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अथातो भक्‍ति जिज्ञासा--भाग-2 (ओशो) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--36

मौजूदगी ही उसकी है—सोलहवां प्रवचन

सोलहवां प्रवचन
26 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍न सार :

1-संसार में ही परमात्मा के छिपे होने का प्रमाण क्या हो?

2-पूर्वजन्म के पाप या प्रारब्ध क्षणमात्र में कट जाते हैं या भोगने पड़ते हैं?

3-मैं पचपन वर्ष का। तीन बार विवाह हुआ और हर बार पत्नी की मृत्यु। अभी भी स्त्री के प्रति      मन ललचाता हूं। मैं क्या करू?

4-मैं शात हो रही हूं या उदास? कृपया मार्ग बताएं।

5-मैंने सब ध्यान बंद कर दिया है। कृपा कर इस दिशा में हमारा मार्गदर्शन करें।

6-यह संभावना भी तो है कि आप के जाने बाद आपका संन्यास धर्म एक वृहत संगठन का    रूप लेगा जिसमें पद—शृंखला और राजनीति भी प्रविष्ट हो जाएगी।

7-दूसरे व्यक्ति की उपस्थिति के समय, भोजन के समय ध्यान भूल— भूल जाता है।

8-पूरे समय ध्यान की स्थिति क्यों नहीं बनी रहती?

रविवार, 9 नवंबर 2014

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--40

मिलन होता है—बीसवां प्रवचन

बीचवां प्रवचन,
30 मार्च1978;
श्री रजनीश आश्रम पूना।

प्रश्‍न सार :
1-प्रार्थना क्या है? और क्या प्रार्थना अपने ही लिए है?
2-अहंकार के पास भी कोई संजीवनी है क्या? जाने कहां से, कैसे और क्यों जी—जी आता है!
3-टी. यू. अंग्रेजी—विभागाध्यक्ष तथा शिवपुरी बाबा के कुछ शिष्यों के संदर्भ सहित नेपाल के    एक मित्र का भगवान से प्रश्न—प्रेम के साथ इतना गहरा भय क्यों जुड़ा रहता है?
4-भगवान! अब तैयार हूं। तारीख तेरह अप्रैल को मेरा इकसठवां जन्मदिन है—आपके चरणों में     संन्यस्त होने के लिए आ गिरूंगा।... आप ही मेरे शेष जीवन के एक मात्र आधार सदगुरु और   इष्टदेव हो!
5-भगवान! क्या इस प्यास का कभी अंत होगा जिसने मुझे दीवाना बना दिया है?... आह! किसे मैं अपने हृदय की बात बताऊं? मैं एकदम अजनबी और नितांत अकेला हूं!

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--39

प्रेम ही मंदिर है—उन्नीसवा प्रवचन

उन्‍नीसवां प्रवचन
29 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
सूत्र :


अनन्यभकया तदबुद्धिर्बुद्धिलयादत्यन्तम्।। 96।।
आयुश्चिरयितरेषां तु हानिनास्पदत्वात्।। 97।।
संसृतिरेषाम् भक्ति: स्यान्नाज्ञानात् कारणसिद्धे:।। 98।।
त्रीण्येषां नेत्राणि शब्दलिगाक्षभेदादुद्रवत्।। 99।।
आविस्तिरोभावाकिकारा: स्युः क्रियाफलसयोगात्।। 100।।

अथातो भक्ति जिज्ञासा!
अब भक्ति की जिज्ञासा!
ऐसे इन अपूर्व सूत्रों का आज अंतिम दिन आ गया। सोचा, विचारा, पर उससे जिज्ञासा पूरी नहीं होती।

शनिवार, 8 नवंबर 2014

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--38

जगत की सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता--प्रेम : (प्रवचन—अठारहवां)

28 मार्च 1978;

श्री रजनीश आश्रम पूना।

प्रश्‍न सार :


1-वेदों में वर्णित होमापक्षी की कथा का आशय समझाने के लिए भगवान से निवेदन।

2-क्या कैवल्य में साक्षी भी प्रकाश के साथ समाहित हो जाता है?

3-हे भंते! मा शीला के मन में भाव उठा दीजिए न!...

4-अब हद से गुजर चुकी मुहब्बत तेरी! 

5-प्रार्थना है कि अब रंग चढ़ा दें!

6-संसार क्या है?

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--37

ऊर्ध्वगति का आयाम है परमात्मा—सत्रहवां प्रवचन

सत्रहवां प्रवचन
27 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।
सूत्र :

फलस्माद्वादरायणो दृष्टत्वात्।। 91।।
ब्यूत्कमदप्ययस्तथा दृष्टम्।। 92।।
तदैक्यं नानात्वकैत्वमुपाधियोगहानादादित्यवत्।। 93।।
पृथगिति चेन्नापरेणासम्बन्धात् प्रकाशानाम्।। 94।।
न विकारिणस्तु कारणविकारात्।। 95।।


'फलम् अस्मात् वादरायण दृष्टत्वात्।।
वादरायण कहते हैं कि कर्म स्वयं फलदाता नहीं है; ईश्वर ही कर्मों के फलदाता हैं। ऐसा देखने में भी आता है।

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--35


सदगुरु शास्त्रों का पुनर्जन्म है—पंद्रहवां प्रवचन



पंद्रहवां प्रवचन
25 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

सूत्र :


तल्छक्तिर्माया उड्सामान्यात्।। 86 ।।
व्यापकत्वाद्वयाप्यानाम्।। 87 ।।
न प्राणिबुद्धिभ्योऽसम्भवात्।। 88 ।।
निर्मायोच्चावच श्रुतीश्च निर्मिमीते पितृवत्।। 89 ।।
मिश्रोपदेशान्नेति चेन्‍न स्वल्पत्वात्।। 90 ।।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--34

जग़ारण है द्वार स्वर्ग का—चौदहवां प्रवचन

 चौदहवां प्रवचन
24 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 प्रश्‍न सार :


1--क्या धरती पर स्वर्ग उतारा जा सकता है? क्या इस बार हम कुछ नये की आशा संजो सकते हैं?

2--कान्हा! क्या होली नहीं खेलोगे?


3--कुंड़लिनी या सक्रिय ध्यान में ऊर्जा जाग्रत होने पर उसे नाचकर क्यों खत्म कर दिया जाता है?

4--क्या राजनीति अध्यात्म के विपरीत है?

5--एक ध्यान— अनुभव पर प्रकाश डालने हेतु भगवान से निवेदन। आपसे और आश्रम से मेरे    दूर रखे जाने में राज क्या है?


6--आपको सुन—सुनकर भक्ति का रोग लग गया है। अब धैर्य नहीं रखा जाता है। आकांक्षा  होती   है सब अभी हो जाए।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--33

क्रांति और उत्कांति—तेरहवां प्रवचन

 तेरहवां प्रवचन
23 मार्च 1978,
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

सूत्र :

उत्कांतिस्मृतिवाक्यशेषाच्च।। 81।।
महापातकिनां त्वातौं।। 82।।
सैकान्तभावो गीतार्थप्रत्यभिज्ञानात्।। 83।।
परां कृत्वैव सर्वेषा तथाह्याह।। 84।।
भजनीयेनाद्वितीयमिदं कृष्णस्य तक्लरूपत्वात्।। 85।।

जुस्तजू—ए—राह बाकी है न मंजिल की तलाश
मुझको खुद है अब मेरे खोए हुए दिल की तलाश
रोक ऐं हमदम! न मेरी अश्क—अफशानी को तू
महफिले—हस्ती को है इक शाम—ए—महफिल की तलाश
अब नजर आए जहा अपने सिवा कोई न हो
दिल को राहे—शौक में है ऐसी मंजिल की तलाश

शनिवार, 1 नवंबर 2014

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--32

अभीप्सा व प्रतीक्षा की एक साथ पूर्णता—प्रार्थना की पूर्णता—बारहवां प्रवचन


 दिनांक 22 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 प्रश्‍न सार :

 1--धर्म क्या है? और आप कैसा धर्म पृथ्वी पर लाना चाहते हैं?

 2--तेरे ही इशारे पर मैंने अपना पूरा प्यार उंडेल दिया। तुझमें उसीको और उसमें तेरे ही रूप    को देखती हूं। क्या मेरी आंखें धोखा खा रही हैं, प्रभु?

       3--आगरा से निकलनेवाले एक पत्र 'रजनीश—प्रेम ' के बाबत एक मित्र का अजीब—सा प्रश्न!

 4--संन्यास लेने के संबंध में अनिर्णय में पडे एक मित्र की समस्या!

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--31

पदार्थ: अणुशक्ति: :चेतना: प्रेमशक्ति—ग्‍यारहवां प्रवचन


 दिनांक 21 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 सूत्र :

 लध्वपि भक्ताधिकारे महत्वक्षेपकमपरसर्वहानात्।। 76।।
तक्मानत्वादनन्यधर्म: खले बालीवत्।। 77।।
अनिन्द्ययोन्यधिक्रियतेपारम्पर्यात् सामान्यवत्।। 78।।
अतोह्यविपक्कभावानामपि तल्लोके।।79 ।।
क्रमैकणत्युपपत्तेस्तु।। 80 ।।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--30

धर्म है मनुष्य के गीत का प्रकट हो जाना—दसवां प्रवचन


दिनांक 20 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 प्रश्‍न सार :

 1--कार्ल मार्क्स के एक प्रसिद्ध वचन पर प्रश्न।

 2--आपके पास बैठने से जितने शून्य व खाली होते हैं उतना ध्यान करने से नहीं होते हैं। फिर   भी क्या ध्यान की जरूरत है?

 3--आपको समझने में मुझसे बहुत भूल हुई। क्षमा मांगता हूं। आपकी देखना का सारसूत्र क्या   हैं?

 4--परमात्मा की सर्वव्यापकता पर एक मित्र का प्रश्न। स्वामी ब्रह्म वेदाaत के संबंध में प्रश्न। कुछ भी नया करने में भयभीत होता हूं। इस भय से मुक्त कैसे होऊं?

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--29

भक्ति अकर्मण्यता नहीं, अकर्ताभाव है—नौवां प्रवचन :


 दिनांक 19 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 सूत्र :

 सुकृतजत्वात् परहेतुभावाश्च क्रियासु श्रेयस्य:।।७१।।
गौणं त्रैविध्यमितरेण स्तुत्यर्थत्वात् साहचर्यम्।। ७२।।
बहिरन्तरस्थमुभयमवेष्टि सर्ववत्।।७३।।
भूयसामननुष्ठितिरिति चेदाप्रयाणमुपसंहारान्महत्स्वपि।। ७४।। 
स्मृतिकीत्यों: कथादेश्चातौ प्रायश्चित्‍तभावात्।। ७५।।

 शांडिल्य ने भक्ति को दो खंडों में बांटा। एक साधनरूप भक्ति, एक साध्यरूप भक्ति। साधनरूप भक्ति को उन्होंने गौणी—भक्ति कहा और साध्यरूप भक्ति को परा— भक्ति। उस विभाजन की ही गहराई और विस्तार में आज के सूत्र हैं।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--28

सुख से चुकाओ मूल्य परमात्मा को पाने का—आठवां प्रवचन

दिनांक 18 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 प्रश्‍न सार :

 1--आपको सुनता हूं तो अपने जीवन की व्यर्थता देखकर बहुत उदास हो जाता हूं।... 

 2--आपको पाकर पा रहा हूं कि सब पा गया हूं। हालांकि लोग कहते हैं मैं पागल हो गया हूं।...

 3--परमात्मा को पाने के लिए किस तरह मूल्य चुकाना होगा? क्या सक्रिय ध्यान शरीर को कष्ट     देना नहीं है?


पहला प्रश्‍न:


मैं आपको ' तो अपने जीवन की व्यर्थता देखकर उदास हो जाता '। मुझे उबारें मुझे पहला प्रश्न : सुनता हू बहुत हू बचाए! 

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2014

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--27

विराट से मैत्री है भक्ति—सातवां प्रवचन

सातवां प्रवचन
17 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।


 सूत्र :

तद्यजि पूजायामिरेषा नैवम!।।66।।
पादोदक तु पाद्यमव्याप्ते।।67।।
स्वयमर्पित ग्राह्यमविशेषातध।।68।।
निमित्तगुणानपेक्षपादपराधेषु व्यवस्था।।69।।
पत्रोदेर्दानमन्यथा हि वैशिष्टचम्।।70।।

 कहा सबल तुम, कहा निर्बल मैं, प्यारे, मैं दोनों का ज्ञाता।
तप, संयम, साधन करने का
मुझको कम अभ्यास नहीं है,
पर इनकी सर्वत्र सफलता
पर मुझको विश्वास नहीं है,
धन्य पराजय मेरी जिससे
बचा लिया दंभी होने से
कहा सबल तुम, कहा निर्बल मैं, प्यारे, मैं दोनों का ज्ञाता।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--26

संसार जड़ है, अध्यात्म फूल है—छठवां प्रवचन

छठवां प्रवचन
16 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम पूना।

प्रश्‍न सार :

1--उस फूल का रंग उड़ के सिर्फ बू रह जाए
सर जाए तो जाए आबरू रह जाए
साबित हो मेरी नफी से तेरा इकबाल
मैं इतना मिटू कि सिर्फ तू रह जाए 


2--आवन कहि गये अजहूं न आए लीन्हीं न मोरी खबरिया',
इतना कहने की इजाजत मांगता हूं।


3--रुदन और ध्यान का क्या संबंध है?


4--भक्ति को आप प्रेम की उपमा क्यों देते हैं?

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--25

सब जागरण उसका है—पांचवां प्रवचन

पांचवां प्रवचन
15 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम पूना।

  सूत्र :


नामेति जैमिनि: सम्भवात्।। 61।।
अत्राड़;गप्रयोगाणां यथाकालसम्भवो गुहादिवत्।। 62।।
ईश्वर तुष्टेरेकोऽपि बली।। 63।।
अबन्धोऽर्पणस्य मुखम्।। 64।।
ध्यानवनियमस्तु दृष्टसौकर्यात्।। 65।।


भक्ति एक छलांग है। इसलिए साधन और साध्य का भेद केवल बौद्धिक भेद है। विचार के लिए अनिवार्य है। अनुभव में ऐसी कोई सीमा—साधन अलग, साध्य अलग, इस भांति नहीं है। बीज कब वृक्ष बनता है, कौन रेखा खींचेगा?

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--24

प्रार्थना निरालंभ दशा है—चौथा प्रवचन :

चौथा प्रवचन
14 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍न सार:


1--मैं क्या करूं? कैसे प्रार्थना करूं? कैसे अर्चना करूं?

2--आपने कहा : 'न मैं पूर्ण हूं और न संत'। इससे मुझे बड़ा सदमा लगा। मैं रातभर सो भी    न सका।

3--संन्यास लेने में अहंकार ही सबसे बड़ी बाधा है; तो इसको कैसे हटाया जा सकता है?

4--आप शास्त्र—शान का विरोध क्यों करते हैं?

5--गरीब जानके हमको न तुम भुला देना 
तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना

6--आप सहित सभी महापुरुष जो जिंदा हैं, कभी इकट्ठे क्यों नहीं होते? प्रार्थना निरालंब दशा है

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--22

परमात्मा के प्रति राग है भक्ति—दूसरा प्रवचन

दूसरा प्रवचन
12 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम पूना।

प्रश्‍न सार :

 1--मेरे प्रति लोगों की क्या धारणा होगी, इससे सदा भयभीत रहता हूं। अब संन्यास लेना है, लेकिन भय के कारण रुका हूं। क्या करूं?

2--गीता में कृष्‍ण द्वारा अपने बार—बार आने में निमित्त रूप बताए गये तीन कारणों को क्या आप पूरा कर रहे हैं? क्योंकि आप अपने को भगवान कहते हैं।

3--आप अपने को भगवान क्यों कहते हैं? क्या आप सबको पैदा कर रहे हैं?

4--क्या इस जगत में प्रेम का असफल होना अनिवार्य ही है? परमात्मा के प्रति राग है भक्ति

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--23

गौणी-भक्‍ति में लगो, पराभक्‍ति की प्रतीक्षा करो—तीसरा
प्रवचन

प्रवचन तीसरा
13 मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

 सूत्र :

भकत्‍या भजनोपसंहाराद्गौण्या परायैतद्धेतुत्वात्।।56।।
रागार्थे प्रकीर्त्तिसाहचर्याच्चेतरेषाम्।।57।।
अंतराले तू शेषा: स्युरुपास्यादौ च काण्डत्वात्।।58।।
ताभ्यः पाविन्दमुपक्रमात्।। 59।।
तासुप्रधान योगात् फलाऽधिक्यमेके।। 60।।


 भक्ति की यात्रा को दो खंडों में बांटा जा सकता है। एक तो भक्त के हृदय में विरह की अवस्था है—वियोग की, रुदन की। और फिर दूसरी भक्त के हृदय में योग की अवस्था है—मिलन की, हर्ष—उन्माद की।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (शांडिल्य) प्रवचन--21

भगवान को नहीं, भक्‍ति को खोजो—पहला प्रवचन

पहला प्रवचन
11मार्च 1978;
श्री रजनीश आश्रम पूना।

 सूत्र :

 द्यूतराजसेवयो: प्रतिषेधाच्च।। 51 ।।
वासुदेवेऽपीति चेन्नाकारमात्रत्वात्।। 52 ।।
प्रत्यभिज्ञान्नाच्च।। 53 ।।
वृष्णिषु श्रेष्ठत्वमेतत्।। 54 ।।
एवं प्रसिद्धेषु च।। 55 ।।

अथातो भक्तिजिज्ञासा!
अब भक्ति की जिज्ञासा।
भक्ति की क्यों? भगवान की क्यों नहीं?
साधारणत: लोग भगवान की खोज में निकलते हैं। और चूंकि भगवान की खोज में निकलते हैं इसलिए ही भगवान को कभी उपलब्ध नहीं हो पाते। भगवान की खोज ऐसी ही है जैसे अंधा आदमी प्रकाश की खोज में निकले।