अरण्य का मौन सधन, कहता है कुछ
गुन-गन।
मन का मर्म इति, डरता है तुम
इसकी मत सून।
चीढ़ के पात-पात, झूमता उच्छवास
सा तन
नाच उठता उसका अंग, छूती जब उसे पवन
दूर का कोलाहल नाद कानों में विभेद गुंजन
नाचती लहरो से उठता जल का क्रीड़ा क्रंदन
अंबर पर तैरते, वो धवल मेघ छूते
पर्वत पर
पल-पल करते अठखेलियां,छवियां बनती भ्रम-विधन
कैसे अब टूटती सी दिखती है अपनी ही बेड़ियां
हाय कैसा घुलता मिटता लागे अपना ही तन मन
चेतना के पंख अब खुलने से लगे अब उड़ चल
छूटता सा दिखता है दूर ये धरा और ये गगन
छटने लगे बादल भ्रम के मेरे मन तन पर अब
अपना भी होना उस पल लगा अब कितना सधन
तन का ये भार भी जब छूटने सा है लगने लगा
मुक्त हास बन उड़ चला, अपना ही ये
तन-बदन।
प्रीतम मत आना मेरे द्वार, थक गई
आंखें पंथ निहार।
खुली आंख का न एतबार, जब दर्शा
हुए अंदर के द्वार।
ओशो की मधुशाला
मनसा-मोहनी दसघरा
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