सी दिखती है ये देह
पराई-पराई सी बन कर।
मनसा-मोहनी दसघरा
ओशोबा हाऊस, नई दिल्ली
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