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गुरु-परताप साध की संगति—(संत भीखादास) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

गुरू प्रताप साध की संगति--(प्रवचन--11)

गगन बजयो बेनु—(प्रवचन—ग्यारहवां)
दिनांक 31 मई, 1979;
ओशो कम्युन, पूना।
सूत्र:
ब्राह्मन कहिये ब्रह्म—रत, है ताका बड़ भाग।
नाहिंन पसु अज्ञानता, गर डारे तिन ताग।।

संत—चरन में लगि रहै, सो जन पावै भेव।
भीखा गुरु—परताप तें, काढेव कपट—जनेव।।

संत चरन में जाइकै, सीस चढ़ायो रेनु।
भीखा रेनु के लागते, गगन बजायो बेनु।।


बेनु बजायो मगन ह्लै, छूटी खलक की आस।
भीखा गुरु—परताप तें, लियो चरन में बास।।

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

गुरू प्रताप साध की संगति--(प्रवचन--10)

मेरा पथ तो मुक्त गगन—(प्रवचन—दसवां)

दिनांक 30 मई, 1979;
ओशो कम्युन पूना।
प्रश्‍नसार:
1—भगवान! मेरे मन में बहुत द्वन्द्व है कि आपके पास आकर मुझे समाधान मिलेगा या नहीं! मैं बहुत उलझन में हूं। मेरा मन ऐसी चीजों से ग्रस्त है, जो स्वीकार्य नहीं हैं। जब मैं अपने में होती हूं, तो उनके साथ समायोजित हो जाती हूं, लेकिन आपके पास पहुंचकर मेरे उपद्रव बढ़ जाते हैं और मैं घबड़ा जाती हूं। मेरा व्यक्तित्व ज्यादा हठी और संदेहशील हो गया है; इस कारण अभी समर्पण कठिन है। इसके बावजूद मुझे आश्रम आने का जी बहुत होता है।
2—भगवान! झाबुआ के निकट पच्चीस सौ पच्चीस हवन—कुंड बनाकर यज्ञ हो रहा है। सुना है, यह पृथ्वी का सबसे बड़ा यज्ञ है, जिसकी तथाकथित पंडे—पुरोहित और राजनीतिज्ञ बड़ी तारीफ कर रहे हैं।
और दूसरी और आप जिस मंदिर और जीवनत्तीर्थ के निर्माण में लगे हैं, उसमें ये ही लोग बाधा डाला रहे हैं। लगता है, यह इन तथाकथित पंडे—पुरोहितों और राजनीतिज्ञों की सांठ—गांठ है। ऐसा क्यों?
3—भगवान! मैं कवि हूं, क्या सत्य को पाने लिए यह पर्याप्त नहीं है?

सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

गुरू प्रताप साध की संगति--(प्रवचन--09)

पाहुन आयो भाव सों—(प्रवचन—नौवां)
दिनांक 29 मई, 1979;
ओशो कम्युन, पूना।
सूत्र:
पाहुन आयो भाव सों, घर में नहीं अनाज।।
घर में नहीं अनाज, भजन बिनु खाली जानो।
सत्यनाम गयो भूल, झठ मन माया मानो।।
महाप्रतापी रामजी, ताको दियो बिसारि
अब कर छाती का हनो, गये सो बाजी हारि।।
भीखा गये हरिभजन बिनु तुरतहिं भयो अकाज।
पाहुन आयो भाव सों, धर में नहीं अनाज।।

वेद-पुरान पढ़े कहा, जो अच्छर समुझा नाहिं।।
अच्छर समुझा नाहिं, रहा जैसे का तैसा।।
परमारथ सों पीठ, स्वार्थ सनमुख होइ बैसा।।
सास्तर मत को ज्ञान, करम भ्रम में मन लावै
छुइगयो बिज्ञान, परमपद को पहुंचावै।।
भीखा देखे आपु को, ब्रह्म रूप हिये माहिं
वेद-पुरान पढ़े कहा, जो अच्छर समुझा नाहिं।।

शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

गुरू प्रताप साध कि संगति--(प्रवचन--08)

तिमिर में सूर्य का मुखड़ा—(प्रवचन—आठवां)
दिनांक 28 मई, 1979;
ओशो आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार:
1—भगवान! सुबह कब होगी?
2—भगवान! आपको याद होगा, आपने द्वारका शिविर में कहा था: "जीवन बार—बार नहीं मिलता। मैं तुझे मोक्ष दूंगा। जैसा कहूं वैसा करना।'
प्रभु! मोक्ष तो दूर, अब तक बंबई और पूना के चक्कर काट रही हूं। और आज आपने स्वर्ग और नर्क की बात की, वह भी मेरे से अनजान है। पर यह जो अहर्निश सुमरन हो रहा है, इस पर तो मेरा वश नहीं है।
अपन दोनों पूना में ही भले हैं। जीवन मजाक और हंसी से ज्यादा कहां है!
3—भगवान! इस देश के राजनेता देश को कहां लिए जा रहे हैं? समाजवाद का क्या हुआ?

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

गुरू प्रताप साध की संगति--(प्रवचन--07)

राम भजै सो धन्य—(प्रवचन—सातवां)

दिनांक 27 मई, 1979;  
ओशो कम्यून इटंरनेशल, पूना
सूत्र:
रामरूप को जो लख, सो जन परम प्रबीन।।
सो जन परम प्रबीन, लोक अरु बेद बखानै।।
सतसंगति में भाव—भक्ति परमानंद जानै।।
सकल विषय को त्याग बहुरि परबेसपावै।।
केवल आपै आपु आपु में आपु छिपावै।।
भीखा सब तें छोटे होइ, रहै चरन—लवलीन।।
रामरूप को जो लखै, सो जन परम प्रबीन।।

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

गुरू प्रताप साध की संगति--(प्रवचन--06)

पुकार जागने की—(प्रवचन—छठवां)

दिनांक 26 मई, 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार:

1—भगवान! कहते हैं कि अस्तित्व हमेशा विकासमान है। क्या यह नियम बुद्धपुरुषों पर भी लागू है? जैसा कि बुद्ध और महावीर ने चुपचाप लोगों के पत्थर और अन्यायों को सहा। मुहम्मद ने हाथ में तलवार लेकर उनका सामना किया। आप तो हाथ में कोई अस्त्र नहीं लेते, परंतु अन्यायों का सामना और भी ठीक ढंग से करने की व्यवस्था की है।
जैसे ही मैं आप में डूबता हूं वैसे ही प्रतीति होती है कि मनुष्य की चेतना को ऊपर उठाने के लिए जिस व्यापकता से आप प्रयत्नशील हैं, वैसा अतीत के किसी बुद्धपुरुष ने नहीं किया होगा!
2—भगवान! क्या भाग्य को मानना हर स्थिति में बुरा है?
3—भगवान! जब भी यहां आती हूं, संन्यास के वस्त्र पहनकर आने का भाव होता है। कोशिश करती हूं लेकिन कोशिश निष्फल जाती है; घर के लोग राजी नहीं होते। इस बार भी घर में समझाया, तड़पी, किसी ने न सुना तो यहां चली आई।

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015

गुरू प्रताप साध की संगति--(प्रवचन--05)

बोलता ब्रह्मा चीन्‍है सो ज्ञानी—(प्रवचन—पांचवां)
दिनांक 25 मई, 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

सूत्र:
जहां तक समुंद दरियाव जल कूप है,
लहरि अरु बूंद एक पानी।
एक सुबर्न को भयो गहना बहुत,
देखु बीचारकै हेम खानी।
पिरथी आदि घट रच्यो रचना बहुत,
मिर्तिका एक खुद भूमि जानी।
भीखा इक आतमा रूप बहुतै भयो,
बोलता ब्रह्म चीन्है सो ज्ञानी।

राखो मोहि आपनी छाया। लगैं नहिं रावरी माया।
कृपा अब कीजिए देवा। करौं तुम चरन की सेवा।
आसिक तुझ खोजता हारे। मिलहु मासूक आ प्यारे।
कहौं का भाग मैं अपना। देहु जब अजप का जपना।
अलख तुम्हरो न लख पाई। दया करि देहु बतलाई
वारि वारि जावं प्रभु तेरी। खबरि कछु लीजिए मेरी।

गुरू प्रताप साध की संगति--(प्रवचन--04)

मन के आँगन से साक्षी के आकाश तक—(प्रवचन—चौथा)

दिनांक 24 मई, 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार:

1—भगवान! आप विश्वास को सतही और गलत कहते हैं। आप कहते हैं कि सत्य को मानना नहीं, जानना है। लेकिन मनस्विद कहते हैं कि मनुष्य जैसा सोचता है वैसा ही हो जाता है। इस दृष्टि से क्या साधना में विचार और विश्वास का उपयोग किया जा सकता है? 
2—भगवान! मेरी पत्नी मुझे संन्यास लेने से रोक रही है, मैं क्या करूं?   
3—भगवान! मैं अपने मन के शैतान से संघर्ष का सतत् अभ्यास कर रहा हूं, फिर भी सफलता क्यों नहीं मिलती?

रविवार, 18 अक्टूबर 2015

गुरू प्रताप साध की संगति--(प्रवचन--03)

सुगम उपाय जुक्‍ति मिलबे की—(प्रवचन—तीसरा)

दिनांक 23 मई, 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
सूत्र:

को लखि सकै राम को नाम।
देइ करि कौल करार बिसारो, जियना बिनु भजन हराम।।
बरनत बेद बेदांत चहूं जुग, नहिं अस्थिर पावत बिसराम।
जोग जज्ञ तप दान नेम व्रत, भटकत फिरत भोर अरु साम।।
सुर नर मुनिगन पचिपचि हारे, अंत न मिलत बहुत सो लाम।
साहब अलख अलेख निकट हीं, घट—घट नूर ब्रह्म को धाम।।
खोजत नारद सारद अस—अस, जातु है समय दिवस अरु जाम।
सुगम उपाय जुक्ति मिलबे की, भीखा इह सतगुरु से काम।।

शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

गुरू प्रताप साध की संगति--(प्रवचन--02)

मेधों का आमंत्रण—(प्रवचन—दूसरा)

दिनांक 22 मई, 1979;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
प्रश्‍नसार:
1— भगवान! क्या श्रद्धा में भी संदेह उठ सकता है?
2—भगवान! उस दिन आपको गोली मारने की बात सुनते ही मैं रोती रही। ऐसे तो मैं कभी जिंदगी में किसी की मौत पर भी नहीं रोयी! अब तो सिर्फ आपकी मौत की बात सुनते ही कांप उठती हूं। क्यों? कृपया समझाइए
3—भगवान! आपको बार—बार देखकर भी ऐसा लगता है, नहीं देखा है! कैसे देखूं कि छवि उतरे ही उतरे?

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015

गुरू प्रताप साध की संगति--(प्रवचन--01)

तमसो मा ज्‍योतिर्गमय—(प्रवचन—पहला)

दिनांक, 21 मई, 1979;
श्री रजनीश आश्रम पूना।
सूत्र:
      जग के करम बहुत कठिनाई, तातें भरमि भरमि जहंड़ाई।।
      ज्ञानवंत अज्ञान होत है, बूढ़े करत लरिकाई।
      परमारथ तजि स्वारथ सेवहि, यह धौं कौनि बड़ाई।।
      बेद-बेदांत कौ अर्थ विचारहिं, बहुबिधि रुचि उपजाई।
      माया-मोह-ग्रसित निसिबासर, कौन बड़ो सुखदाई।।
      लेहिं बिसाहिं कांच को सौदा, सोना नाम गंवाई।
      अमृत तजि विष अंचवन लागे, यह धौं कौनि मिठाई।।
      गुरु-परताप साध की संगति, करहु न काहे भाई।।
      अंतसमय जब काल गरसिहै, कौन करौ चतुराई।।
      मानुष-जनम बहुरि नहिं पैहौ, बादि चला दिन जाई।

गुरु-परताप साध की संगति—(संत भीखादास)


गुरु-परताप साध की संगति—(संत भीखादास)

(भीखा—वाणीपर भगवान श्री रजनीश के ग्‍याहरअमृत प्रवचन प्रश्‍नोत्‍तर प्रति दूसरे दिन और सूत्र पर समाप्‍ति दिनांक 21 मई से 31 मई, 1979 श्री रजनीश आश्रम पूना)

एक झरोखा:
नंत-अनंत काल के बीत जाने पर कोई सद्गुरु होता है। सिद्ध तो बहुत होते हैं, सद्गुरु बहुत थोड़े। सिद्ध वह जिसने सत्य को जाना; सद्गुरु वह जिसने जाना ही नहीं, जनाया भी। सिद्ध वह जो स्वयं पा लिया लेकिन बांट न सका; सद्गुरु वह, जिसने पाया और बांटा। सिद्ध स्वयं तो लीन हो जाता है परमात्मा के विराट सागर में; मगर वह जो मनुष्यता की भटकती हुई भीड़ है--अज्ञान में, अंधकार में, अंधविश्वास में--उसे नहीं तार पाता। सिद्ध तो ऐसे है जैसे छोटी-सी डोंगी मछुए की, बस एक आदमी उसमें बैठ सकता है। सिद्ध का यान हीनयान है;