दिनांक
10 फरवरी, 1977;
ओशो आश्रम,
कोरेगांव
पार्क,
पूना।
जनमउवाच:
क्व प्रमाता
प्रमाणं वा क्व
प्रमेय क्व च
प्रमा।
क्व न
किंचित क्वा
न किंचिद्वा
सर्वदा
विमलस्य मे।।
292।।
क्व विक्षेप:
क्व
चैकाग्रयं क्व
निर्बोध क्व
मूढुता।
क्व
हर्ष: क्व
विषादो वा
सर्वदा
निस्कियस्थ
मे।। 293।।
क्व
चैष व्यवहारो
वा क्व च सा
परमार्थता।
क्व सूखं
क्व च वा
दुःखं
निर्विमर्शस्थ
मे सदा।। 294।।
क्व माया
क्व न संसार: क्व
प्रीतिर्विरति
क्व च वा।
क्व जीव:
क्व च
तद्ब्रह्म
सर्वदा
विमलस्य मे।।
295।।
क्व प्रवृत्तिर्निवृत्तिर्वा
क्व मुक्ति: क्व
व बंधनम्।
कूटस्थनिर्विभागस्थ
स्वस्थस्थ मम
सर्वदा।। 296।।
क्योयदेश:
क्व वा
शास्त्र क्व
शिष्य: क्व व
वा गठ।
क्व
चास्ति
पुरुषार्थो
वा निरुपाधे
शिवस्थ मे।। 297।।
क्व
चास्ति क्व च
वा नास्ति
क्यास्ति चैकं
क्व व
द्वयम्।
बहुनात्र
किमक्तेन किंचिन्नोतिष्ठते
मम।। 298।।

