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शुक्रवार, 22 मई 2026

09-मैंने शब्‍द से कहां – कविता- (ओशो की मधुशाला)

 09-मैंने शब्‍द से कहां  कविता

मैंने कुछ शब्‍दों को कहां,

चलोगे हमारे साथ।

हम मिल कर रचेंगे,

एक नया इतिहास।


वो ठिठक कर खड़े ही रह गए,

पल में मुझसे दूर झटक कर

मेरे बुने वो सपने यूं पल ही में दिग-भ्रमित बह गए

मेरी सपनों की गीतांजलि की उखड़ गयी सब सांसे।

और कहने लगी चुप से मेरे कानों में मत बांधो मुझे

इतना संगठित करने अब नहीं है साहस किसी में।

 

मैंने उन्हें समझाया, बुझाया, ओर फुसलाया।

चलो न सही परंतु कोई कुरान, बाइबिल, गीता,

ताओ-ते-चिंग, हम मिल कर क्‍या नहीं रच दे,

उन शब्‍दों ने बड़ी बेरहमी से मुझे घूर कर देखा

 

शायद तोड़ दी उन्होंने अपनी लक्ष्मण रेखा।

सोए हुए को जगाया जा सकता है,

तुम पागलों पे सारा अस्तित्व हंसता है।

क्‍या जागो को क्‍या  जगाया जा सकता है।

मत करो तुम कोशिश फिर से

तुम में नहीं है इतनी प्रज्ञा

पहले जाओ मान सरोवर में करो स्नान

डूबो उस गहराई में करो अमृत पान

तब तुम सरस्वती का करना आवाहन

फिर उठाना कलम.... अभी नहीं।

है तुम्हारे बस में।

 

मैं उन्हें मनाता रहा जरा तो ठहरो

कुछ तो कहो और कुछ मेरी सुनो

लाख मनाया मैं-मनाता ही रह गया

फिर भी वो नहीं मानें मेरी बात

परंतु वो खूद गीत गाते ही चल दिये

मैं अपने सपने सजाये उन्हें निहारता रहा

वो कुछ पल तो ठिठके

और मचलते परंतु चलते-चले गये  

मैं बेबस लाचार उन्हें जाते हुए केवल देखता ही राह

किसी पत्थर की मूर्ति की तरह अविचल सा

परंतु उस क्षण कुछ घटा मेरे जीवन में फैल गई

एक अंजान सी मधुरता मेरे

अंतस में एक जीवंत हो गया

कैसा फैला थी ताजगी उस क्षण मेरे आस पास....

वही मौन मुखर गीतों वृंद गान

कोई पुष्प प्रसाद बन....के चारों और बिखर रहा था

और मैं सच बन गया एक गीत उस पल

कैसी पूर्णता थी उस पल

न कोई छंद न को ताल

बस शब्द ही मौन बन कर गुंज रहे थे।

 

मनसा मोहनी दसघरा 

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