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गुरुवार, 19 मार्च 2026

25-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-25

(सदमा - उपन्यास)

र पहुंचते-पहुंचते नेहालता को रात हो गई। माता पिता दोनों ही उस की फिक्र कर रहे थे। और दोनो बड़ी बेसब्री से नेहालता का इंतजार कर रहे थे। नेहालता को आया देख कर दोनों ने चेन की सांस ली। बेटी बहुत देर कर दी और ड्राइवर को भी वापस भेज दिया था। क्यों उसे साथ रखती तो अच्छा होता। नहीं मां ये बात नहीं है। असल में हमें एलिफेंटा की गुफाएं देखने के लिए जाना था। सो ये बेचारा नाहक पाँच छह घंटे के लिए वह खड़ा-खड़ा सूखता इसलिए मैंने इसे भेज दिया था। आप नाहक फिक्र कर रही थी। अब कोई में गाड़ी थोड़ा ही चला रही थी। फिर मां आप इतनी चिंता नाहक करती हो। गिरधारी लाला को आवाज दे कर कहा की मैं नहाने के लिए जा रही हूं बाद में एक कप चाय बना कर रखना आज सारा दिन घूम-घूम कर थक गई। मां आपने भी देखी होगी एलिफेंटा की गुफाएं तो जरूर। मां ने कहां अब हमारे बस की कहां है। मैं तो तेरे पैदा होने के बाद एक बार गई थी तब तू करीब तीन साल की थी। लो बाबा मैं तो इतना थक गई थी की घर पकड़ना कठिन हो गया था।

तेरे पापा ने ही तुझे सारे रास्ते अपने गोद में उठाया था। हां मां थक तो मैं भी गई परंतु जगह कितनी सुंदर है। नेहालता की मां देख रही थी की जब ये दुर्घटना घटी है बेटी का स्वभाव उसकी रुचियां भी बदल गई है। इस का क्या अर्थ हो सकता। नेहालता तो नहाने चली गई तब वह अपने पति श्री जे. के. मल्होत्रा जी को कहने लगी सुनते हो आप। और वह कुछ काम करने में उलझे थे। हां बोलो सून रहा हूं। देखा आपने नेहालता की सब रुचियां, सोच विचार बदल रहे है। तब श्री मल्होत्रा जी ने कहां की अब वह बड़ी हो गई है। उम्र के हिसाब से आदमी की समझ भी सोच विचार सब बदलते रहते है।

तब श्रीमति मल्होत्रा जी ने कहा की आप भी कमाल करते हो। आपके पास जरा भी आँख नहीं है। जवान तो कब से हो गई है आपकी लड़की। परंतु आप से सर खपाई कौन करें। अरे जब से उसके साथ ये दुर्घटना घटी है उसका व्यवहार कितना बदल गया है। कितनी विचित्र बात है। ऐसी-ऐसी जगह जाती है। जहां की पहले कभी बात भी नहीं जाया करती थी। और देखा बाते भी कैसी करती है, समझदार भी अधिक हो गई है। मुझे तो वह अब समझ और उम्र में अपने से भी कुछ बड़ी लगती है।

श्री मल्होत्रा ने एक गहरी श्वास ली और कहां हां देख तो मैं भी रहा हूं, परंतु सूखे पात गिर गए है या धीरे-धीरे गिर रहे है। और नये कोमल अंकुर पल्लवित हो रहे है। मैं जैसे चाहता था सच अब नेहालता वैसी होती जा रही है। हमने उसे पालने पोसने में पूरी आजादी दी है। परंतु उसकी संगत सोहबत पहले कुछ ठीक नहीं थी। परंतु क्या करें शहर की हवा ही ऐसी है। परंतु न जाने क्यों एक बात अपने दिल से तुम्हें कहता हूं तुम नाराज भी बहुत जल्दी होती हो। बोलो सूना तो कहता हूं।

श्रीमति मल्होत्रा ने झल्ला कर कहा चलों मुझे नहीं सुनना। क्योंकि वह अपने पति की आदत को जानती थी। तुम चाय तो नहीं लोगे एक बार तो पी चूके हो। बोलो तो गिरधारी को आवाज लगाऊं। तब श्री मल्होत्रा जी ने कहां की आधा कप ले ही लूं तो ठीक रहेगा। आधा तुम ले लेना इस सब के साथ नेहालता का संग साथ भी हो जायेगा। और दोनों इस बात पर हंस दिये। इतनी देर में नेहालता स्नान कर के आ चूकी थी। श्री मल्होत्रा जी हाथ का काम छोड़ कर चाय की टेबल पर आ कर बैठ गए। गिरधारी चाय लेकर आया और नेहालता ने कहा की काका आप जाओ दूसरा काम देखो मैं चाय बनाती हूं।

इस बीच में मल्होत्रा ने बात का सिलसिला चालू रखा की आज कहां-कहां घूमने गई थी। बस एक ही जगह जा पाई वह थी, और वो भी एलिफेंटा की गुफाएं। हां उस को देखने में तो समय लगता है। परंतु मेरी समझ में नहीं आया की तुझे अचानक क्या हो गया है। की तुम ऐसी-ऐसी जगह जाती हो, जिसके लिए पहले हम कहते थे तो ना मूंह सिकोड़ती थी। और नेहालता हंस दी। पता नहीं पापा परंतु अब ये सब बहुत ही अच्छा लगता है। ये सब जो पहले फालतू की बकवास लगती थी। अब लगता है ये ही महत्वपूर्ण है। पहले की सोच तो एक दम से अजीब सी लगती है। क्या मनुष्य इस तरह से जी सकता है।  मैं जैसे पहले जी रही थी, बिना किसी लक्ष्या के बिना किसी मार्ग के चलना भी कोई चलना होता है।  इस में तो कोई शंका सुबह की बात ही नहीं है आप जो सोच रहे है मैं भी यहीं सोच रही हूं।

श्रीमती मल्होत्रा ने कहा की जब से इसका एक्सीडेंट हुआ है, मुझे तो इसका दिमाग कुछ खराबी सी नजर आ रही है। अजीब-अजीब बाते करती है, अजीब-अजीब जगह पर जाती है। कपड़े भी कैसे पहने शुरू कर दिये अब इसने। तब नेहालता ने कहा की मम्मी दिल पर हाथ रख कर कहना की वो नेहालता आपको प्यारी थी या अब। तब श्रीमती मल्होत्रा एक दम से हंसी और कहां की मुझे तो दोनो ही अच्छे लगती है। परंतु इस अच्छाई में डर लगता है। क्या कोई एक दम से इतना बदल सकता है। परंतु ये जो होता हम देख रहे है।

इसी बीच मल्होत्रा जी ने कहा की सच में नेहालता हम ने तुझे वो सब दिया जो एक माता-पिता अपने बच्चे को दे सकते है। परंतु जब तुम पहले देर से आती थी। या तेरे यार दोस्तों को देख कर अच्छा नहीं लगता था। की मेरी बेटी के ऐसे वाहियात दोस्त है। परंतु हमने कभी तुझे कुछ कहा नहीं और आज कल के बच्चे मानते भी कहां है, कैसे कहे वह तो सुनते ही नहीं। परंतु अब जिस तरह से तू जी रही है। या चल रही हो ये मेरे सपनों की नेहालता है। मैं बचपन से तुझे एक संस्कार लड़की के रूप में देखना चाहता था। जो किसी के प्रेम में डूबे एक बड़े से घर को माला की तरह से पिरो कर रखे। चाहे वो सास हो ननद हो या देवर हो। जीवन देखने में जितना सिधा होता है उतना होता नहीं। आज जो हमारे देश में हो रहा यूरोप की हवा चल रही है। पति-पत्नी अकेले रहना चाहते है। किसी का बीच में दखल देना उन्हें अच्छा नहीं लगाता है।

इस सब बातों से तो यूरोप के लो तंग आ चूके है और हम आपने सुंदर संस्कार और परिवार वाद को खत्म करने पर तुले है। मानव की संरचना कुछ इस प्रकार से है की वह बहु आयामी है। ह्रदय के मामले में भी। जैसे तुम्हारे ह्रदय में माता-पिता, पति का, एक देवर का, सास-ससुर या ननद का प्यार एक अलग-अलग आयाम में कार्य करता है। वहां मानो सभी प्रकार के पुष्प उगे है एक जरा मुरझा गया तो दूसरे से गुलशन महक उठता है। फिर प्रेम फैलता भी है तभी तो बढ़ता है। एक ही चेहरा देख-देख कर आज केवल व्यक्ति वस्तु हो गया है।

हां पिता जी आप ठीक कह रहे है। अगर में आपको अपने दिल की बात बतलाऊं तो ये जो दुर्घटना मेरे साथ घटी मेरे जीवन को यह एक मोड़ दे गई है। ये अब एक परिवर्तन का समय है। जो प्रत्येक प्राणी के जीवन में नहीं आता उसे आगे इंतजार करना होता है। इस जन्म में वह इतनी दूर की छलांग नहीं लगा सकता।

तु ठीक कहती है बेटी तेरी समझ पहले ही बहुत उच्च थी। परंतु उसमें मिलावट थी क्या सही है क्या गलत है। वह हम देख नहीं पाते है, तो ऐसी समझे हम कहां ले जा रही है इस बात का कोई महत्व नहीं होता। पापा आप से एक बात पुछूंगी तो सच-सच बोलोगे। तब मल्होत्रा जी को कुछ शक सुबह हुआ की कहीं वह उसे फंसा तो नहीं रही है। तब उसने हां में गर्दन हिला दी हां बेटी सच ही कहूंगा।

तब नेहालता ने कहां की आप जानते है मैं ऊटी कैसे पहुंची आपने तो मुझे एक नर्सिंग होम में भर्ती कराया था। फिर कैसे में वहां से इतनी दूर ऊटी पहुंच गई। ये सब कैसे घटा क्या आप ने जानकारी निकाली थी की नर्सिंग होम से कैसे में गायब हो गई। नहीं बेटा मैंने लाख जानने की कोशिश की परंतु में जान नहीं पाया परंतु ये सब आप क्यों पूछ रही हो। हां पापा इसी सब में कुछ रहस्य छुपा है जिसे शायद आप नहीं जानते और जान भी नहीं पायेंगे। एक प्रकार से यह मेरा नया जन्म है। और मैं वहां कैसे पहुंची इससे भी अधिक महत्व पूर्ण यह बात है की वहां से मुझे कहां और कौन ले गया। पापा जी आप जान कर आश्चर्य करेंगे की मुझे वहाँ एक कोठे पर बेच दिया गया था। तब उस जगह से में मुझे किसने और कैसे आजाद कराया।

मल्होत्रा जी को इस बात की जरा भी भनक नहीं थी। वह नहीं जानते थे की मेरी बेटी के साथ क्या-क्या गुजरा है। परंतु पापा जी आप को किसी ने यह नहीं बतलाया की मैं एक वेश्यालय में कैसे पहुंच गई थी। इस बात का पता किसी को नहीं था। परंतु ये बात सून कर नेहालता के माता-पिता के रोंगटे खड़े हो गए। तब मल्होत्रा जी ने गर्दन नीची कर ली और पूछा कि ये सब बाते तुम कैसे जानती हो। किस ने तुम्हें बतलाया। हमें इस बात की जारा भी भनक नहीं थी। हमें तो बतलाया गया था की तुम नर्सिंग होम से निकल कर कहीं गायब हो गई हो। क्या इतनी बड़ी घटना हुई। तब वहां स्टाफ और डाक्टर क्या कर रहे थे। या ये सब आपस में मिले है। इन्हीं सब की मिली भगत का ये नतीजा है। न जाने ये लोग पैसे के लिए कितनी लड़कियों का जीवन नर्क कर दे रहे है। तुम्हारी याद दाश्त का उन लोगों ने फायदा उठाया।

खेर छोड़ो पिता जी वो बात गुजर चूकी उस पर पछताने से अब कोई लाभ नहीं है। परंतु मेरी बीमारी से भी अधिक क्या वो हालात खतरनाक नहीं थे। ये बात सून कर श्रीमती मल्होत्रा जी तो रो पड़ी। बेटी, तुमने कितने दूख देख है। ये सब बातों का हम जारा भी ज्ञान नहीं था।

मां, मैंने नहीं झेले में तो एक प्रकार से कोमा में थी। मेरी बुद्धि तो बालवत हो गई थी। मैं तो चाह कर भी वहां से निकल नहीं सकती थी। मैं कुछ जानती भी नहीं थी। परंतु जिस व्यक्ति ने मुझे इस सब से बचाया और अपने साथ लेकर गया। यह वही व्यक्ति था जो मुझे वैद्य जी के पास लेकर गया था। और फिर वह न आपको मिल पाया न ही हम उससे मिल पाये। बात कितनी अधूरी रह गई। हम लोगों को एक बार उस व्यक्ति से जरूर मिलना चाहिए था। मैं तो अंजान थी। क्योंकि मुझे ये सब बातों का  तो जरा भी पता नहीं थी।

ये बाते सुनकर मल्होत्रा जी ने अपने भरी हुई आंखों को कपड़े से पोछा और एक तरफ मुख कर के रोने लगे। हां बेटी हमें लगा की वह कोई भला आदमी था। जो तुम्हें वहां पर लेकर गया था। जल्दी में हम उससे मिल भी नहीं सके। परंतु ये बात तुझे किस ने बतलाई।

नेहालता ने कहां की ये बात उस व्यक्ति ने बतलाई जो उस दिन हमारे घर आया था। यह उस व्यक्ति का दोस्त है। और यहीं मुम्बई की एक कम्पनी में कार्य करता है। आज वह व्यक्ति एक दम से सदमे में है, उसे कुछ होश नहीं। मां आपको याद है रेलगाड़ी जब चल रही थी। तो एक नौ जवान हमारी खिड़की के सामने मिट्टी में सना हुआ कुछ करतब कर रहा था। जिसे तुमने खाना देने की भी कोशिश की थी यही था वह व्यक्ति। और ये सब हमसे अनजाने में हुआ है। इन सब का अगर आज हमें पता चला है, तो क्या हमें अपनी इस भूल को नहीं सुधारने की कोशिश करनी चहिए। नहीं तो ये पाप ये गुनाह हम पर बहुत भारी रहेगा। और कहते-कहते नेहालता एक दम से फफक-फफक कर रो पड़ी। कुछ देर के लिए सारे माहोल में शांति छा गई एक प्रकार से खुशी के साथ दर्द भी वहां के वातावरण में बिखरा फैला समाया हुआ केवल मौन खड़ा देख रहा था। मानो वह कुर्सी के हत्थे के साथ चिपटा हुआ है और आपने जारा उसे छुआ नहीं की दर्द से वह करहा उठेगा। तब बेटी के सर पर हाथ रखते हुए नेहालता की मम्मी ने कहां की सब ठीक हो जायेगा। जब वो समय नहीं रहा तो ये भी नहीं रहेगा। अब जरूर अच्छा समय आने वाला है। लेकिन उसके लिए हम सब को तैयार होना है।

अब हम सब चाय पी लेते है। वह नहीं तो ठंडी हो जायेगी। और रात को खाने के बाद सारा प्रोग्राम बनाते है की आगे क्या करना चाहिए। बेटी तू घबरा मत हम तुम्हारे हर कदम पर तुम्हारे साथ है। सच ही ये परिवर्तन का समय है और प्रत्येक संधि काल ऐसा ही होता है। न वहां प्रकास पहुंचा होता है। और न ही अंधकार लुप्त हुआ होता है। दोनों अपनी पूरी ताकत से एक दूसरे के विरोध कर रहे होते है। परंतु देखना जीत तो एक दिन प्रकाश की होगी। क्योंकि अंधकार का तो कोई अस्तित्व ही नहीं होता।

और इस बात से नेहालता को थोड़ी राहत मिली की उसके साथ उसके माता-पिता भी है। नहीं तो वह सुबह से यही चिंता किए जा रही थी कि कैसे अपने माता पिता को बतलाएगी और कैसे उनसे इस काम के लिए इजाजत मांगेगी। परंतु अब उसे लगता है। उस का मार्ग कितनी आसानी से खुल गया। एक खुशी भी थी उसके मन में। उसका मन कर रहा था कि किसी तरह से उसके पंख लग जाये और वह सोम प्रकाश के पास पहुंच जाये। उसका तन तो यहां मुम्बई में था परंतु मन तो उड़ान भर कर कब का ऊटी पहुंच चूका था। परंतु उसे इस बात के लिए तैयार भी तो होना था। कि वह सोम प्रकाश की देख भाल कर सके। वह तो एक काम भी नहीं जानती। उसने तो कभी खाना भी नहीं बनाया। मां जब कहती थी तो वह टाल जाती थी।

खाने की याद आने पर उसने पापा जी को कहा की मैं तो भूल ही गयी की मैंने काका गिरधारी को आज सांबर बनने के लिए कहा था। और वह किचन में काका गिरधारी लाल के साथ काम करने चली गई। अब नेहलता को खाना बनानेको एक अलग ही सूख मिलता है। जैसे प्रेम हाथों के माध्यम से होकर अपने के ह्रदय तक जाता है। पहले नेहलता को सब बेकार का कार्य लगताथा की मानों स्त्री का जीवन एक किचन की छिपकली जैसा बन कर रह गया है। जब वह अपनी मां को देखती की वह किचन में नाना प्रकार के व्यंजन उसके और पापा के लिए बनाती थी। प्रेम पाश भी कितना चमत्कारी है, वह जैसे-जैसे आपको बांधता है। आप की उड़ान और-और उतंग होती चली जाती है। आज नेहा लता वह सब करना चाहती है। जो उस कुछ सालों पहले एक बोझ लगाता था।

 

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