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शनिवार, 7 मई 2016

सहज योग--(प्रवचन--20)

हे कमल, पंक से उठो, उठो—(प्रवचन—बीसवां)

दिनांक 10 दिसंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

 1—आपकी हत्या की धमकियां दी जा रही हैं । यह मुझसे न सुना जाता है और न सहा जाता है।

2—मेरे महबूब तुझे मेरी मुहब्बत की कसम
ऐ मेरे ख्वाब की ताबीर मेरी जाने-गज़ल
जिन्दगी मेरी तुझे याद किये जाती है।

3—आपने कहा कि सदगुरु शिष्य को संपूर्ण स्वतंत्रता देता है। इसका तो अर्थ हुआ कि वह शिष्य की जरा भी चिंता नहीं करता!

4—अपनी समझ से मैं संन्यास ग्रहण करने की तैयारी करके आया था। यहां आकर पत्नी ने कड़ा विरोध खड़ा किया। इसलिये मैं तत्काल टाल गया। अब लगता है कि मैं ही इसमें सहयोगी हुआ। प्रवेग क्षीण पड़ गया। शायद इतना उत्साह न जुटा पाया कि मैं डूब सकता। दुखी हूं। समाधान देने की अनुकंपा हो!

शुक्रवार, 6 मई 2016

सहज योग--(प्रवचन--19)

प्रेम प्रार्थना है—(प्रवचन—उन्‍नीसवां) 

दिनांक 9 दिसंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

 1--कुछ लोग आपके आश्रम की तुलना जोन्सटाउन से करते हैं। जिस भांति गुयाना के जंगल में सामूहिक आत्मघात हुआ, वैसा ही कुछ क्या यहां होने की संभावना है?

2—क्या आप समझाने की कृपा करेंगे कि आपकी शिक्षा और प्रयोगों में और संप्रदाय में क्या अंतर है?

3—मैं बिलकुल पत्थर हूं और फिर भी प्रार्थना में डूबना चाहता हूं, पर जानता नहीं कि प्रार्थना क्या है? मुझ अंधे को भी आंखें दें।

4—विवाहित जीवन के संबंध में आपके क्या खयाल हैं?

गुरुवार, 5 मई 2016

सहज योग--(प्रवचन--18)

हो गया हृदय का मौन मुखर—(प्रवचन—अट्ठहरवां) 

दिनांक 8 दिसंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :


1—यह विश्वास ही नहीं आता कि ऋषि-मुनियों के इस देश में और आप जैसे मनीषी के साथ ऐसा दुर्व्यवहार किया जा रहा है!

2—इस बार कुछ अजीब-सी परिस्थिति में आपके पास पहुंचा। यहां पहुंचने पर घर से तार मिला: जल्दी आओ। परंतु आपकी निकटता के अत्यंत प्रसादपूर्ण, शीतल आनंद को छोड़ पाना इतना सरल नहीं था।

3—राजनैतिक लुच्चे-लफंगों से देश का छुटकारा कब होगा?

4—मैं कैसे भवसागर पार करूं, नौका है टूटी-टूटी!

5—क्या लोग कभी आपको समझ पाएंगे या नहीं?

बुधवार, 4 मई 2016

सहज योग--(प्रवचन--17)

भाई, आज बजी शहनाई—(प्रवचन—सत्रहवां)

दिनांक 7 दिसंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

 1—"नयी दिल्ली' नामक अंग्रेजी पत्रिका में आश्रम में चलने वाली समूह-मनोचिकित्सा संबंधी कई चित्र प्रकाशित हुए हैं, जिसके संबंध में, मेरे दिल्ली प्रवास के समय, वहां के संपादक मुझसे पूछते थे कि आप इस संबंध में क्या कहते हैं?

2—भारतीयों को सामूहिक मनोचिकित्सा में क्यों नहीं सम्मिलित किया जाता है?

3—आप ही मेरे सब कुछ हो। आपके पहले मेरा न किसी संत से मिलना हुआ, न आगे किसी से मिलने की इच्छा है। फिर भी शायद आगे किसी तथाकथित साधु से मिलना हो जाए, तो क्या उसके सम्मोहन का मुझ पर असर हो जाएगा?

मंगलवार, 3 मई 2016

सहज योग--(प्रवचन--16)

भोग में योग, योग में भोग—(प्रवचन—सोलहवां)

दिनांक 6 दिसंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

सारसूत्र :


जिम विस भक्खइ विसहि पलुत्ता।
तिम भव भुज्जइ भवहि ण जुत्ता।।7।।

परम आणन्द भेउ जो जाणइ ।
खणहि सोवि सहज बुजाइ ।। 8।।

गुण दोस रहिअ एहु परमत्थ ।
सह संवेअण केवि णस्थ ।।9।।

चित्ताचित्त विवज्जहु ण णित्त ।
सहज सरूएं करहु रे थित्त ।। 10।।


आवइ जाइ कहवि ण णइ ।
गुरु उपएसें हिअहि समाइ ।।11।।

हउ सुण जुग सुण तिहुअण सुण।
णिम्मल सहजे ण पाप ण पुण ।।12।।

सोमवार, 2 मई 2016

सहज योग--(प्रवचन--15)

प्रेम--समर्पण—स्वतंत्रता—(प्रवचन—पंद्रहवां)

दिनांक 5 दिसंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

 1—आपने कहा कि तुझसे पहले भी मैं ऐसे दो जोड़े बना चुका हूं, तेरा तीसरा जोड़ा है। पर मेरी तो कोई पात्रता भी नहीं, फिर आपने मुझे कैसे चुना?

2—आप कहते हैं कि जीवन को उसके सभी आयामों में जीयो। इससे आपका क्या प्रयोजन है?

3—पाखंड का इतना बल और आकर्षण क्या है?


4—यहूदी संत मुरजुत्रा का विचार था कि "चेले ऐसे पात्र हैं कि उनमें गुरु का रंग झलकना चाहिए। यदि गुरु की गुरुता के बावजूद शिष्य में अपेक्षित गुण नहीं आए तो उसमें दोष गुरु का है।'...कृपया इस कथन पर प्रकाश डालें।

रविवार, 1 मई 2016

सहज योग--(प्रवचन--14)

धरती बरसे अंबर भीजे—(प्रवचन—चौदहवां)


दिनांक 4 दिसंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

 1—मैं वर्षों तक एक विरागी संन्यासी रहा हूं, लेकिन आपने मुझे प्रभु-राग में डुबो दिया है। अब आगे क्या आदेश है?

2—हजारों वर्ष धरती तपश्चर्या करके गर्भ धारण करती है तो कहीं एक बुद्ध का अवतरण होता है। और इस देश में अनंत बुद्ध हो गये। फिर भी जब आप जैसे बुद्धपुरुष वर्तमान हैं, तो भी इस देश के लोगों को, तथाकथित धर्मगुरुओं को तथा शासन में पहुंचे हुए लोगों को आपकी बात समझ में क्यों नहीं आती?


3—आप प्रभु की परम अनुभूति के लिये कभी-कभी शराब जैसा प्रतीक क्यों प्रयोग करते हैं? क्या कोई अच्छा प्रतीक नहीं मिल सकता है?

सहज योग--(प्रवचन--13)

प्रार्थना अर्थात संवेदना—(प्रवचन—तैरहवां)

दिनांक 2 दिसंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

1—सिद्ध सरहपा और तिलोपा यह तो बता गए कि क्रियाकांड और अनुष्ठान धर्म नहीं है। कृपया बताएं कि उनके अनुसार धर्म क्या है? उनका संदेश क्या है?

2—मैं नाच रहा हूं यहां। मैं अपने पर चकित हूं। पूछता हूं कि यह क्या हो गया है मुझे?

3—जीवन में दुख-ही-दुख क्यों है? परमात्मा ने यह कैसा जीवन रचा है?

4—प्रश्न का कोई अस्तित्व नहीं, यह जानते हुए विनम्रतापूर्वक मैं जानना चाहूंगा--मा दर्शन ने गुरुकुल कांगड़ी के वेदज्ञाता को आपके भगवान होने के संबंध में उत्तर दिया। मेरी मंद बुद्धि के अनुसार यह उत्तर वही दे सकता है जिसे स्वयं स्मरण है। और जिसे स्वयं स्मरण है, वह स्वयं को भी तो भगवान कह सकता है। लेकिन तब इस उदघोषणा से बचा क्यों जाए?

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

सहज योग--(प्रवचन--12)

प्रेम: कितना मधुर, कितना मंदिर—(प्रवचन—बारहवां)

दिनांक 2 दिसंबर ,1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

1—मैंने मांगा कुछ, और मिला कुछ और। मांगी मन की मृत्यु--मिली मन की मगनता। मेरे मन में ज्ञानऱ्योग का महत्व ज्यादा है, परंतु अब प्रेम-भक्ति के भाव भी सघन हो रहे हैं। मन और शरीर जैसे रस के सरोवर में डूब गये हों! यह सब क्या है?

2—जहां सिद्ध सरहपा और तिलोपा के नाम सुदूर तिब्बत, चीन और जापान में उजागर नाम हैं, वहां अपने ही जन्म के देश में वे उजागर न हुए--इसका क्या कारण हो सकता है?

3—आप कहते हैं कि बुद्ध जहां रहते हैं उनके आस-पास के सूखे हुए वृक्ष भी हरे-भरे हो जाते हैं, मगर ये पूनावासी क्यों सूखते जा रहे हैं?

सहज योग--(प्रवचन--11)

खोलो गृह के द्वार—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)

दिनांक 1 दिसंबर ,1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

सारसूत्र :


वढ़ अणं लोअअ गोअर तत्त पंडित लोअ अगम्म।
जो गुरुपाअ पसण तंहि कि चित्त अगम्म।।1।।

सहजें चित्त विसोहहु चंग।
इह जम्महि सिद्धि मोक्ख भंग।।2।।

सचल णिचल जो सअलाचर।
सुण णिरंजण म करू विआर।।3।।


हंउ जग हंउ बुद्ध हंउ णिरंजण।
हंउ अमणसिआर भवभंजण।।4।।

तित्थ तपोवण म करहु सेवा।
देह सुचिहि ण स्सन्ति पावा।।5।।

देव म पूजहू तित्थ ण जावा।
देव पूजाहि ण मोक्ख पावा।।6।।

गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

सहज योग--(प्रवचन--10)

तरी खोल गाता चल माझी—(प्रवचन—दसवां)

दिनांक 30 नवंबर,1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

 1—आपने इस प्रवचनमाला को शीर्षक दिया है--सहजऱ्योग। क्या सहज और योग परस्पर-विरोधी नहीं लगते?

2—भक्त प्रभु-विरह  में कभी हंसता है कभी रोता है, यह विरोधाभास कैसा?

3—जाति-बिरादरी वालों ने मुझे छोड़ दिया है। यहां तक कि पंचायत बिठायी और चार व्यक्तियों ने मिलकर मुझे पीटा भी। संन्यास, बाल, दाढ़ी और गैरिक वस्त्र का त्याग करो--ऐसा कहकर मुझे पीटा गया--तथाकथित ब्राह्मणों और पंडितों द्वारा। ऐसा क्यों हुआ? अपने ही पराये क्यों हो गए?


4—क्या यह अच्छा नहीं होगा कि पृथ्वी पर एक ही धर्म हो? इससे भाईचारे में बढ़ौतरी होगी और हिंसा, वैमनस्य और विवाद बंद होंगे।

सहज योग--(प्रवचन--09)

फागुन पाहुन बन आया घर—(प्रवचन—नौवां)

दिनांक 29 नवंबर,1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

1—तालमुद का वचन है: "जो तुझे आदिष्ट है उससे परे भी, उससे ऊपर भी तू पवित्र आचरण कर।' कृपा करके इस वचन का आशय हमें कहिए।

2—कोरा कागज था ये मन मेरा, लिख लिया नाम जिस पे तेरा! चैन गंवाया मैंने, निंदिया गंवाई; सारी-सारी रात जागूं, दूं मैं दुहाई!

3—बस एक ही प्रार्थना है कि आपके पास जो आग है, उसमें पूरी-पूरी जल जाऊं और खो जाऊं।

4—सिद्ध सरहपा ने महासुख की बात कही। यह महासुख क्या है?

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

सहज योग--(प्रवचन--08)

जीवन का शीर्षक: प्रेम—(प्रवचन—आठवां) 

दिनांक 28 नवंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :


1—आपका असहाय बालक रोता है।
आज अंतरीये करूं हूं आह्वान, नथी पूजा आयोजन
केवल आ मम तन-मन, तव दर्शन दान।

2—मनुष्य या तो काम-भोग की अति में चला जाता है या फिर
उसके विपरीत काम-दमन की कुंठा में। इस विषय में सहजऱ्योग की क्या दृष्टि है?

3—कौन आया मेरे मन के द्वारे, पायल की झनकार लिये!
आंख न जाने दिल पहचाने, मूरतिया कुछ ऐसी
याद करूं तो याद न आए, सूरतिया कुछ ऐसी
पागल मनवा सोच में डूबा, एक अनोखा प्यार लिए।

सहज योग--(प्रवचन--07)

जीवन के मूल प्रश्न—(प्रवचन—सातवां)

दिनांक 27 नवंबर, 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍नसार :

1—परमात्मा कहां है, खोजें तो कहां खोजें?

2—विरह का, प्रभु-विरह का कष्ट नहीं सहा जाता है।

3—हम भारतीय क्यों दार्शनिक प्रश्न ही पूछते हैं, जबकि पश्चिमी संन्यासी अपने जीवन से संबंधित प्रश्न पूछते हैं?

4—श्री रामकृष्ण ने जीव के चार प्रकार कहे हैं--बद्ध, मुमुक्षु, मुक्त और नित्य। इसे समझाने की कृपा करें।

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

सहज योग--(प्रवचन--06)

सहजऱ्योग का आधार: साक्षी—(प्रवचन—छठवां)

दिनांक 26 नवंबर, 1978;

श्री रजनीश आश्रम, पूना।

सारसूत्र :


आई ण अंत ण मज्झ णउ णउ भव णउ णि ब्वाण।
एहु सो परम महासुह णउ परणउ अप्पाण।।7।।

घोरान्धारें चंदमणि जिम उज्जोअ करेइ।
परम महासुह एक्कु खणे दुरि आसेस हरेइ।।8।।

जब्बे मण अत्थमण जाइ तणु तुट्टइ बंधण।
तब्बे समरस सहजे वज्जइ णउ सुछ ण बम्हण।।9।।


चीअ थिर करि धरहु रे नाइ। आन उपाये पार ण जाइ।
नौवा ही नौका टानअ गुणे। मेलि मेलि सहजे जाउण आणे।।10।।

मोक्ख कि लब्भइ ज्झाण पविट्ठो। किन्तह दीवें किन्तह णिवेज्जं।
किन्तह किज्जइ मन्तह सेब्बं।
किन्तह तित्थ तपोवण जाइ। मोक्ख कि लब्भइ पाणी न्हाइ।।11।।

परऊ आर ण कीअऊ अत्थि ण दीअऊ दाण।
एहु संसारे कवण फलु वरूच्छडुहु अप्पाण।।12।।

सहज योग--(प्रवचन--05)

जगत--एक रूपक—(प्रवचन—पांचवां)

दिनांक 25 नवंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍न सार :

 1—परमात्मा की परिभाषा क्या है?

2—जीसस, सुकरात और मंसूर जैसे साक्षात प्रेमावतारों के शरीर को जिस घृणापूर्ण ढंग से सूली, जहर और कत्ल दी गयी--उससे क्या यह सिद्ध नहीं होता कि अस्तित्व बिलकुल तटस्थ है?

3—क्या जीवन सच ही बस एक नाटक है? बात जंचती भी है और जंचती भी नहीं। ऐसा क्यों?

4—प्रार्थना-शास्त्र का सार समझाइये।

रविवार, 24 अप्रैल 2016

सहज योग--(प्रवचन--04)

सहज-योग और क्षण-बोध—(प्रवचन—चौथा)

दिनांक 24 नवंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍न सार :

 1—सिद्ध सरहपा का सहज-योग और झेन का क्षण-बोध क्या अन्य हैं या अनन्य? और क्या सहज-योग समर्पण का ही दूसरा नाम नहीं है?

2—उस दिन भारत के संदर्भ में आपने कहा कि इस देश की बुनियादी समस्या उसके अंधविश्वास हैं और यह कि यह देश समय से डेढ़ हज़ार वर्ष पीछे है। क्या बताने की कृपा करेंगे कि विश्वास और अंधविश्वास की परख क्या है? और क्या आज के विश्वास कल के अंधविश्वास नहीं हो जायेंगे? क्या यह भी बताने की अनुकंपा करेंगे कि कोई व्यक्ति या जनसमूह समसामयिक होने के लिए, आधुनिक रहने के लिए क्या करे?

सहज योग--(प्रवचन--03)

देह गेह ईश्वर का—(प्रवचन—तीसरा)

दिनांक 23 नवंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍न सार :

 1—अब इस देह में ज्यादा रहने का मन नहीं होता। इससे विदा लेने का मन है। लेकिन आपके लिए जी पीछे खींचता है। मैं बता नहीं सकती कुछ भी। मुझे कुछ भी लिखने को नहीं आता है। क्या कहूं?

2—आप राजनीति पर वक्तव्य देते हैं तो फिर आपको राजनीतिज्ञ क्यों न माना जाए?

3—सिद्ध सरहपा ने कहा कि जब तक स्वयं को न जान लो तब तक किसी को शिष्य न करना। इस पर कुछ और कहें।

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

सहज योग--(प्रवचन--02)

ओंकार: मूल और गंतव्य—(प्रवचन—दूसरा)

दिनांक 22 नवंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

प्रश्‍न सार :

1—आपने कहा धर्म साधना है, क्रिया-कांड नहीं। लेकिन जिन्हें सरहपा क्रिया-कांड कहेंगे, उनमें से अनेक, जैसे भजन-कीर्तन, अपने आश्रम में और अन्यत्र भी साधना के अंग बने हैं। कृपापूर्वक समझाएं।

2—क्या उपासना का कोई भी मूल्य नहीं है? और यदि मूल्य है तो फिर विरोध क्यों?

3—सत्य ही कहता हूं, सत्य ही सुनता हूं। इस सत्यपन की आदत से सभी रिश्तेदार व मित्र साथ छोड़ गए हैं। सांसारिक होने के कारण अकेलापन बहुत परेशान करता है। काम ईमानदारी से करने और ईमानदारी से ही जीवन व्यतीत करने में शांति तो मिल रही है, लेकिन बच्चों के लिए ईमानदारी से पैसा कमाने में रात-दिन काम करता रहता हूं और साधना नहीं कर पाता। कृपया मार्ग दिखाएं।

4—ओंकार का आपने विरोध किया, इससे मन को ठेस पहुंची। कृपया समझावें कि ऋषि-मुनियों ने सदा ओंकार का समर्थन क्यों किया है?

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

सहज योग--(प्रवचन--01)

जागो, मन जागरण की बेला—(प्रवचन—पहला)

दिनांक 21 नवंबर, 1978;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

सूत्र :
मन्तः मंते स्सन्ति ण होइ।
पड़िल भित्ति कि उट्ठिअ होइ।।1।।

तरुफल दरिसणे णउ अगघाइ।
वेज्ज देक्खि किं रोग पसाइ।।2।।

जाव ण अप्पा जाणिज्जइ ताव ण सिस्स करेइ।
अंधं अंध कढ़ाव तिम वेण वि कूव पड़ेइ।।3।।


बह्मणेहि म जाणन्त भेउ। एवइ पढ़िअउ एच्चउ वेउ।।
मट्टी पाणी कुस लइ पढ़न्त। घरहि वइसी अग्गि हुणन्त।।
कज्जे विरहइ हुअवह होमें। अक्खि डहाविअ कडुएं धुम्में।।4।।

जइ नग्गा विअ होइ मुत्ति ता सुणइ सिआलह।
लोम पारणें अत्थि सिद्धि ता जुवइ णिअम्वह।।5।।

पिच्छी गहणे दिट्ठि मोक्ख ता मोरह चमरह।
उंछें भोअणें होइ जान ता करिह तुरंगह।।6।।