पीवत राम रस लगी खुमारी-(प्रश्नोंत्तर)-ओशो
दिनांक: 17 जनवरी, सन् 1981
ओशो आश्रम पूना।
प्रवचन-सातवां-(प्रार्थना नहीं—ध्यान)
पहला प्रश्न: भगवान,
महाकवि रवींद्रनाथ ने अपने अंतिम दिनों में एक
प्रश्नवाचक कविता लिखी जो इस प्रकार है:
भगवान तुमि युगे युगे
दूत पठायेछ बारे बारे
दयाहीन संसारे
तारा बले गेल, क्षमा करो सबे,
बले गेल, भालोबासो, अंतर हते
विद्वेषविष नाशो।
वरणीया तारा स्मरणीया तारा,
तबुओ बाहिर-द्वारे
आजि दुर्दिने फिरानु तादेर
व्यर्थ नमस्कारे।
आमि ये देखेछि, गोपनहिंसा कपट रात्रि-छाये हनेछे निःसहाए
आमि ये देखेछि, प्रतिकारहीन शक्तेर अपराधे विचारेर वाणी नीरवे निभृते कांदे
आमि ये देखेनु, तरुण बालक उन्माद हये छूटे
की यंत्रणाय मरेछे पाथरे निष्फल माथाकूटे।।
कंठ आमार रुद्ध आजिके, वांशि संगीतहारा अमावश्यार कारा
लुप्त करेछे आमार भुवन दुःस्वप्नेर तले; ताइ तो तोमाय शुधाइ अश्रुजले--
याहारा तोमार बिषाइछे वायु, निभाइछे तब आलो,
तामि कि तादेर क्षमा करियाछ, तुमि कि बेसेछ भालो?
"भगवान, इस दयाहीन संसार में
तुमने युगऱ्युग में बार-बार दूत भेजे हैं। वे कह गए, सबको
क्षमा करो; वे बोल गए, सबको प्रेम
करो--अंतस से विद्वेष के विष का नाश करो। वे पूजनीय हैं, वे
स्मरणीय हैं; तो भी आज इस अशुभ समय में बाहर के दरवाजे से एक
निरर्थक नमस्कार कर उन्हें लौटा दिया है।
मैंने देखा है, हिंसा और कपट ने रात्रि की छाया में छिपकर असहायों को मारा है। मैंने देखा
है, शक्तिशाली के अपराध से, जिसका
प्रतिकार न किया जा सके, न्याय की वाणी निभृत एकांत में रोती
है। मैंने देखा है, तरुण बालक को पागलों की तरह भागते हुए;
वह पत्थर पर व्यर्थ माथा पटककर कितनी यंत्रणा सहकर मरा है।
आज मेरा कंठ बंद है, बांसुरी का संगीत सोया हुआ है; अमावस्या के कारागृह
ने मेरे भुवन को दुखस्वप्न में लुप्त कर दिया है। इसलिए तो आंखों में आंसू भरकर
तुमसे पूछता हूं कि ये जो लोग तुम्हारी वायु को विषाक्त कर रहे हैं, तुम्हारे प्रकाश को बुझा रहे हैं, तुमने क्या उन्हें
क्षमा किया है, तुमने क्या उन्हें प्यार किया है?'
भगवान, आपका महाकवि को क्या
उत्तर है?
आनंद मैत्रेय,