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शनिवार, 11 अप्रैल 2026

39-सदमा - (उपन्यास) - मनसा - मोहनी दसघरा

 अध्याय-39

(सदमा - उपन्यास)

सुबह उठते ही नानी ने काढ़ा तैयार कर दिया था। जिसे छान कर एक शीशे के गिलास में भर कर रख दिया। नेहा लता सुबह उठ कर दो गिलास ताजा पानी पीती थी। पानी पीने के बाद वह काढ़े का गिलास उठा कर सोम प्रकाश को पीने के लिए ले गई। जिसे उसने मन मार कर, बहुत बुरा सा मुख बना कर पिया। इस के बाद एक ताजा गिलास पानी का पीने के बाद ही उसके मुख का स्वाद कुछ ठीक हुआ। काढ़ा बहुत अजीब स्वाद का था। इसके बाद नेहालता ने वह चिट्ठी उठाई और एक शाल खुद ओढ़ी और एक सोम प्रकाश को ओढ़ने को दी और एक डंडा हाथ में ले कर घूमने के लिए निकल पड़ी। गेट के पास जाकर आवाज दी की नानी जी हम लोग घूमने के लिए जा रहे है। आप को चलना है या नहीं। नानी ने कहां की बेटा कल चलने से बहुत थकावट हो रही है। फिर तुम दोनों दूर तक भी जाते हो। मैं आज नहीं जाती। देखना ज्यादा दूर तक मत जाना। ये पाजी तो तुम्हारे साथ जा ही रहा है। और अपना नाम सुन कर जैसे हरि प्रसाद समझ गया की पाजी उसे ही कहा जा रहा है।

तीनों प्राणी घूमने के लिए निकल पड़े। अभी तक सूर्य उदय हो गया था। परंतु पहाड़ के पीछे बादलों में अभी नारंगी रंग चमक रहा था। सूर्य की किरणों में अभी वह ताप नहीं आया था। परंतु एक सुरमई उजाला हो गया था, पात-पात व पथों पर।

पक्षी अपने-अपने मधुर गीत गा रहे थे। कुछ पक्षी दूर तक लम्बी उड़ानें भर रहे थे। हवा में एक अजीब सी मदहोशी के साथ नई ताजगी थी। कुछ गहरी स्वांस ले कर नेहा लता ने सोम प्रकाश के मौन को तोड़ते हुए कहां की आपका ऊटी सच ही स्वर्ग है। हमारा बम्बई तो धुएं का चेम्बर बन गया है। तब उसने एक बार गोर से सोम प्रकाश की और देखा और पूछा क्या आप जताने है कि हम कहां की रहने वाली है। तब सोम प्रकाश ने कहां हां ......। और वह चुप हो गया। आस पास रास्ते के मुलायम हरी घास पर ओस की बूंदे मोतियों का भ्रम दे रही थी। पास की जंगली झाडियों में लगे पीले और सफेद फूल अधखिले से मद्य होश आंखों से मानो प्रकृति को निहार रहे थे। पक्षी अपना कलरव गान गा-गार उड़ारी भर रहे थे। रास्ते के दोनो और जो विशाल कद्दावर सफेदे के पैड़ गगन को छूने को तैयार खड़े थे। मानो अभी वह बादलों से संवाद करना चाहते है। उनके पतले लम्बे महीन पत्ते झूमते हुए कैसी आवाज कर रहे थे। हवा बहुत मंद-मंद मंथर चाल से चल रही थी। परंतु सुबह के कारण अभी भी ठंडक थी। इसलिए नेहा लता खुद भी शाल ओढ़ी और सोम प्रकाश को भी दी। वह कुछ ही दिनों में ऊटी का मौसम जान गई थी।

रास्ता एक दम से वीरान और शांत था। दूर जहां तक आंखें जा रही थी, मानव की कोई गंध नहीं थी। परंतु खुले आसमान में वीरान पथ पर आप कैसे आपने ही शरीर को फैला हुआ महसूस करते है। मानो एक लम्बा मार्ग तुम्हारा अपना ही होना है। प्रकृति में इतना गहन सन्नाटा था की अगर आपने शब्द बोले तो पल भर के लिए वह थी जम जाने का अहसास दे रहे थे। परंतु हरि प्रसाद अपना खेल खेलता साथ-साथ चल रहा था। करीब एक किलोमीटर चलने के बाद वहां पर एक लेटर बाक्स नेहालता को नजर आया। तब उसने हाथ की चिट्ठी को उस में डाल दिया। अचानक सोम प्रकाश ने उसे प्रश्न भरी नजर से देखा की आपने ये क्या किया है। तब नेहा लता ने कहा की मम्मी-पापा को पत्र लिखा है, की मैं यहां पर ठीक ठाक से हूं। सोमू तुम अपने दोस्त को जानते हो न पेंटल को। तब नेहा लता की बात सून कर सोम प्रकाश थोड़ा झेपा था। की न जाने इस बीच नेहा लता उससे क्या पूछ ले।

परंतु केवल सोम प्रकाश ने हां में गर्दन हिला दी। तब नेहालता समझ की सोम प्रकाश इस विषय में बात करना नहीं चाहते है। इसलिए उसने बात का रूख बदल दिया। दूर पहाड़ पर बादल कैसे उसकी चोटी को पकड़े खड़े से लग रहे थे। मानो वह पहाड़ को छोड़ना ही नहीं चाहते। लेकिन हवा है कि उन्हें उड़ाए लिए जाना चाहती है। आज सोम प्रकाश की चाल पहले से बहुत अच्छी थी। वरना तो इतना चलने पर वह थक जाते थे। और बैठने की जिद्द करने लग जाते थे। परंतु उनके न कहने पर भी उस चिर परिचित पत्थर के पास पहुंच कर नेहालता ने सोम प्रकाश का हाथ पकड़ कर कहां की कुछ विश्राम कर लेते है। आज तो आप काफी चल लिये अभी तक थके नहीं हो। तब सोम प्रकाश ने भी उस पत्थर पर बैठने के लिए हां भरी। वहां बैठ कर दूर दराज प्रकृति का नजारा देखते ही बनता था। बीच-बीच में हरिप्रसाद उन लोगों के पास आकर उनकी खोज खबर भी रखता था। कभी-कभी तो वह एक दम से आंखों से औझल हो जाता था। उसकी इस स्वतंत्रता को देख कर नेहा लता ने सोम प्रकाश को कहां की सोमू अपना हरि प्रसाद है ना देखा आपने कुछ ही दिनों में कितना बड़ा और जवान हो गया। आपको याद है। जब में यहां आई थी तो वह कितना छोटा था। वह मेरी गोद में कैसे सो जाता था। और जिस दिन वह भीग गया था तो कैसे थर-थर कांप रहा था। पहले तो हमारे साथ ही रहता था। पल भर भी दूर नहीं जाता था अब तो वह पास आता ही नहीं ।

सोम प्रकाश नेहा लता की बात सून कर केवल हंस दिए। और वह पत्थर से उठ कर और जरा आगे तक घूमने के लिए चल दिए। तब नेहा ने कहां की अभी थके तो नहीं आप। उस बरगद के वृक्ष तक चलते है। जिस के नीचे भगवान का मंदिर है। वहाँ प्रणाम कर के लोट आयेगे। तब सोम प्रकाश ने केवल हां भी भर दी। रास्ता एक दम से अपने में कैसा एकांत लिए था। दूर तक जहां तक नजर जाती वहीं तक विशाल सफेदे के वृक्ष खड़े बहुत सुंदर लग रहे थे। बस कुछ ही देर में वह मंदिर के पास पहुंच गए वह जगह एक दम से वीरान थी। उसे मंदिर न कह कर एक मढ़ी कहै तो अति उत्तम होगा। परंतु वहां पर एक खास शांति थी। कहते थे यहां पर किसी साधु ने सालों पहले साधना की थी और उसके मरने के बाद उसकी समाधि भी यहीं बना दी गई थी। तब नेहा लता ने सर पर पल्लू कर के भगवान को प्रणाम किया और सोम प्रकाश को करने के लिए भी कहा। सोम प्रकाश ने भी दोनों हाथ जोड़ कर भगवान को प्रणाम किया। फिर पास में ही जो समाधि बनी थी वहां पर अनेक दीपक रखे थे। परंतु इस समय तक सब बूझ गए थे। तब अचानक नेहा लता को लगा की अगर हम तेल और माचिस ले आते तो यहां दीपक जला देते। तब नेहा लता ने सोम प्रकाश को कहां की कल जब हम आयेगे तो यहां पर दीपक जलायेंगे। और वह दोनों वही समाधि के पास बैठ कर कुछ देर ध्यान में डूब गए। इतनी देर में हरि प्रसाद भी अपना भ्रमण पूरा कर के उनके पास पहुंच गया। तब उसने देखा की ये लोग शांत बैठे है तो वह उनके पास ही जरा दूर हट कर चाक चौबंद हो कर बैठ गया।

तब दोनों ने आंखें खोली तो सामने हरि प्रसाद को देख तो मन को बहुत अच्छा लगा। क्योंकि वह एक प्रकार से उनका सुरक्षा गार्ड बन कर उसके साथ चल रहा था। जिस ड्यूटी को वह भली प्रकार निभा रहा था। उसके बाद दोनों उठे और घर की और चल दिये। आज का घूमना नेहा लता को भी बहुत भा रहा था। सोम प्रकाश की चाल में और चेहरे पर जरा सी थकावट नजर आ रह थी। घर पहुंचते-पहुंचते सूर्य काफी उपर आ गया था। परंतु इतने पर भी उसके प्रकाश में कोई खास तेजी नहीं थी। अब भी वह अपने में एक मधुरता एक अलसाया पन एक सौम्यता ही लिए था। दोनो आँगन में बिछी आराम कुर्सी पर बैठ गए। इतनी देर में नानी न जब देखा की दोनों आ गए तो आकर पूछा की चाय बनाने वाली थी। बस तुम्हारा ही इंतजार कर रही थी। अभी दूध नहीं डाला था, पत्ती उबाल कर बंद कर दी थी। तब नेहा लता ने कहां की नानी आप इतनी उम्र में भी कितना काम कर लेती है। क्या हम आपकी उम्र में जाते-जाते ये सब कर पायेंगे। और नानी हंसी। अरे बेटा ये तो कुछ भी नहीं है। हमारे जमाने में जब बरसात हो जाती थी तो लकड़ी से चूल्हा जलाते थे तो हालत खराब हो जाती थी। गीली लड़की जलती कम थी धुआं अधिक देती थी। परंतु आज तो एक बटन दबाओ और गैस जल गई। और नानी चाय लेने लिए अंदर चली गई। पीछे-पीछे नेहा लता भी साथ ही चली गयी। नानी के लाख मना करने पर भी उसे अच्छा नहीं लगता था की नानी काम करें और वह विश्राम करें। नानी ने चाय को छाना और कपों में डाल दिया तब नेहा लता ने उन्हें एक ट्रे में रख कर चल दी। नानी ने पास रखे हरी प्रसाद के बर्तन में कुछ दूध गर्म कर के डाला और उसे दिया वह भी तो बेचारा इंतजार कर रहा था। सब ने साथ बैठ कर चाय पी। और उसके बाद सब ने नहाने की तैयारी की । आज सोम प्रकाश खूद ही नहाने की जिद कर रहा था की मुझे शर्म आती है। इतना बड़ा होने पर भी मुझे बच्चे की तरह से नहलाया जाता है। अब में खुद ही नहा लेता हूं।

और उसकी इस बात से सबको बहुत अच्छा लगा रहा था। नेहालता ने ठंडा और गर्म पानी को मिला कर बर्तन को भर दिया और साबुन तेल तौलिया सब रख कर बहार आ गई। तब जाकर आज सोम प्रकाश अंदर गया परंतु नेहा लता ने कहा की अंदर से कुंडी बंध नहीं करना कोई तुम्हारे पास नहीं आयेगा। परंतु अगर पैर आदि फिसल गया या शरीर का संतुलन बिगड़ गया तो उस और भी कठिनाई हो जायेगा। इस तरह से सेवा भाव देख कर नानी का ह्रदय भर आता था। कितना अपना पन दिखाई दे रहा था इस लड़की में जैसे जन्म से ही हमारे साथ रह रही है। आज के युग में ऐसी लड़की वह शहर की इतना पढ़ी लिखी मिलना मुश्किल है, जिसे ढूंढना अति कठिन है। देखो कल तक ये लड़की हमारे लिए एक अंजान थी। सोम प्रकाश जब इसे घर पर लेकर आया था, तो मुझे को बहुत डर लगा थी। मैं उसी दिन सहम गई थी की कुछ तो बुरा होने वाला है। भला ऐसे भी कोई लाता है। किसी अंजान को तो एक बाल बुद्धि हो। भला कुछ ऊंच नीच हो गया तो ये तो कोई जवाब नहीं देगी बच्चू फंसेंगे तो हम लोग। परंतु उसने किसी की एक न सूनी। परंतु आज नानी सोच रही थी कितना भला काम किया इस लड़की को घर ला कर।

परंतु प्रकृति के ह्रदय में क्या रहस्य है उसने कौन-कौन से बीज जो हमारे कर्म रूप में है दबे पड़े है वो मौसम पा कर अंकुरित तो होंगे ही। परंतु फिर उन फूलों के साथ कुछ कटीले पौधे भी तो हो सकते है। वो हमारे ही कर्म है। तब उनसे कैसे मुक्ति पाई जाए वही तो है तप। आज सब उस तप से गुजर रहे है। पहले तो यह लड़की बाल बुद्धि थी तब तो ये कुछ काम जानती नहीं थी। उपर से इतने बड़े घर की पढ़ी लिखी। उससे क्या कोई इस तरह के जीवन की उम्मीद कर सकता है। कदापि नहीं। परंतु सच इसके भी पिछले जन्मो कोई संजोग या संग था। वरना कैसे प्रकृति मिलाती है।

इतनी देर में नहा लता ने आवाज दी नानी क्या कर रही हो। और नानी के विचारों की तंद्रा टूट गई। सोम प्रकाश नहा कर बाहर आ गया था। अब नानी को नहाने के लिए भेज रही थी। नेहा लता कह रही थी की नानी आ जाओ आपका गर्म पानी मैंने बर्तन में डाल दिया है। फिर ठंडा हो जायेगा। ना-ना करते हुए आज नानी को नहाने के लिए पहले जाना ही पड़ा। जब नानी अंदर से दरवाजा बंद करने लगी तो नेहा ने कहां की नहीं नानी आज मैं आपको नेहा देती हूं। ये सब सून कर नानी को बड़ा अजीब लगा। उसे कुछ शर्म भी आई अरे ना बेटा मैं खूद ही नहा लूंगी। अब इस उम्र में क्या नहाना और क्या न नहाना बस चार लोटे पानी के डाल कर थोड़ा सा तन-मन को चेन मिल जाता है। नानी को आपना जमाना याद आया की धूम में एक कपड़े की औट में जब उनकी सास नहाती थी तो कैसे हर रोज वह उसके बदन पर साबुन लगा कर मसलती थी। हालांकि उस जमाने में हमारे यहां ये खुशबू का साबुन नहीं होता था वह तो खाखी साबुन होता था। आज उसे कोई पहली बार मल-मल के नहला रहा है। उसकी आंखों में आंसू आ गये।

परंतु नेहा लता की जिद्द के सामने उसे झुकना ही पड़ा। साबुन शैम्पू तो वहां रखा होता था परंतु नानी उसका कम ही उपयोग करती थी। ये सब देख कर नेहा लता को अच्छा नहीं लगता था। चलों कोई बात नहीं आपके जमाने में ये सब सुविधा न हो परंतु आज जब है तो आप उसका उपयोग करो। तब उसने नानी के बालो का जूड़ा खोला। और देख कर अचरज कर रही थी की आज भी नानी के बाल उससे लंबे और घने थे। परंतु वह कभी नेहा ने देखे ही नहीं या उस और ध्यान ही नहीं गया। आज नानी का पूरा बदन किसी दूसरे ने सालों बाद देखा था। वह तो कभी जवानी में भी नाना के सामने कपड़े नहीं उतरती थी। परंतु नेहा लता नहीं मानी सो नहीं मानी। अब क्या किया जा सकता है। आखिर कार नानी ने अपने हथियार डाल दिये। और आपने आप को सोप दिया नेहालता के हवाले। आज से पहले कभी नेहा ने किसी दूसरे को नहलाया नहीं था। परंतु फिर एक स्त्री मां भी होती है। इसलिए उसने सर पर पानी डाल का शैम्पू लगा कर खूब झाग उठाये और नानी को कहां की आप अब सारे बदन पर साबुन लगाओ। मैं आपकी पीठ पर अच्छे से रगड़ कर साफ कर देती हूं। आज का नहाना नानी को गद्द-गद्द किए जा था। नेहालता के कोमल मुलायम हाथ। मानो कोई रूई से उसके बदन को सहला रहा था। अंदर बदन का दर्द जब कोई बाहर से सहलाता है, तग वह कैसे उभर कर सामने आ कर मधुरता पूरे बदन में भर जाता है। ये नानी आज उसे महसूस कर रही थी। हाथ पैर खूब अच्छे से मसल कर नानी को जिस प्रेम से आज नहला रही थी। ये सब बाहर बैठा सोम प्रकाश भी देख रहा था और समझने की कोशिश भी कर रहा था। पता नहीं अब उसे कितना समझ में आया या नहीं आया। इसके बाद तौलिया से अच्छे से पोंछ कर नानी को बहार जाकर कपड़े बदलने को कहां। क्यों बेटा यही तो बदलती हूं रोज। परंतु आज के बाद आप यहां कपड़े नहीं बदलेगी। क्या नहीं जानती की इस उम्र में शरीर का संतुलन ठीक नहीं होता। जब आप एक टांग पर खड़े होते हो तो आपके गिरने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए आप तौलिया से बदन पोंछ कर अंदर जाकर आराम से कपड़े बदना। ये सब बातें नानी के साथ जो घट रही थी इस की उसे कभी उम्मीद नहीं थी।

इस बात के विषय में आज तक नानी ने सोचा ही नहीं परंतु नहाने के बाद हजारों आशीष उसने नेहालता को दिए। बेटा जैसा कहूं या बहू जैसा तुम मेरी दोनों ही हो। सच बेटी कभी सोचा नहीं था तुम जैसी बेटी मेरे जीवन में आकर इस बूढापे का ख्याल रखेगी। जरूर सोम प्रकाश ने जीवन में मोती बाटे होगे। ये दूख, पीड़ा या संताप वह जो झेल रहा है ये को कुछ भी नहीं है इस सब के आगे। आप जैसे प्रेम की गंगा को पाने के लिए कोई भागीरथी प्रयास तो करना ही होता है। तब उस आने वाली गंगा की शीतलता के सामने, ऐसे तो हजारों दूख दर्द तो बहुत कम लगते है। आप जैसी बहूं, आप जैसी बेटी किसी अति भाग्यवान को नहीं मिल सकती है। परंतु बेटी ये सब तुमने कहां से सिखा तुम तो बड़े घर से हो। क्या तुम्हारी माता जी ये सब करती थी। हां नानी पिता जी जब नहाते थे तो मां जरूर उनकी पीठ पर साबुन जरूर लगती थी। मुझे ये सब देख कर बहुत अच्छा लगता था। परंतु न जाने क्यों मैंने आज तक अपनी मां को भी कभी साबुन लगा कर नहीं नहलाया। ये तो अचानक आज अंदर से उठा और मैं उस में बह गई।

चारों और से एक खुशी बरस रही थी। इसके बाद नेहा लता ने स्नान किया और फिर सब ने खाना खा कर कुछ घंटो के विश्राम करने के लिए चले गए। जीवन में प्रेम अति महत्व पूर्ण है। आज नेहा लता ने प्रेम के एक पात को छूआ और उस में खूद को डूबो कर सराबोर हुई। प्रेम कोई आदान प्रदान की वस्तु नहीं है। वह तो एक भाव है। जो आपके ह्रदय से एक लहर की तरह से उठता है। सच हम प्रेम को विक्रीत कर रहे है। प्रेम की मांग कर के। प्रेम को तो देने का ही आनंद है। प्रेम कोई भिखारी नहीं है। आप प्रेम करें तुरंत आपको उसका वरदान मिल जायेगा। इंतजार की जरूर नहीं । इस हाथ दे उस हाथ ले।

प्रेम प्रत्येक तरह से एक दूसरे में वृद्धि करता है, एक दूसरे को ऊपर उठाता है। जब प्रेमी एक साथ होता हैं, तो वे प्रसन्नता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचते हैं, और जब वे एक साथ नहीं होते हैं तो वे उदासी की भी गहराइयों तक में ही जरूर पहुंचते हैं। उनकी प्रसन्नता और उदासी उतार-चढ़ाव बहुत विराट होता है: और यही प्रेम होता है। यदि तुम प्रेम में होते हो। यदि तुम अकेले में रोते चीखते हो तो उनमें अधिक गहराई नहीं होती। क्या तुमने इसे देखा है? अकेले में वे उथला हो जाता हैं। जब तुम किसी व्यक्ति के साथ-साथ रोते हो, तब उसमें एक गहराई होती है और तुम्हारे आंसुओं का एक नया आयाम होता है।

वृक्ष को सभी मौसमों में सभी तरह की जलवायु की जरूरत होती है। हां, उसे ग्रीष्म की जलती दोपहरी की और बर्फ जैसी ठंडी शीत ऋतु ऊष्मा की भी जरूरत होती है। और उसे रात्रि की खामोशी की भी जरूरत होती है। जिसमें वह स्वयं अपने को चारों और से बंद कर गहरी नींद में जा सके। उसे शांत, आह्लादित और आनंद पूर्ण दिनों की जरूरत होती है। और उसे धुंधले और बादलों से भरे दिनों की भी जरूरत होती है। वह इन सभी द्वंद्व के द्वारा ही विकसित होता है। क्या ये नियम प्रत्येक प्राणी के लिए उतना ही नहीं है। परंतु मनुष्य ने अपने को प्रकृति से तोड़ लिया है। जिससे कुछ नियम उसके उपर काम करते दिखलाई नहीं देते।

अगर हमें प्रेम को समझे तो एक प्रकार का वह द्वंद्व है। तुम अकेले विकसित नहीं हो सकते। इस बात को अपने अंदर गहरे उतार जाने दो। इस बात का सदा स्मरण रहे कि यदि तुम प्रेम में हो तो किसी वचन बाध्यता से मत बंधो, अपने को थोड़ा खूला रखो, किसी से सम्बन्ध होने से मत बचो। एक बहाव जो तुम्हारे अंदर है उसे मत जमने दो। उसकी तरलता को जीवित रहने दो। एक पूर्ण समग्रता से उसके अंदर जाओ। यदि स्थितियां कहीं अधिक कठिन हो जाती हैं, तो केवल परिधि पर खड़े रहकर भागने को पहले से तैयार मत रहो। यहीं पर मनुष्य कमजारे पड़ रहा है। प्राकृतिक रूप से अगर वह एक कर्म है तो वह अपने से दूर किसी को हटने नहीं देती। परंतु मनुष्य है की उसे ही महान समझ रहा है कि मैं उस पर विजय पा ली। मैं जीत गया। उसके टकराव से बच गया।

प्रेम एक बलिदान भी है। तुम दूर खड़े रहकर उससे बच नहीं सकते। तुम्हें बहुत अधिक बलिदान करना होगा। तुम्हें अपने अहंकार का बलिदान करना होगा। तुम्हें अपनी महत्वाकांक्षाओं का बलिदान करना होगा, तुम्हें अपनी निजता का बलिदान करना होगा, तुम्हें अपनी गोपनियता का बलिदान करना होगा और तुम्हें अनेक चीजों का बलिदान करना होगा। इसलिए आपने देखा की आज रोमांटिक प्रेम अधिक विस्तार पा रहा है। वह एक छलावा है, वह एक दिखावा है, केवल वह मन को बहलाने का एक तरीका है, वह एक उपरी खोल मात्र है वहाँ प्रेम का कोई, रंग नहीं कोई सुस्वाद नहीं है। उसे प्रेम कहना तो प्रेम को अपमानित करना है। इसलिए केवल रोमांटिक प्रेम में ही बने मत रहो, जिसमें किसी भी चीज़ के बलिदान करने की जरूरत नहीं होती। लेकिन जब वहां कोई बलिदान नहीं होता तो वहां कोई विकास भी नहीं हो सकता। वह तो एक प्रकार की थिरता है, मृत है। सब वहां केवल घटता सा दिखाई देता है। परंतु उसमें न सजीवता है न ही प्रेम की गर्मी वह एक मृत प्रायः ही है, उसमें प्राण कहीं भी नहीं है। वह एक नकली फूलों को गुलदस्ता मात्र है।

प्रेम तुम्हें पूर्ण रूप से बदल देता है। वह एक नया जन्म होता है। तुम कभी भी फिर से वही व्यक्ति नहीं रह जाते जैसे तुम एक स्त्री अथवा एक पुरूष से प्रेम करने से पूर्व थे। तुम अग्नि से होकर गुजर चुके हो और तुम निर्मल और विशुद्ध हो गए हो। लेकिन इसके लिए साहस की ज़रूरत होती है। ये साहास इतना सरल नहीं होता जितना दिखाई देता उसके लिए संकल्प की आवश्यता है। उस में डूबने या मिटने के लिए तत्पर होने की हमेशा तैयारी चाहिए।


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