दिनांक
10 दिसंबर, 1978;
श्री
रजनीश आश्रम,
पूना।
प्रश्नसार
:
1—आपकी
हत्या की
धमकियां दी जा
रही हैं । यह
मुझसे न सुना
जाता है और न
सहा जाता है।
2—मेरे
महबूब तुझे
मेरी मुहब्बत
की कसम
ऐ
मेरे ख्वाब की
ताबीर मेरी
जाने-गज़ल
जिन्दगी
मेरी तुझे याद
किये जाती है।
3—आपने
कहा कि सदगुरु
शिष्य को
संपूर्ण
स्वतंत्रता
देता है। इसका
तो अर्थ हुआ
कि वह शिष्य की
जरा भी चिंता
नहीं करता!
4—अपनी
समझ से मैं
संन्यास
ग्रहण करने की
तैयारी करके
आया था। यहां
आकर पत्नी ने
कड़ा विरोध खड़ा
किया। इसलिये
मैं तत्काल
टाल गया। अब लगता
है कि मैं ही
इसमें सहयोगी
हुआ। प्रवेग क्षीण
पड़ गया। शायद
इतना उत्साह न
जुटा पाया कि
मैं डूब सकता।
दुखी हूं।
समाधान देने
की अनुकंपा
हो!
