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मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

माई डायमंड डे विद ओशो—मां प्रेम शुन्‍यों (अध्‍याय—04)

ऊर्जा दर्शन—(अध्‍याय—04)  

       ओशो 21 मार्च 1953 में बुद्धत्‍व को उपलब्‍ध हुए। उसी दिन से वे उन लोगों की खोज में है जो उन्‍हें समझ सकें। और बुद्धत्‍व को उपलब्‍ध हो सकें। उन्‍होंने उन सैंकड़ों सशस्त्रों की सहायता की है जो आत्‍म-बोध के मार्ग पर है।
      मैंने उन्‍हें कहते सूना है :
      मनुष्‍य की सत्‍य के लिए प्‍यास जन्‍मों-जन्‍मों तक चलती है। कई जन्‍मों के पश्‍चात वह उसे पाने में समर्थ होता है। और जो इसकी खोज करते है सोचते है कि इसकी प्राप्‍ति के बाद वे शान्ति का अनुभव करेंगे। लेकिन जो इसे पाने में सफल हो जाते है, पाते है उन्‍हें पता चलता है कि उनकी सफलता एक नई प्रसव-पीड़ा की शुरूआत है, बिना किसी पीड़ा-मुक्‍ति के। सत्‍य जब एक बार मिल जाता है, एक नई प्रसव-पीड़ा को जन्‍म देती है।
      वे फूल की बात करते है जिसे अपनी सुगन्‍ध बिखेरनी ही है—वे नीर भरे बादल की बात करते है जिसे बरसना ही है।

रविवार, 28 अप्रैल 2013

माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शून्‍यों (अध्‍याय--03)

प्रेम मुख विहीन आता है—(अध्‍याय—03)

       लाओत्से हाउस (ओशो-गृह) एक महाराजा की सम्‍पति था। जिसका चुनाव इसके बीच खड़े बादाम के उस विशाल पेड़ के कारण किया गया था। जिसके रंग गिरगिट की भांति लाल से केसरी पीले फिर हरे रंग में बदल जाते है। इसके मौसम कुछ सप्‍ताह उपरान्‍त बदलते रहते है। और फिर भी मैंने इसकी शाखाओं को कभी पत्र-विहीन नहीं देखा। उधर एक पत्‍ता गिरा कि नया चमकीला हरा पत्‍ता उसका स्‍थान लेने को आतुर होता है। पेड़ के पत्‍तों की छाया के नीचे एक छोटा सा झरना है और एक रॉक गार्डन है। जिसका निर्माण एक सनकी दीवाने इटालियन ने किया था। जो उसके बाद कभी दिखाई नहीं दिया।
      कुछ ही वर्षों में यह उद्यान ओशो के जादुई स्‍पर्श से एक जंगल बन गया है—यहां बांस के उपवन है, हंस-सरोवर है। एक श्‍वेत संगमरमर का जल प्रपात है जो रात्रि में नीले प्रकाश से जगमगा उठता है और जैसे ही जल छोटे-छोटे कुंडों में से गुजरता है, वे कुंड सुनहरे पीले प्रकाश से चमकने लगते है। राजस्‍थान की खदानों से लाई गई विशाल चट्टानें, लाइब्रेरी की ग्रेनाइट पत्‍थर से बनी काली दीवारों की पृष्‍ठभूमि में सुर्य की रोशनी में जगमगा उठती है। यहां एक जल मार्ग और जापानी ढंग का पूल है। एक गुलाब वाटिका है जहां(बिना मौसम के) गुलाब खिलते है। और रात्रि के समय इसमे रोशनी की जाती है ताकि विदूषक की भांति यथार्थ वादी चकाचौंध करने वाले रंगों को लिये ये गुलाब, जरा ठहरकर,खड़े होकर ओशो के भोजन कक्ष की और निहार सकें।

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

(माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शून्‍यों (अध्‍याय--02)

ज्‍योतिर्मय अंधकार—(अध्‍याय—02)

       भारत में पूना के एक होटल में प्रथम रात्रि व्‍यतीत करने के बाद मैंने सत्‍य की खोज का परित्‍याग करने का निश्‍चय किया। यह होटल बाहर से देखने में अच्‍छा लग रहा था। मैं भारतीय हवाई-अड्डे और रेलवे स्‍टेशन के अपने प्रथम अनुभव के उपरान्‍त थकी-घबराई, कुछ डांवाडोल सी यहां पहुंची थी। स्‍टेशन किसी शरणार्थी शिविर जैसा लग रहा था। वहां प्‍लेटफार्म के ठीक मध्‍य में लोग अपने पूरे परिवार के साथ गठरियों पर सोये हुए थे। और दूसरे यात्री उनके उपर से; उनके आसपास से आ-जा रहे थे। लंगड़े-लूले व भूखे से पीड़ित लोग मेरी और टूट पड़े। भीख मांगने लगे और मुझे यूं घूरकर देखने लगे जैसे मुझे ही खा जाएंगे। कुली और टैक्‍सी ड्राइवर एक दूसरे पर चिल्‍ला रहे थे। हाथापाई कर रहे थे। एक दूसरे के मुंह पर घूंसे मार रहे थे। और सवारी लेने के लिए एक दूसरे का लगभग गला ही घोंट रहे थे। चारों और हजारों लोग-लोग, जनसंख्‍या विस्‍फोट।

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

महसाना एक परिक्रमा-(भाग 2)

स्‍वामी देवातीत शास्‍ता--

      स्‍वामी देवातीत शास्‍ता का असली नाम ईश्‍वर लाल प्रजापति है। वह गुजरात के एक गांव रुद्रा बीजा पूर में गरीब घर में पैदा हुए। किसी तरह से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्‍हें एक सरकारी स्‍कूल में अध्‍यापक की नौकरी मिल गई। नौकरी के बाद परिवार ने उनकी शादी कर दी। परन्‍तु कुदरत को तो शायद कुछ और ही मंजूर था। पत्‍नी का स्‍वभाव बहुत दुष्ट था। वह बात-बात में लड़ने मरने के लिए तैयार हो जाती थी। लेकिन जिस तरह से स्‍वामी का स्वभाव आज है उसी तरह से वह बचपन से ही शांत प्रकृति के थे। समय गुजरता चला गया। लेकिन घर में कोई औलाद नहीं हुई। स्‍वामी देवातीत ने तो इसे भगवान का वरदान मान कर स्‍वीकार कर लिया परंतु पत्‍नी और-और हिंसक होती चली गई। और बात इतनी बढ़ी की एक दिन घर छोड़ कर मायके चली गई इस के बाद कभी नहीं लोटी। मिलने के लिए जितनी ही बार गये तो केवल स्‍वामी जी। ताकी उन्‍हें आर्थिक रूप से तंगी न हो। लेकिन वहां भी वह अपनी आदत नहीं छोड़ पाई। और वहां पर भी वह अपनी परिवार के साथ लड़ती झगड़ती रही।

बुधवार, 24 अप्रैल 2013

माई डायमंड डे विद ओशो--मां प्रेम शून्‍यों

मैं यहीं हूं  (अध्‍याय—1 )

       कुछ कहना है?
      एक आवाज भीतर पुकार-पुकार कर कहती है। मैं यहीं हूं, मैं यहीं हूं। मैं अवाक हूं। और तभी वे आंखें।
      जब गुरु शिष्‍य की आंखों में देखता है, यह देखता है, और वह देखता है। वह पूरी कहा कहानी देख रहा है अतीत वर्तमान और भविष्‍य—सभी कुछ। गुरु के सामने शिष्‍य पारदर्शी है। और यह उसमें छिपे अप्रकट बुद्ध को देख सकता है। मैं वहां बैठी ही रह सकती थी ताकि वे मेरे भीतर तक पहुंच जाएं.....क्‍योंकि हीरे को पाने का बस यही एकमात्र उपाय है। भीतर एक भय है कि कहीं वे मेरे अचेतन में पड़ी उन बातों को ने देख लें। जिन्‍हें मैं छिपाए रखना चाहती थी। परंतु वह मेरी ओर ऐसी प्रेम पूर्ण दृष्‍टि से देखते है कि मैं केवल इतना ही कह पाती हूं, हां।
      कभी-कभी ऐसी दृष्‍टि-स्‍मृति पटल पर कोई चिन्‍ह छोड़ सकती बस एक हर्षोल्‍लास की अनुभूति, एक आनन्‍द पूर्ण ऊर्जा का ज्‍वार मुझे अश्रु धारा में बह जाने के लिए छोड़ जाता है।
      बुद्ध पुरूष ओशो से यह मेरी प्रथम भेंट थी। यह सन 1976 की बात है। भारत में यह बसंत का मौसम था।

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

महसाना मनन नीयो--कम्‍युन (एक परिक्रमा) भाग--1

ओशो मनन नियो-संन्‍यास कम्‍यून महसाना गुजरात। महसाना-अहमदाबाद मार्ग पर रेलवे ओवर ब्रिज के पास पलावासना में एक सुंदर रमणीक एकांत में बना है। ओशो इसी मार्ग से अनेक बार माऊँ टाबू शिविर लेने के लिए जाते थे। एक दिन अचानक कार को रूकवाया और उसे पीछे ले जाने के लिए कहा। और आज जहां कम्‍यून बना है उस और इशारा कर के कहां। देखो उसे वह कितनी सुंदर जगह ध्‍यान और मौन लिए खड़ी है। वहां जगह केवल ध्‍यान के लिए बनी है। वहां कुछ करो, साधकों के लिए यहां पर एक आश्रम बनाओ। और ठीक कुछ दिनों बाद वहां की जमीन खरीद ली गई और वहां पर आश्रम का काम चलने लगा। ओशो के अमेरिका से आने के बाद यहां के ट्रस्‍टी ओशो से मिलने मनाली गए और चाहा की यह आश्रम की जमीन बेच कर ओशो के लिए धन एकत्रित किया जाये। बाद में ओशो से भेट होने के बाद जब उन्‍हें यह स्थान बेचने को कहां तो ओशो हंस दिये। और कहां की नहीं तुम नहीं जानते यह जगह भारतीय संन्यासियों के काम आयेगी।

रविवार, 21 अप्रैल 2013

एक प्रेम प्रीत की पाती जो......कविता

बहता जीवन पल-पल उत्‍सव
कल-कल बहता झरना बन जा
कुछ मधुर राग किन्‍हीं छंदों में
कानों में आकर कुछ कह जा
देखो मेरे तुम उत्‍सव को
नित खेल खेलता अटखेली
वह नहीं पकड़ता दीवारे
बह नहीं बाँधता बंधन हार
नित रूप बदलता जाता है
जीवन के काल चक्र पर वो
वह नहीं देखता मुड़कर कल
वह नहीं सिमटना चाहत में
न तटबंध की दीवारों में

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

तुम हो एक अंधकार

कुछ दीवारें दे  रही थी
एक रूप और आकर का भ्रम मुझे
गिरा दिया मैंने उसे एक रात के अंधेरे में
थी एक पकड़ वह भी मेरे होने की
जो चिपक गई थी
किसी कोने में अंहकार बन कर
की में हूं एक रूप,
जो देता था मुझे एक गुरूर
उस होनी-अनहोनी से हमने
मोड़ लिया मुख इक मोड़ पर जाकर

अपनी नींद में ध्‍यान कैसे करें—

धीरे-धीरे ध्‍यान तुम्‍हारे संपूर्ण जीवन में व्‍याप्‍त हो जाना चाहिए। यहां तक की सोने के लिए जाते समय भी।
बिस्‍तर पर लेटने पर कुछ ही मिनटों में तुम नींद की गोद में चले जाओगे। इन कुछ मिनटों में मौन, अँधेरा और विश्रांत शरीर इनके संबंध में सजग रहो। जब तक पूरी तरह से नींद न आ जाए तब तक ऊँघते समय सजग रहो और तुमको आश्‍चर्य होगा। जब तक पूरी तरह नींद आती है तब तक के अंतिम क्षण तक यदि तुम ऐसा अभ्‍यास जारी रखते हो तो फिर सुबह में भी पहला विचार सजगता के संबंध में ही होगा। सोते समय जो तुम्‍हारा अंतिम विचार होगा वही सुबह में जागने पर पहला विचार होगा क्‍योंकि तुम्‍हारी नींद के दौरान यह अंतर-प्रवह के रूप में जारी रहता है।

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

प्रश्‍न–एक पुरूष और एक स्‍त्री के बीच किस प्रकार का प्रेम संबंध की संभावना है, जो की सेडोमेसोकिज्‍म (पर-आत्‍मपीड़क) ढांचे में न उलझा हो?

 प्रश्‍न–एक पुरूष और एक स्‍त्री के बीच किस प्रकार का प्रेम संबंध की संभावना है, जो की सेडोमेसोकिज्‍म (पर-आत्‍मपीड़क) ढांचे में न उलझा हो?

ओशो—यह एक अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण प्रश्‍न है। धर्मों ने इसे असंभव कर दिया है। स्‍त्री और पुरूष के बीच कोई भी सुंदर संबंध—इसे नष्‍ट कर दिया है। इसे नष्‍ट करने के पीछे कारण था।
      यदि व्‍यक्‍ति का प्रेम जीवन परिपूर्ण है। तुम पुजा स्‍थलों पर बहुत से लोगों को प्रार्थना करते हुए नहीं पाओगे। वे प्रेम क्रीड़ा कर रहे होंगे। कोई चिंता करता है उन मूर्खों की जो धर्मस्‍थलों पर भाषण दे रहे है। यदि लोगों को प्रेम जीवन पूर्णतया संतुष्‍ट और सुंदर हो वे इसकी चिंता नहीं करेंगे कि परमात्‍मा है या नहीं। धर्म ग्रंथ में पढ़ाई जाने वाली शिक्षा सत्‍य है या नहीं। वे स्‍वयं से पूरी  तरह संतुष्‍ट होंगे। धर्मों ने तुम्‍हारे प्रेम को विवाह बना कर नष्‍ट कर दिया है।