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शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--20


नानक नदरी नदरि निहाल—(प्रवचन—बीसवां)

पउड़ी: 38
जतु पहारा धीरजु सुनिआरुअहरणि मति वेदु हथीआरु।।
भउ खला अगनि तपताउ। भांडा भाउ अमृत तितु ढालि।।
घड़ीए सबदु सची टकसालु। जिन कउ नदरि करमु तिन कार।।
'नानक' नदरी नदरि निहाल।।

सलोकु:

पवणु गुरु पाणी पिता माता धरति महतु
दिवस राति दुइ दाई दाइआ खेले सगलु जगतु।।
चंगिआइआ बुरिआइआ वाचै धरमु हदूरि
करमी आपा आपणी के नेड़े के दूरि।।
जिनी नामु धिआइआ गए मसकति घालि
'नानक' ते मुख उजले केती छूटी नालि।।



जतु पहारा धीरजु सुनिआरुअहरणि मति वेदु हथीआरु।।
भउ खला अगनि तपताउ। भांडा भाउ अमृत तितु ढालि।।
घड़ीए सबदु सची टकसालु। जिन कउ नदरि करमु तिन कार।।
'नानक' नदरी नदरि निहाल।।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--19


सच खंडि वसै निरंकारु—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)

पउड़ी: 37

करम खंड की वाणी जोरु। तिथै होरु न कोई होरु।।
तिथै जोध महाबल सूर। तिन महि राम रहिआ भरपूर।।
तिथै सीतो सीता महिमा माहि। ताके रूप न कथने जाहि।।
न ओहि मरहि न ठागे जाहि। जिनकै राम बसै मन माहि।।
तिथै भगत वसहि के लोअ। करहि अनंदु सचा मनि सोइ।।
सच खंडि वसै निरंकारु। करि करि वेखै नदरि निहाल।।
तिथै खंड मंडल बरमंड। जे को कथै त अंत न अंत।।
तिथै लोअ लोअ आकार। जिव जिव हुकमु तिवै तिव कार।।
वेखै विगसे करि वीचारु। 'नानक' कथना करड़ा सारु।।


नुष्य असहाय है। लेकिन तभी तक, जब तक परमात्मा से दूर है। मनुष्य दुर्बल है, दरिद्र है, दीन है, लेकिन तभी तक, जब तक परमात्मा से दूर है। उससे हमारी दूरी ही हमारी दरिद्रता है। और जितने हम उससे दूर होते जाते हैं, उतना ही जीवन अर्थहीन होता जाता है।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--18


नानक अंतु न अंतु—(प्रवचन—अट्ठाहरवां) 

पउड़ी: 35
धरम खंड का एहो धरमु।
गिआन खंड का आखहु करमु।।
केते पवन पाणि वैसंतर केते कान महेस।
केते बरमे घाड़ति घड़िअहि रूप रंग के वेस।।
केतीआ करम भूमी मेर केते केते धू उपदेस।
केते इंद चंद सूर केते केते मंडल देस।।
केते सिध बुध नाथ केते केते देवी वेस।
केते देव दानव मुनि केते केते रतन समुंद।।
केतीआ खाणी केतीआ वाणी केते पात नरिंद।
केतीआ सुरती सेवक केते 'नानक' अंतु न अंतु।।


पउड़ी: 36

गिआन खंड महि गिआनु परचंड।
तिथै नाद विनोद कोउ अनंदु।।
सरम खंड की वाणी रूपु।
तिथै घाड़ति घड़ीऐ बहुतु अनूपु।।
ताकीआ गला कथीआ ना जाहि।
जे को कहै पिछै पछुताइ।।
तिथै घड़ीऐ सुरति मति मनि बुधि।
तिथै घड़ीऐ सुरा सिधी की सुधि।।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--17


करमी करमी होइ वीचारु—(प्रवचन—सतरहवां)

पउड़ी: 34

राती रुति थिति वार। पवन पानी अगनी पाताल।।
तिसु विचि धरती थापि रखी धरमसाल।
तिसु विचि जीअ जुगुति के रंग। तिनके नाम अनेक अनंत।।
करमी करमी होइ वीचारु। साचा आप साचा दरबारु।।
तिथै सोहनि पंच परवाणु। नदरी करमी पवै नीसाणु।।
कच पकाई ओथै पाइ। 'नानक' गाइआ जापै जाइ।।


नानक के सूत्र के पहले कुछ बातें समझ लेनी जरूरी हैं।
पहली बात, कि जीवन को जो लक्ष्य मान लेता है, वह भटक जाता है। जीवन केवल एक अवसर है, लक्ष्य नहीं। मार्ग है, गंतव्य नहीं। उससे कहीं पहुंचना है। जीवित होने से ही मत समझ लेना कि पहुंच गए। जीवन कोई सिद्धि नहीं है, केवल एक प्रक्रिया है। उससे ठीक से गुजरे, तो पहुंच जाओगे। ठीक से न गुजरे, तो भटक जाओगे।

बुधवार, 5 नवंबर 2014

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--16


नानक उतमु नीचुकोइ—(प्रवचन—सोलहवां)

पउड़ी: 32

इकदू जीभौ लख होहि लख होवहि लख बीस।
लखु लखु गेड़ा अखिअहि एक नामु जगदीस।।
एतु राहि पति पवड़ीआ चड़ीए होइ इकीस।
सुणि गला आकास की कीटा आई रीस।।
'नानक' नदरी पाईए कूड़ी कूड़ै ठीस।।

पउड़ी: 33

आखणि जोरु चुपै नह जोरू। जोरु न मंगणि देणि न जोरू।।
जोरु न जीवणि मरणि नह जोरू। जोरु न राजि मालि मनि सोरू।।
जोरु न सुरति गिआनु वीचारि। जोरु न जुगती छुटै संसारू।।
जिसु हथि जोरू करि वेखै सोइ। 'नानक' उतमु नीचुकोइ।।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--15


जुग जुग एको वेसु—(प्रवचन—पंद्रहवां)

पउड़ी: 30

एका माई जुगति विआई तिनि चेले परवाणु।
इकु संसारी इकु भंडारी इकु लाए दीवाणु।।
जिव तिसु भावै तिवै चलावै जिव होवै फुरमाणु।
ओहु वेखै ओना नदरि न आवै बहुता एहु विडाणु।।
आदेसु तिसै आदेसु।।
आदि अनीलु अनादि अनाहतु जुग जुग एको वेसु।।

पउड़ी: 31

आसणु लोइ लोइ भंडार। जो किछु पाइआ सु एका वार।।
करि करि वेखै सिरजनहार। नानक सचे की साची कार।।
आदेसु तिसै आदेसु।।
आदि अनील अनादि अनाहतु जुग जुग एको वेसु।।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--14


आदेसु तिसै आदेसु—(प्रवचन—चौदहवां)

पउड़ी: 28

मुंदा संतोखु सरमु पतु झोली धिआन की करहि बिभूती।
किंथा कालु कुआरी काइआ जुगति डंडा परतीति।।
आई पंथी सगल जमाती मनि जीतै जगु जीत।।
आदेसु तिसै आदेसु।।
आदि अनीलु अनादि अनाहति। जुगु जुगु एको वेसु।।


पउड़ी: 29

भुगति गिआनु दइआ भंडारणि घटि घटि बाजहि नाद।
आपि नाथु नाथी सभ जा की रिधि सिधि अवरा साद।।
संजोगु विजोगु दुइ कार चलावहि लेखे आवहि भाग।।
आदेसु तिसै आदेसु।।
आदि अनीलु अनादि अनाहति। जुगु जुगु एको वेसु।।

सोमवार, 3 नवंबर 2014

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--13


सोई सोई सदा सचु साहिबु—(प्रवचन—तेरहवां)

पउड़ी: 27

सो दरु केहा सो घरु केहा जितु बहि सरब समाले।
बाजे नाद अनेक असंखा केते वावणहारे।।
केते राग परी सिउ कहीअनि केते गावणहारे।
गावहि तुहनो पउणु पाणी वैसंतरु गावे राजा धरम दुआरे।।
गावहि चितगुपतु लिखि जाणहि लिखि लिखि धरमु वीचारे।
गावहि ईसरु बरमा देवी सोहनि सदा सवारे।।
गावहि इंद इंदासणि बैठे देवतिया दरि नाले।
गावहि सिध समाधी अंदरि गावनि साध विचारे।।
गावनि जती सती संतोखी गावहि वीर करारे।
गावनि पंडित पड़नि रखीसर जुगु जुगु वेदा नाले।।
गावनि मोहणीआ मनु मोहनि सुरगा मछ पइआले।
गावनि रतनि उपाए तेरे अठसठि तीरथ नाले।।
गावहि जोध महाबल सूरा गावहि खाणी चारे।
गावहि खंड मंडल वरमंडा करि करि रखे धारे।।
सेई तुधनो गावनि जो तुधु भावनि रते तेरे भगत रसाले।
होरि केते गावनि से मैं चिति न आवनि नानकु किया विचारे।।
सोई सोई सदा सचु साहिबु साचा साची नाई।
है भी होसी जाई न जासी रचना जिनि रचाई।।
रंगी रंगी भाती करि करि जिनसी माइआ जिनि उपाई।
करि करि वेखै कीता आपणा जिव तिस दी बडिआई।।
जो तिसु भावै सोई करसी हुकमु न करणा जाई।
सो पातिसाहु साहा पातिसाहिबु नानक रहणु रजाई।।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--12


आखि आखि रहे लिवलाइ—(प्रवचन—बारहवां)

पउड़ी: 26


अमुल गुण अमुल वापारअमुल वापारीए अमुल भंडार।।
अमुल आवहि अमुल लै जाहिअमुल भाव अमुला समाहि।।
अमुलु धरमु अमुलु दीवाणुअमुलु तुलु अमुलु परवाणु।।
अमुलु बखसीस अमुलु नीसाणुअमुलु करमु अमुलु फरमाणु।।
अमुलो अमुलु आखियाजाइआखि आखि रहे लिवलाइ।।
आखहि वेद पाठ पुराण। आखहि पड़े करहि वखियाण।।
आखहि बरमे आखहि इंदआखहि गोपी तै गोविंद।।
आखहि ईसर आखहि सिधआखहि केते कीते बुध।।
आखहि दानव आखहि देव। आखहि सुरि नर मुनि जन सेव।।
केते आखहि आखणि पाहिकेते कहि कहि उठि उठि जाहि।।
एते कीते होरि करेहि। ता आखिसकहि केई केइ।।
जेवडु भावै तेवड होइ। 'नानक' जाणै साचा सोइ।।
जे को आखै बोल बिगाडु। ता लिखीए सिरि गावारा गावारु।।

रविवार, 2 नवंबर 2014

एक अोंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--11


ऊचे उपरि ऊचा नाउ—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

पउड़ी: 24

अंतुसिफती कहणिअंतुअंतुकरणै देणिअंतु।।
अंतुवेखणि सुणणिअंतुअंतुजापै किआ मनि मंतु।।
अंतुजापै कीता आकारु। अंत न जापै पारावारु।।
अंत कारणि केते बिललाहिताके अंत न पाए जाहि।।
एहु अंत न जाणै कोइ। बहुता कहिऐ बहुता होइ।।
वडा साहिबु ऊचा थाउऊचे उपरि ऊचा नाउ।।
एवडु ऊचा होवे कोइतिसु ऊचे कउ जाणै सोइ।।
जेवड आपि जाणै आपि आप। 'नानक' नदरी करमी दाति।।


पउड़ी: 25

बहुता करम लिखिआजाइ। बडा दाता तिलु न तमाइ।।
केते मंगहि जोध अपार। केतिआ गणत नही वीचारु।।
केते खपि तुटहि वेकार
केते लै लै मुकरु पाहिकेते मूरख खाही खाहि।।
केतिआ दूख भूख सद मार। एहि भी दाति तेरी दातारि।।
बंदि खलासी भाणै होइ। होरु आखिसकै कोइ।।
जे को खाइकु आखणि पाइ। ओहु जाणै जेतिआ मुहि खाइ।।
आपे जाणै आपे देइआखहि सि भि केई केइ।।
जिसनो बखसे सिफति सालाह'नानक' पातिसाही पातिसाहु।।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--10


 आपे जाणै आपु—(प्रवचन—दसवां)

पउड़ी: 22

पाताला पाताल लख आगासा आगास
ओड़क ओड़क भालि थके वेद कहनि इक बात।।
सहस अठारह कहनि कतेबा असुलू इकु धातु।
लेखा होइ त लिखीऐ लेखै होइ विणासु।।
नानक बडा आखीए आपे जाणै आपु।।

 पउड़ी: 23

सालाही सालाहि एती सुरति न पाइया
नदिआ अतै वाह पवहि समुंदिजाणी अहि।।
समुंद साह सुलतान गिरहा सेती मालुधनु
कीड़ी तुलिहोवनी जे तिसु मनहु न वीसरहि।।

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2014

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--09


आपे बीजि आपे ही खाहु—(प्रवचन—नौवां)

पउड़ी: 20

भरीए हथु पैरु तनु देह। पाणी धोतै उतरसु खेह।।
मूत पलोती कपड़ होइ। दे साबूणु लईऐ ओहु धोइ।।
भरीऐ मति पापा के संगि। ओहु धोपै नावै कै रंगि।।
पुंनी पापी आखणु नाहि। करि करि करणा लिखि लै जाहु।।
आपे बीजि आपे ही खाहु। 'नानक' हुकमी आवहु जाहु।।

पउड़ी: 21

तीरथ तपु दइआ दतु दानु। जे को पावै तिलका मानु।।
सुणिआ मंनिया मनि कीता भाउ। अंतरगति तीरथि मलि नाउ।।
सभि गुणु तेरे मैं नाही कोई। विणु गुण कीते भगति न होइ।।
सुअसति आथि बाणी बरमाउ। सति सुहाणु सदा मनि चाउ।।
कवणु सुवेला वखतु कवणु। कवणु थिति कवणु वारु।।
कवणि सि रुती माहु। कवणु जितु होआ आकारु।।
वेल न पाईआ पंडती। जि होवै लेखु पुराणु।।
वखतु न पाइओ कादीआ। जि लिखनि लेखु कुराणु।।
थिति वारू ना जोगी जाणै। रुति माहु न कोई।।
जा करता सिरठी कउ साजै। आपे जाणै सोई।।
किव करि आखा किव सालाही। किउ वरनी किव जाणा।।
'नानक' आखणि सभु को आखै। इकदू इकु सिआणा।।
बडा साहिबु बडी नाई। कीता जा का होवै।।
'नानक' जे को आपौ जाणै। अगै गइया न सोहै।।

एक ओंकार सतनाम (गुरू नानक) -प्रवचन--08


जो तुधु भावै साई भलीकार—(प्रवचन—आठवां)

पउड़ी: 17 

असंख जप असंख भाउ। असंख पूजा असंख तप ताउ।।
असंख गरंथ मुखि वेद पाठ। असंख जोग मनि रहहि उदास।।
असंख भगत गुण गिआन वीचारअसंख सती असंख दातार।।
असंख सूर मुह भख सार। असंख मोनि लिव लाइ तार।।
कुदरति कवण कहा वीचारुवारिआ न जावा एक बार।।
जो तुधु भावै साई भलीकार। तू सदा सलामति निरंकार।।

पउड़ी: 18

असंख मूरख अंध घोर। असंख चोर हरामखोर।।
असंख अमर करि जाहि जोर। असंख गलबढ़ हतिआ कमाहि।।
असंख पापी पापु करि जाहिअसंख कुड़िआर कूड़े फिराहि।।
असंख मलेछ मलु भखि खाहिअसंख निंदक सिरि करहि भारू।।
'नानक' नीचु कहै वीचारुवारिआ न जावा एक बार।।
जो तुधु भावै साई भलीकार। तू सदा सलामति निरंकार।।

पउड़ी: 19

असंख नाव असंख थावअगंम अगंम असंख लोअ।।
असंख कहहि सिरि भारु होई।
अखरी नामु अखरी सालाह। अखरी गिआनु गीत गुण गाह।।
अखरी लिखणु बोलणु वाणि। अखरा सिरि संजोगु बखाणि।।
जिनि एहि लिखे तिसु सिर नाहिजिव फुरमाए तिव तिव पाहि।।
जेता कीता तेता नाउविणु नावै नाही को थाउ।।
कुदरति कवण कहा वीचारुवारिआ न जावा एक बार।।
जो तुधु भावै साई भलीकार। तू सदा सलामति निरंकार।।