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सोमवार, 2 मार्च 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--21)

वंशीरूप जीवन के प्रतीक कृष्‍ण—(प्रवचन—इक्‍कीसवां)

दिनांक 5 अक्‍टूबर,970;
सांध्‍या, मनाली (कुल्लू)

‘’भगवान श्री कृष्ण के संदर्भ में जीसस पर चर्चा करते समय एक बार आपने कहा कि जीसस के’क्रॉस' से जिस सभ्यता का शरम हुआ उसका अत आधुनिक स्थिति में एटम बन पर जाकर हुआ। और आधुनिक सभ्यता को अभी वर्तमान स्थिति में’क्रॉस या वंशी के बीच चुनाव करना है। कृपया इस बात को फिर स्पष्ट करें। तथा जिस प्रकार’क्रॉस' की संस्कृति का अंत एटम बन पर हुआ है अभी उसी प्रकार वंशी से जो जीवनधारा चली उसका भी तो अंत सुदर्शनचक्र और महाभारत पर हुआ था। मैं यह पूछना चाहूंगा कि आप’क्रॉस’ और एटम बन का जोड़ बुनेगे कि वंशी और महाभारत का जोड़ भारत के लिये चुनेगे?’’

क्रॉस’ मृत्यु का सूचक है। कब्र पर लगता है तो उसका अर्थ है, और जब जीवन पर लग जाता है तो खतरनाक है। लेकिन, बहुत सारे तथाकथित धार्मिक लोगों ने मनुष्य के शरीर को कब्र ही समझा है। उनकी इस समझ का परिणाम खतरनाक होने वाला है। और अगर मनुष्य की छाती पर’क्रॉस लटका दिया जाये, जैसे कब पर’क्रॉस' लगा होता है, तो हम जीवन को स्वीकार नहीं करते, अस्वीकार की घोषणा करते हैं।

रविवार, 1 मार्च 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--20)

राजपथरूप भव्य जीवनधारा के प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—बीसवां)

      दिनांक 5 अक्‍टूबर, 1970;
प्रात:, मनाली (कुल्लू)


"भगवान श्री, महावीर की वीतरागता, क्राइस्ट की "होली इनडिफरेंस', बुद्ध की उपेक्षा, कृष्ण की अनासक्ति, इनमें क्या सूक्ष्म समानता व भिन्नता है? इस पर प्रकाश डालें।'

क्राइस्ट की तटस्थता, बुद्ध की उपेक्षा, महावीर की वीतरागता और कृष्ण की अनासक्ति, इनमें बहुत-सी समानताएं हैं, लेकिन बुनियादी भेद भी हैं। समानता अंत पर है, उपलब्धि पर है, भेद मार्ग में हैं। अंतिम क्षण में ये चारों बातें एक ही जगह पहुंचा देती हैं। लेकिन चारों के रास्ते बड़े अलग-अलग हैं।
जीसस जिसे तटस्थता कहते हैं, बुद्ध जिसे उपेक्षा कहते हैं, इनमें बड़ी गहरी समानता है। यह जगत जैसा है, इस जगत की धाराएं जैसी हैं, इस जगत के अंतर्द्वंद्व जैसे हैं, इस जगत के भेद और विरोध जैसे हैं, उनके प्रति कोई तटस्थ हो सकता है। लेकिन तटस्थता कभी भी प्रसन्नता नहीं हो सकती। तटस्थता बहुत गहरे में उदासी बन जाएगी।

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--19)

फलाकांक्षामुक्त कर्म के प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—उन्‍नीसवां)
 


दिनांक 4 अक्‍टूबर, 1970;
सांध्‍या, मनाली (कुल्लू्)

 "साधना-जगत में यज्ञों और "रिचुअल्स' का बहुत उल्लेख है। यज्ञ की बहुत विधियां भी हैं। होमात्मक यज्ञ की बात आती है। लेकिन गीता में जपयज्ञ और ज्ञानयज्ञ को विशेष स्थान दिया गया है। साथ ही आपने जप पर बात करते हुए अजपा जप के बारे में कहा था। तो गीता के जपयज्ञ, ज्ञानयज्ञ और अजपा जप पर भी प्रकाश डालने की कृपा करें।'

जीवन में "रिचुअल' की, क्रियाकांड की अपनी जगह है। जिसे हम जीवन कहते हैं, वह नब्बे प्रतिशत "रिचुअल' और क्रियाकांड से ज्यादा नहीं है। जीवन को जीने के लिए, जीवन से गुजरने के लिए बहुत कुछ जो अनावश्यक है आवश्यक मालूम होता है। आदमी का मन ऐसा है।

मनुष्यजाति के पूरे इतिहास में हजारों तरह के "रिचुअल', हजारों तरह के क्रियात्मक खेल विकसित हुए हैं। ये सारे-के-सारे खेल अगर गंभीरता से ले लिए जाएं, तो बीमारी बन जाते हैं। अगर ये सारे खेल की तरह लिए जाएं, तो उत्सव बन जाते हैं। जैसे, जब पहली बार अग्नि का आविष्कार हुआ--और सबसे बड़े आविष्कारों में अग्नि का आविष्कार है।

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--18)

अभिनय-से जीवन के प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—अट्ठारहवां) 


दिनांक 4 अक्‍टूबर, 1970;
प्रात:, मनाली (कुन्लू)

 "भगवान श्री, श्रीकृष्ण कहते हैं कि निष्कामता और अनासक्ति से बंधनों का नाश होता है और परमपद की प्राप्ति होती है। कृपया इसका अर्थ स्पष्ट करते हुए समझाएं कि किस साधना या उपासना से यह उपलब्धि होगी? सामान्यजन के लिए सीधे निष्काम व अनासक्त होना तो संभव नहीं दिखता।'
 बसे पहले तो अनासक्ति का अर्थ समझ लेना चाहिए। अनासक्ति थोड़े-से अभागे शब्दों में से एक है जिसका अर्थ नहीं समझा जा सका है। अनासक्ति से लोग समझ लेते हैं--विरक्ति। अनासक्ति विरक्ति नहीं है। विरक्ति भी एक प्रकार की आसक्ति है। विरक्ति विपरीत आसक्ति का नाम है। कोई आदमी काम में आसक्त है, वासना में आसक्त है। कोई आदमी काम के विपरीत ब्रह्मचर्य में आसक्त है। कोई आदमी धन में आसक्त है।
कोई आदमी धन के त्याग में आसक्त है। कोई आदमी शरीर के शृंगार में आसक्त है, कोई आदमी शरीर को कुरूप करने में आसक्त है। लेकिन शरीर को कुरूप करने वाला विरक्त मालूम पड़ेगा, धन का त्याग करने वाला विरक्त मालूम पड़ेगा, क्योंकि इनकी आसक्तियां "निगेटिव' हैं, नकारात्मक हैं।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--17)

स्वभाव की पूर्ण खिलावट के प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—सत्रहवां)


दिनांक 3 अक्‍टूबर, 1970;
संध्‍या, मनाली (कुल्लू्)

 "भगवान श्री, आपकी प्रवचन-धारा ज्यों-ज्यों बहने लगी है त्यों-त्यों आपके साथ, आपके वाक्-प्रवाह के साथ बहते-बहते हम दिक्कत में पड़ जाते हैं। तकलीफ यह है कि आपके द्वारा कथित उस तिनके की भांति हम लड़ते नहीं, बहने को हम भी हाथ-पांव पसारते हैं, मगर आपका जोश इतना है कि हम बह नहीं सकते।
सुबह आज श्री अरविंद के बारे में बातचीत हुई। "द वे आफ व्हाइट क्लॉउड' में एक जगह लिखा है--"समटाइम्स आइ टेक अवे द मैन, सब्जेक्ट, बट डू नाट टेक अवे द सरकामस्टांसेज, दैट इज आब्जेक्टसमटाइम्स आइ टेक अवे द सरकमस्टांसेज, बट डू नाट टेक अवे द मैन। समटाइम्स आइ टेक अवे बोथ, द मैन एंड द सरकमस्टांसेज, एंड समटाइम्स आइ टेक अवे नीदर द मैन नॉरसरकमस्टांसेज'

श्री अरविंद की बात करते-करते प्रश्न यह उठता है मन में, कई बार, कि आप जैसा पांडिचेरी के बारे में कहते हैं वैसा मैं भी मानता हूं, मगर जो "इंटरप्रेटीशन' मिला आपसे, उससे ऐसा महसूस हुआ कि अरविंद के साक्षात्कार के बारे में अन्य किसी भी से क्यों पूछा जाए?

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--16)

सीखने की सहजता के प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—सोलहवां)
 

दिनांक 3 अक्‍टूबर, 1970;
प्रात:, मनाली (कुल्लू)

"अरविंद को कृष्ण-दर्शन हुए। वे योगी लेले के संपर्क में भी तो आए थे। और पांडिचेरी को प्रयोग का निर्णय क्या भविष्य की पीढ़ियां ही नहीं करेंगी?
एलिसबेली के विषय में आपका क्या खयाल है, जब उसका कहना है कि उसे संदेश मिलते हैं। ये संदेश कौन देता है, कैसे देता है? क्या आपका भी ऐसे किसी मास्टर या गुरु से संबंध है?'

रविंद का कृष्ण-दर्शन जेल की दीवालों में, सींकचों में, जेलर में, स्वयं में है। अगर कृष्ण का दर्शन है, तो किसको पता लगता है कि कृष्ण दिखाई पड़ रहे हैं? अगर पहचानने वाला पीछे बच जाता है, तो "प्रोजेक्शन' है, तो प्रक्षेपण है। अगर कोई कहता है, मुझ कृष्ण के दर्शन हुए, तो कम-से-कम मैं कृष्ण नहीं हूं, इतना पक्का है। जिसे दर्शन होंगे, वह तो भिन्न हो जाता है।

रविवार, 22 फ़रवरी 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--15)

अनंत सागर-रूप चेतना के प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—पंद्रहवां)
दिनांक 2 अक्‍टूबर, 1970;
सांध्‍या, मनाली (कुल्लू)

"भगवान श्री, श्री अरविंद के कृष्ण-दर्शन के बारे में कुछ कहने को बाकी रह गया था। आपने अहमदाबाद में बताया था कि वह बहुत हद तक मानसिक प्रक्षेपण हो सकता है। तो अरविंद का कृष्ण-दर्शन क्या मानसिक प्रक्षेपण है या "मिस्टिक' अनुभूति है?
एक दूसरा प्रश्न भी है--अर्जुन यदि सिर्फ निमित्त मात्र हैं, तो वे यंत्रमात्र रह जाते हैं। उनकी "इंडिविजुअलिटी' का क्या होगा?'

कृष्ण-दर्शन, या क्राइस्ट का दर्शन, या बुद्ध या महावीर का दो प्रकार से संभव है। एक, जिसको "मेंटल प्रोजेक्शन' कहें, मानसिक प्रक्षेपण कहें; जबकि वस्तुतः कोई सामने नहीं होता लेकिन हमारे मन की वृत्ति ही आकार लेती है। जबकि वस्तुतः हमारा विचार ही आकर लेता है। जबकि वस्तुतः हम ही बाहर भी रूप के निर्माता होते हैं। मानसिक प्रक्षेपण, "मेंटल प्रोजेक्शन' से मतलब यह है कि वस्तुतः उस प्रक्षेपण, उस रूप, उस आकृति के पीछे कोई भी नहीं होता। मन की यह भी क्षमता है। मन की यह भी शक्ति है। जैसे रात हम स्वप्न देखते हैं, ऐसे ही हम खुली आंख से भी सपने देख सकते हैं। तो एक तो यह संभावना है।

शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--14)

अकर्म के पूर्ण प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—चौदहवां)


दिनांक 2 अक्‍टूबर, 1970;
प्रात:, मनाली (कुल्लू)


"आपने कहा है कि श्रीकृष्ण के मार्ग में कोई साधना नहीं है। केवल "सेल्फ रिमेंबरिंग', पुनरात्मस्मरण है। लेकिन, आप सात शरीरों की साधना की बात करते हैं। तो सात शरीरों के संदर्भ में कृष्ण की साधना की रूपरेखा क्या होगी, कृपया इसे स्पष्ट करें।'

कृष्ण के विचार-दर्शन में साधना की कोई जगह ही नहीं है। इसलिए सात शरीरों का भी कोई उपाय नहीं है। साधना के मार्ग पर जो मील के पत्थर मिलते हैं, वे उपासना के मार्ग पर नहीं मिलते हैं। साधना मनुष्य को जिस भांति विभाजित करती है, उस तरह उपासना नहीं करती। साधना सीढ़ियां बनाती है, इसलिए आदमी के व्यक्तित्व को सात हिस्सों में तोड़ती है। फिर एक-एक सीढ़ी चढ़ने की व्यवस्था करती है। लेकिन उपासना आदमी के व्यक्तित्व को तोड़ती ही नहीं। कोई खंड नहीं बनाती। मनुष्य का जैसा अखंड व्यक्तित्व है, उस पूरे को ही उपासना में लीन कर देती है।

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--13)

अचिंत्य-धारा के प्रतीकबिंदु कृष्ण—(प्रवचन—तेरहवां) 

दिनांक 2 अक्‍टूबर, 1970;
प्रात:, मनाली (कुल्लू)

"एक चर्चा में आपने कहा है कि श्रीकृष्ण की आत्मा का साक्षात्कार हो सकता है, क्योंकि कुछ मरता नहीं। तो कृष्ण-दर्शन को संभावितता की हद में लाने के लिए कौन-सी "प्रासेस' से गुजरना पड़ेगा? और साथ ही यह बताएं कि कृष्ण-मूर्ति पर ध्यान, कृष्ण-नाम का जप और कृष्ण-नाम के संकीर्तन से क्या उपासना की पूर्णता की ओर जाया जा सकता है?'

विश्व अस्तित्व में कुछ भी एकदम मिट नहीं जाता। और विश्व अस्तित्व में कुछ भी एकदम नया पैदा भी नहीं होता है। रूप बदलते हैं, आकृतियां बदलती हैं, आकार बदलते हैं, लेकिन अस्तित्व गहनतम रहस्यों में जो है, वह सदा वैसा ही है। व्यक्ति आते हैं, खो जाते हैं, लहरें उठती हैं सागर पर, विलीन हो जाती हैं, लेकिन जो लहर में छिपा था, जो लहर में था, वह कभी विलीन नहीं होता।

बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--12

साधनारहित सिद्धि के परमप्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—बारहवां) 


दिनांक 1 अक्‍टूबर, 1970;
प्रात:, मनाली (कुल्लू्)

"भगवान श्री, कृष्ण का व्यक्तित्व, कृष्ण की बांसुरी, कृष्ण की राधा, कृष्ण के रास से लेकर सुदर्शन चक्र तक हमें बहुत कुछ जानने का मौका मिला। आज एक नया स्वरूप कृष्ण का आपकी वाणी से, आपके मुख से सुनने के लिए हम सब उत्सुक हैं। हम चाहेंगे कि आप कृष्ण से संबंधित उनकी साधना, उनका दर्शन, उनसे संबंधित उपासना पर अपने विचार प्रस्तुत करें, ताकि हम कृष्ण के दूसरे स्वरूप को भी जान सकें। कृष्ण ने तो केवल एक अर्जुन का मोह भंग किया था, यहां पर हम सब अर्जुन बैठे हुए हैं और सब मोह से ग्रसित हैं, उन सबका मोह भंग करने के एकमात्र अधिकारी आप हैं।

भगवान श्री, गत पांच दिनों में आपने मक्खनचोर और रासलीला करते हुए कृष्ण को विराट जीवन की पूर्णता का या योग की पूर्णता का केंद्र बताया। यदि सूक्ष्मता से आपकी दृष्टि को समझें और यह कहें कि रासलीला आदि जीवन के सत्य हैं और गीता के कृष्ण अथवा कृष्ण की गीता जीवन का निचोड़ है, जीवन का सार है--क्योंकि आपने भी कहा कि गीता प्रमाण है कृष्ण का, ऐसा नहीं कहा कि रासलीला प्रमाण है कृष्ण का। आपने कहा कि महावीर और बुद्ध एक आयामी, "वन डायमेंसनल' हैं और इसीलिए शायद पूर्ण नहीं हैं। और, यह भी आपने ही कहा है कि महावीर छठवें और सातवें को पाकर योग की पूर्णता को पाए हैं। तो क्या जीवन में रासलीला हुई, या कुछ उलटा-सीधा करना पड़ा, इसलिए कृष्ण पूर्ण ठहरे या कि गीता जैसे ग्रंथ को देने के कारण पूर्ण हुए?
एक बात और कि महावीर के जीवन में जीवन की पूर्णता न निखरी, तो क्या उनके पहले के तेईस तीर्थंकरों को भी उन बहु-आयामों का खयाल नहीं आया था?

रविवार, 15 फ़रवरी 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--11)

मानवीय पहलूयुक्त भगवत्ता के प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—ग्‍यारहवां)


दिनांक 30 सितंबर, 1970;
संध्‍या, मनाली (कुल्लू)

"भगवान श्री, कृष्णा अर्थात द्रौपदी के चरित्र को लोग बड़ी गर्हित दृष्टि से देखते हैं, तथा कृष्ण का उससे वृहत अनुराग है। इस सब की चर्चा करें और आज के संदर्भ में द्रौपदी का चरित्र स्पष्ट करें।'

पुरुषों के व्यक्तित्व में जैसे कृष्ण को समझना उलझन की बात है, वैसे ही स्त्रियों के व्यक्तित्व में द्रौपदी को समझना भी उलझन की बात है। और लोगों को जो गर्हित दिखाई पड़ता है, उनके दिखाई देने में वे अपने संबंध में ज्यादा खबर देते हैं, द्रौपदी के संबंध में कम। जो हमें दिखाई पड़ता है, वह हमारे संबंध में खबर होती है। हम वही देख पाते हैं, जो हम हैं। हम अपने अतिरिक्त और कुछ भी नहीं देख पाते हैं।

द्रौपदी का व्यक्तित्व हमें कठिन मालूम पड़ेगा। एक साथ पांच व्यक्तियों को प्रेम, एक साथ पांच की पत्नी होना बहुत मुश्किल है। समझना होगा। लेकिन इससे केवल हमारे संबंध में सूचना मिलती है और हमारी आकांक्षाओं, अपेक्षाओं की खबर मिलती है। प्रेम का व्यक्तियों से बहुत संबंध नहीं है। और अगर कोई प्रेम एक से ही किया जा सकता हो, तो वह प्रेम बहुत दीन-हीन हो जाता है। इसे थोड़ा समझना होगा।

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--10)

स्वस्थ राजनीति के प्रतीकपुरुष कृष्ण—(प्रवचन—दसवां)


दिनांक 30 सितंबर, 1970;
प्रात:, मनाली (कुल्लू्)

"भगवान श्रीकृष्ण आध्यात्मिक पुरुष थे। साथ-ही-साथ उन्होंने राजनीति में भी भाग लिया। और राजनीतिज्ञ के रूप में जो उन्होंने महाभारत के युद्ध में किया वह यह: भीष्म के आगे शिखंडी को खड़ा करके उन्हें धोखे से मरवाया। द्रोण को, "अश्वत्थामा मारा गया', ऐसा झूठ बुलवाकर मरवाया। कर्ण को, जब रथ का पहिया फंस गया, तब उस निहत्थे को मरवाया। दुर्योधन को उसकी जंघा पर गदा-प्रहार करवाकर मरवाया। तो क्या धार्मिक व्यक्ति राजनीति में आएगा? और अगर आएगा, तो राजनीति में यह चाल और यह छल-कपट खेलेगा? और क्या इससे जीवन में हम भी यही सीखें कि अपनी विजय के लिए इस प्रकार के कार्य, जो धोखे से भरे हुए हों, करें? महात्मा गांधी ने जो साध्य की शुद्धता के साथ-साथ साधन की शुद्धता पर भी बल दिया, वह निरर्थक था? क्या राजनीति में इसकी कोई आवश्यकता नहीं?'
र्म और अध्यात्म का थोड़ा-सा भेद सबसे पहले समझना चाहिए। धर्म और अध्यात्म एक ही बात नहीं। धर्म जीवन की एक दिशा है। जैसे राजनीति एक दिशा है, कला एक दिशा है, विज्ञान एक दिशा है, ऐसे धर्म जीवन की एक दिशा है। अध्यात्म पूरा जीवन है। अध्यात्म जीवन की दिशा नहीं है, समग्र जीवन अध्यात्म है।

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--09)

विराट जागतिक रासलीला के प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—नौवां)

दिनांक 28 सितंबर, 1970;
संध्‍या, मनाली (कुल्लू)

"रासबिहारी होते हुए भी श्रीकृष्ण ब्रह्मचारी कहलाए, इसका मर्म क्या है? आज के आधुनिक समाज में रासलीला का क्या महत्व होगा? कृपया इस पर भी प्रकाश डालें।'

रास को समझने के लिए पहली जरूरत तो यह समझना है कि सारा जीवन ही रास है। जैसा मैंने कहा, सारा जीवन विरोधी शक्तियों का सम्मिलन है। और जीवन का सारा सुख विरोधी के मिलन में छिपा है। जीवन का सारा आनंद और रहस्य विरोधी के मिलन में छिपा है। तो पहले तो रास का जो "मेटाफिजिकल', जो जागतिक अर्थ है, वह समझ लेना उचित है; फिर कृष्ण के जीवन में उसकी अनुछाया है, वह समझनी चाहिए।

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--08)

क्षण-क्षण जीने के महाप्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—आठवां)
 

दिनांक 29 सितंबर, 1970;
प्रात:, मनाली (कुल्लू)


"भगवान श्री, कृष्ण के बाल्यकाल की तथा अन्य इतनी कथाएं हैं--जैसे चाणूर तथा मुष्टिक नाम के पहलवानों को पछाड़ना; कंस-वध; कालिया-मर्दन; कीर्ति, अघ, बक, घोटक, पूतना आदि असुरों का नाश; दावानल को पी जाना; इत्यादि-इत्यादि। तो, क्या ये सब सत्य कथाएं हैं, या प्रतीक हैं? और इनमें से कौन-कौन सी लक्षणाएं और प्रतीक हैं। साथ ही, गीता के वचन "विनाशायदुष्कृताम्' से आप अर्थ लेते हैं कि दुष्टों का परिवर्तन करते हैं, उनका सुधार करते हैं। लेकिन कृष्ण ने उपरोक्त दुष्टों का वध क्यों किया और कराया?'

स संबंध में एक बात तो सबसे पहले यह समझनी जरूरी है, जो कि सदा से ही लोगों को उलझन में डालती रही है; छोटा-सा बच्चा है कृष्ण, इतने शक्तिशाली लोगों को हरा कैसे सकेगा? लोगों के पास एक ही उपाय था इस पहेली को हल करने का।

बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--07)

जीवन में महोत्सव के प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—सातवां)


दिनांक 28 सितंबर, 1970;
सांय, मनाली (कुलू)

"आपने कहा कि आप विवाह को अनैतिक कहते हैं। और सर्वाधिक विवाह कृष्ण करते हैं। क्या वे विवाह रूपी अनैतिकता को प्रोत्साहित करते हैं?'

विवाह को अनैतिक कहा मैंने, विवाह करने को नहीं। जो लोग प्रेम करेंगे, वे भी साथ रहना चाहेंगे। इसलिए प्रेम से जो विवाह निकलेगा, वह अनैतिक नहीं रह जाएगा। लेकिन हम उल्टा काम कर रहे हैं। हम विवाह से प्रेम निकालने की कोशिश कर रहे हैं, जो कि नहीं हो सकता। विवाह तो एक बंधन है और प्रेम एक मुक्ति है। लेकिन जिनके जीवन में प्रेम आया है, वे भी साथ जीना चाहें, स्वाभाविक है।

सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--06)

जीवन के बृहत् जोड़ के प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—छठवां)

दिनांक 28 सितंबर, 1970;
प्रात:, मनाली (कुल्लू)


"श्रीकृष्ण के गर्भाधान व जन्म की विशेषताओं व रहस्यों पर सविस्तार प्रकाश डालने की कृपा करें। और क्राइस्ट की जन्म-स्थितियों से साम्य हो तो उसे भी स्पष्ट करें।'

कृष्ण का जन्म हो, या किसी और का जन्म हो, जन्म की स्थिति में भेद नहीं है। इसे थोड़ा समझना जरूरी है। लेकिन सदा से हम भेद देखते आए हैं। वह कुछ प्रतीकों को न समझने के कारण।
कृष्ण का जन्म होता है अंधेरी रात में, अमावस में। सभी का जन्म अंधेरी रात में होता है और अमावस में होता है। जन्म तो अंधेरे में ही होता है। असल में जगत की कोई भी चीज उजाले में नहीं जन्मती, सब कुछ जन्म अंधेरे में ही होता है। एक बीज भी फूटता है तो जमीन के अंधेरे में जन्मता है। फूल खिलते हैं प्रकाश में, जन्म अंधेरे में होता है।

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--05)

"अकारण' के आत्यंतिक प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—पांचवां)


दिनांक 27 सितंबर, 1970;
      सांय, मनाली (कुल्लू्)

"भगवान श्री, श्रीकृष्ण के जन्म के समय क्या सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक स्थितियां थीं, जिनके कारण कृष्ण जैसी आत्मा के अवतरण होने का आधार बना? कृपया इस पर प्रकाश डालें।'

कृष्ण जैसी चेतना के जन्म के लिए सभी समय, सभी काल, सभी परिस्थितियां काम की हो सकती हैं। कोई काल, कोई परिस्थिति कृष्ण जैसी चेतना के पैदा होने का कारण नहीं होती है। यह दूसरी बात है कि किसी विशेष परिस्थिति में वैसी चेतना को विशेष व्यवहार करना पड़े। लेकिन ऐसी चेतनाएं काल-निर्भर नहीं होतीं। सिर्फ सोए हुए लोगों के अतिरिक्त काल पर कोई भी निर्भर नहीं होता। जागा हुआ कोई भी व्यक्ति अपने समय से पैदा नहीं होता। बल्कि बात बिलकुल उलटी है--जागा हुआ व्यक्ति अपने समय को अपने अनुकूल ढाल लेता है। सोए हुए व्यक्ति समय के अनुकूल पैदा होते हैं।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--04)

स्वधर्म-निष्ठा के आत्यंतिक प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—चौथा)


      दिनांक 27 सितंबर, 1970;
      प्रात: ,मनाली (कुलू)

"भगवान श्री, कृष्ण का जन्म आज से कितने वर्ष पहले हुआ था? इस संबंध में आज तक क्या शोध हुई है? आपका अपना निर्णय क्या है? और क्या समाधिस्थ व्यक्ति इसका ठीक उत्तर नहीं दे सकता है?'

कृष्ण कब जन्मे, कब मरे, इसका कोई हिसाब नहीं रखा गया है। न रखने का कारण है।
जिन्हें हम सोचते हैं कि जो कभी जन्मते नहीं और कभी मरते नहीं, उनका हिसाब रखना हमने उचित नहीं माना। हिसाब उनका रखना है, जो कभी जन्मते हैं और मरते हैं। उनका हिसाब रखने का क्या अर्थ है, जो कभी जन्मते ही नहीं और मरते ही नहीं। ऐसा नहीं है कि हिसाब हम नहीं रख सकते थे। इसमें कोई कठिनाई न थी। लेकिन वैसा हिसाब कृष्ण के व्यक्तित्व के बिलकुल ही खिलाफ पड़ता है। हमने कोई तिथि-वार का हिसाब कभी नहीं रखा।

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--03)

सहज शून्यता के प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—तीसरा)


      दिनांक 26 सितंबर 1970;
      मनाली (कुलू)

"सारी गीता में कृष्ण परम अहंकारी मालूम पड़ते हैं। लेकिन आपने सुबह के प्रवचन में कहा कि निरहंकारी होने से ही कृष्ण कह सके कि सब छोड़कर मेरी शरण में आ, मैं ही सब कुछ हूं, आदि। लेकिन बुद्ध और महावीर ऐसा नहीं कहते हैं। क्या इनकी निरहंकारिता भिन्न-भिन्न है? उनका मौलिक अंतर क्या है?'

निरहंकारिता दो ढंग से उपलब्ध हो सकती है। एक तो इस ढंग से उपलब्ध हो सकती है कि कोई अपने को मिटाता चला जाए, अपने को समाप्त करता चला जाए, अपने को काटता चला जाए और ऐसी घड़ी आ जाए कि फिर काटने को कुछ न बचे। तो निरहंकारिता उपलब्ध होती है। लेकिन यह निरहंकारिता "निगेटिव' है, नकारात्मक है। और इसमें एक अहंकार बहुत गहरे में शेष रह ही जाएगा कि मैंने अपने अहंकार को काट दिया है।

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

कृष्‍ण--स्‍मृति--(प्रवचन--02)

इहलौकिक जीवन के समग्र स्वीकार के प्रतीक कृष्ण—(प्रवचन—दूसरा) 


दिनांक 26 सितंबर, 1970;
मनाली (कुलू)

"भगवान श्री, आपको श्रीकृष्ण पर बोलने की प्रेरणा कैसे व क्यों हुई? इस लंबी चर्चा का मूल आधार क्या है?'

सोचना हो, बोलना हो, समझना हो, तो कृष्ण से ज्यादा महत्वपूर्ण व्यक्ति खोजना मुश्किल है। ऐसा नहीं कि और महत्वपूर्ण व्यक्ति हुए हैं, लेकिन कृष्ण का महत्व अतीत के लिए कम और भविष्य के लिए ज्यादा है। सच ऐसा है कि कृष्ण अपने समय के कम से कम पांच हजार वर्ष पहले पैदा हुए। सभी महत्वपूर्ण व्यक्ति अपने समय के पहले पैदा होते हैं, और सभी गैर-महत्वपूर्ण व्यक्ति अपने समय के बाद पैदा होते हैं। बस महत्वपूर्ण और गैर-महत्वपूर्ण व्यक्ति में इतना ही फर्क है। और सभी साधारण व्यक्ति अपने समय के साथ पैदा होते हैं।