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रविवार, 2 दिसंबर 2018

सहज मिले अविनाशी-(प्रवचन-07)

सहज मिले अविनाशी-ओशो 

सातवां प्रवचन

विधायक खोज


एक तो यहां एक स्टडी सर्किल निर्मित किया है, तो महीने में सात दिन उस पर बोलता रहता हूं। वह थोड़े से चुने हुए लोगों का ग्रुप है ताकि बहुत गहराई में कुछ बात हो सके। तो उसमें कुछ विशेष किताबों पर बोल रहा हूं। जैसे विज्ञान भैरव पर शुरू करूंगा अगले महीने। विज्ञान भैरव तंत्र का एक ग्रुप है। और मैं मानता हूं कि दुनिया में उससे श्रेष्ठ कोई किताब न कभी लिखी गई और न लिखनी संभव है। तंत्र पर, तंत्र पर, बहुत अदभुत है। बहुत ही अदभुत है, गीता-वीता सब बचकानी हैं। तंत्र में तो बहुत किताबें हैं, जिनके मुकाबले सारी चीजें बचकानी हैं। तो विज्ञान भैरव में कुल एक सौ बारह सूत्र हैं, तो उसमें कोई लगेंगे छह महीने। अगले महीने से शुरू करूंगा, सात दिन, फिर छह महीने उस पर लगूंगा।

प्रश्नः टैक्स्ट उसका संस्कृत में है?


टैक्स्ट उसका अंग्रेजी में भी है, संस्कृत में भी है। है तंत्र का, बहुत अदभुत है। एक-एक सूत्र पर एक-एक गीता हो सके, ऐसा है।

सहज मिले अविनाशी-(प्रवचन-06)

छठवां प्रवचन

जीवन में तीव्रता


(प्रश्न का ध्वनि-मुद्रण स्पष्ट नहीं। )

इस्लाम और क्रिश्चएनिटी दोनों जो नहीं मानते हैं, नहीं मानने का भी कारण है, ऐसा नहीं कि नहीं जानते, इस्लाम भी जानता है कि रि-इनकार्नेशन है, क्रिश्चएनिटी भी जानती है। लेकिन मानते नहीं हैं। और न मानने का कारण समझ लें, तो फिर मानने का ही खयाल रह जाता है। जिन-जिन कौमों ने यह मान लिया कि फिर से जन्म होगा, पुनर्जन्म होगा, री-इनकारनेशन होगा; उन-उन कौमों की जीवन की गति क्षीण हो गई। जीवन का रस भी चला गया, जीवन में तेजी भी कम हो गई। अगर यह भरोसा हो जाए कि मुझे कभी मरना ही नहीं है, तो मेरे जीने की इंटेंसिटी फौरन कम हो जाएगी। वह जो तीव्रता होनी चाहिए जीवन की वह... तत्काल क्षीण हो जाएगी। अगर ऐसा कुछ हो कि मैं मर ही न सकूंगा, तो जीने का सारा मजा चला जाता है।

अगर यह पक्का हो जाए कि मर-मर कर भी मैं पैदा होता रहूंगा और मरने का कोई उपाय नहीं है, तो जिंदगी इतनी फिजूल मालूम होने लगेगी जिसका कोई हिसाब नहीं है। जीवन का सारा अर्थ मृत्यु की संभावना में छिपा है। क्योंकि मुझे मरना है, इसलिए मुझे जीना पड़ता है। क्योंकि हम मरेंगे इसलिए जीने का एक आनंद है और एक रस है। क्योंकि वहां मौत खड़ी है, इसलिए जीवन को खोया नहीं जा सकता।

सहज मिले अविनाशी-(प्रवचन-05)

पांचवां प्रवचन

प्रेम के क्षण


आदमी और आदमी के बीच दूरी भी डिस्टेंस है, और दूरी भी बहुत दूर नहीं है। भाई आप एक फीट दूर हों तो कहते हैं कि पास है, हजार फीट दूर हैं तो कहते हैं दूर है, बस एक फीट और हजार फीट का ही फर्क है। लेकिन आदमी आदमी के बीच फासला इतना ज्यादा है कि उसको दूर भी नहीं कहा जा सकता। पास तो कहा ही नहीं जा सकता, दूर भी नहीं कहा जा सकता। और मजा ऐसा है कि कोई उपाय भी नहीं है कि दूरी खत्म की जा सके। और कभी दो आदमियों के बीच की दूरी खत्म नहीं हुई है कभी और न कभी होगी।

यानि पूरे मनुष्य-जाति के इतिहास में कभी भी दो आदमियों के बीच फासला कम नहीं हुआ है। तो तुम जो कहते हो न कि लेक ऑफ अंडरस्टैंडिंग, ऐसा नहीं है, जो बड़े अंडरस्टैंडिंग वाले लोग हैं, उनके बीच भी फासला है। फासले का संबंध तुम्हारी समझ से नहीं है, वह जो आदमी का अस्तित्व एक्झिसटेंस वह ऐसा है तो उसमें दूरी अनिवार्य है। और इसका कुल मतलब इतना है जो खयाल में नहीं पड़ता, वह यह है कि, चूंकि एक-एक आदमी एक-एक मिस्टरी है, इसलिए दो मिस्टरीज के बीच कभी भी कोई निकटता नहीं हो सकती। दो रहस्य के बीच अनंत फासला रहेगा। वैरायटीज।

सहज मिले अविनाशी-(प्रवचन-04)

चौथा प्रवचन

विचारना नहीं--देखना


सुनाइए, सुनाइए।

ये बहुत लोकप्रिय हैं ये।

हां, बहुत लोकप्रिय हैं। मैंने सुना है इसके बाबत। बहुत सुना है। बहुत सुना है।

न जाने क्यों मैंने इसको लिख दिया था और किस प्रेरणा से, लेकिन अब मुझे, मैं पढ़ता हूं तो मुझे भी इसका अर्थ दूसरा मालूम होता है कि इसका यह भी अर्थ है। जब मैंने लिखा था तो मैं नहीं जानता था। और इससे मुझे यह आभास होता है कि शायद जीवन में कोई प्रेरणाएं आती हैं, हम केवल अगर अपने आपको शून्य रखें। वैल्यूएं हमें हों तो अपने आप आ जाती हैं।
हम जब तक अपनी दीवाल बनाए रहते हैं उस वक्त तक शायद बाह्य शक्ति हमारे पास नहीं आती है। शायद उस समय किसी कारण से, जान कर के नहीं, क्योंकि छत्तीस वर्ष पहले मेरी उम्र पच्चीस बरस की थी, पच्चीस बरस की उम्र में आदमी को बड़ा ईगो और अहं, सब कुछ होता है, यौवन का आरंभ होता है। मगर जीवन की ऐसी परिस्थितियां थीं जिनके कारण वह मेरा ईगो चकनाचूर हो गया और मेरा हृदय खुल गया। उस खुले में शायद कहीं कोई प्रभाव जो शायद चल रहे थे, वे इसमें आ गए और यह मैं लिख गया था। और जान-बूझ कर नहीं लिखा था। अब जब पढ़ता हूं तो मुझे भी इसका अर्थ सोचना पड़ता है।

सहज मिले अविनाशी-(प्रवचन-03)

तीसरा प्रवचन

नये चित्त का जन्म

और इस जीवन की पूरी प्रफुल्लता को पूरी मुक्ति देनी पड़े और इस तरह सोचना पड़े कि एक आदमी अधिकतम कैसे सुख पा सकता है--हम वैसी जीवन-व्यवस्था भी बनाएं, वैसा परिवार भी बनाएं। लेकिन हमने जो सब ढांचा बनाया था, वह ऐसा था कि कैसे भाग जाएं। और सबके दृष्टिकोण अलग होंगे। अगर तुम इस घर को घर समझ रहे हो, तो एक बात होगी और तुम इसको वेटिंग-रूम समझ रहे हो स्टेशन का, तो बिल्कुल दूसरी बात होगी। एक वेटिंग-रूम समझने वाला आदमी इस घर के साथ दूसरा व्यवहार करेगा।

प्रश्नः लेकिन इन बातों को भी हमने निश्चय से तो नहीं माना, इस श्रद्धा में भी सच्चाई तो हमने कभी नहीं रही।


सच्चाई का सवाल नहीं है, इस श्रद्धा में जो दूसरी श्रद्धा खड़ी होनी थी उसको नहीं होने दिया खड़ा और आपको कनफ्यूजन में छोड़ दिया। तो कनफ्यूजन ही तो जान लेने वाला है। अगर यही आप मान लेते हो--सब मर जाते हो, सब मुक्त हो जाते, तो भी झंझट बाहर हो जाती, तो भी दिक्कत नहीं थी। जीना तो यहीं पड़ता है।
नीत्शे ने एक वाक्य लिखा है, कि धर्मों ने जीवन से मुक्त तो किसी को नहीं किया, लेकिन गलत बातें कह कर जीवन को विषाक्त कर दिया। जीवन तो रहेगा ही, वह तो कहीं जाता नहीं, जीना तो पड़ेगा ही, लेकिन गलत दिशाएं दिमाग को पकड़ा कर जीवन को हम विषाक्त जरूर कर सकते हैं।

सहज मिले अविनाशी-(प्रवचन-02)

दूसरा प्रवचन

सृजन की शक्ति

वह बनाने वाला अलग होता है और जैसे-जैसे चित्र बनता जाता है वैसे-वैसे चित्र अलग होता जाता है। जब तक नहीं बना तब तक बनाने वाला और चित्र एक हैं। जब तक चित्र नहीं बना था तब तक चित्रकार ही है और वही चित्र भी है अभी। फिर उसने बनाया है, फिर चित्र अलग हो गया और चित्रकार अलग हो गया।
तो एक तो ऐसा सृजन है जहां स्रष्टा सृष्टि से अलग हो जाता है।
लेकिन दूसरा उदाहरण लें, एक नृत्यकार है, वह नाचता है, लेकिन नृत्य अलग नहीं होता, नृत्य और नृत्यकार एक ही रह जाते हैं। जब नहीं नाच रहा था, तब भी एक थे, अब जब नाच रहा है, तब भी एक है। और नाच बंद हो जाएगा, तो नृत्यकार ही मिलेगा, नाच कहीं खोजने से मिलने वाला नहीं है। यानी वहां क्रिएटर और क्रिएशन एक ही हैं।

ये दो उदाहरण इसलिए लेता हूं, अब तक आमतौर से परमात्मा को इस तरह सोचा गया है जैसे वह बना कर अलग हो जाता है। वह गलत है दृष्टि। परमात्मा क्रिएटर नहीं है, स्रष्टा नहीं है। क्योंकि स्रष्टा हमेशा सृष्टि से अलग हो जाता है। परमात्मा है क्रिएटिविटी, परमात्मा है सृजन की शक्ति। जैसे नृत्य और नृत्यकार, कि वह अलग

सहज मिले अविनाशी-(प्रवचन-01)

सहज मिले अविनाशी-(अंतरंग वार्ताएं)

पहला प्रवचन

कविता और काव्य


घर में मैं दिन भर खोज कर कुछ नहीं पा सका, उस अंधेरे में तुम क्या खोजोगे? लेकिन आ गए हो तो कविता सुन कर जाना।

तुम एक ही लिबास नहीं पहन सकते
तुम एक ही लिबास नहीं पहन सकते, और वह है सफर
यानी मैं सफर पहनता हूं
यानी आज सत्ताइस बरस के इस अर्सये बे जमीन पर
महज सफर पहन कर चलता रहा हूं
और वह मैं हूं।
तुम नहीं देख सकते दिमाग के पीछे उस रोशनी को
तुम नहीं देख सकते दिमाग के पीछे उस रोशनी को

जिसके अनदेखे धब्बे कहीं चकरा रहे हैं
जिसके अनदेखे धब्बे कहीं चकरा रहे हैं
तुम नहीं देख सकते दरख्तों की उन चोटियों को