सूत्र:
बिनु
देखे उपजै नहि
आसा। जो दीसै
सो होई बिनासा।।
बरन
सहित जो जापै
नामु। सो जोगी
केवस निहकामु।।
परचै
राम रवै जो
कोई। पारसु
परसै ना
दुबिधा होई।।
सो
मुनि मन की
दुबिधा खाइ।
बिनु द्वारे
त्रैलोक
समाई।।
मन
का सुभाव सब
कोई करै। करता
होई सु अनभे
रहै।।
फल
कारण फूली
बनराइ। फलु
लागा तब फूल
बिलाई।।
ग्यानै
कारन कर अभ्यासू।
ग्यान भया
तहं करमैं
नासू।।
घृत
कारन दधि मथै
सयान जीवन
मुकत सदा
निरवान।।
कहि
रविदास परम
बैराग। रिदै
राम को न जपसि
अभाग।।

