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शनिवार, 30 मई 2026

14 - कंघा--(कविता) - (ओशो की मधुशाला)

 14 - कंघा--(कविता)

हमने तो चाहा था पल भर के लिए

केवल तुम्हारा कंधा,

की जीवन के इस लम्बे सफर की

उघती उस लम्बी थकान में,

कुछ रिश्ते दर्द को सहारा मिले,

लेकिन हाय संसार!

तुमने तो झटक दिया दामन

किसी बेरुखी से।

परंतु देखो मेरा भाग्य,

क्या तुझ पर इतराऊं

या जलन करूं तुझ पर

जो यूं जीवन में आकर

सदगुरु गुरु ने

मेरे थके कदमों को

और झुके सर को

कंधा ही नहीं दिया

हाथ थाम कर बिठा लिया

आपने संग साथ।

सीने से लगा कर

कर दी मेरे जन्मों की

जन्मों-जन्मांतर की थकान को

हर लिया यूं पल भर में

और भर दिया प्राणों में

नव जीवन का एक संचार,

तोड़ दिये सारे बंधन

वो संस्कारों के जाल

जो जमें चल रहे थे

जन्म-जन्म मेरे संग

तेरे छू लेने मात्र से

ये कैसा था चमत्कार

विश्वास नहीं होता अब भी

जब की अंधकार छट गया है

मुझे दिख रहा प्रकाश

दूर क्षितिज से झांक रहा है

अंबर की लालिमा ही कर रही है

एक उद्घोष आनंद उत्सव का

प्यारे ओशो,

न्यारे ओशो,

जग से न्यारे ओशो।

राज  दुलारे  ओशो।

देता सहारे जग को।

(ओशो की मधुशाला)

मनसा-मोहनी दसघरा 

 

 

 

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