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मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-051)

 आत्‍मस्वीकार से तत्‍क्षण कांति--(प्रवचन—इक्यावानवां)

पहला प्रश्‍न:

अकारण जीने की कला का सूत्र क्या है? कृपा करके करें।


कारण से जीयो या अकारण जीयो, हर हालत में तुम अकारण ही जीते हो। कारण भला तुम खोज लो, कारण है नहीं। कारण तुम्हारा ही आरोपण है। इसे समझने की कोशिश करो।
जीवन कहीं जा नहीं रहा है, जीवन है। जीवन का कोई भविष्य नही है, बस वर्तमान है। वर्तमान ही एकमात्र अस्तित्व का ढंग है।
तुम जन्मे, क्या कारण है? पूछोगे, उलझोगे। पूछोगे तो कोई न कोई प्रश्न का उत्तर देने वाला भी मिल जाएगा; कोई न मिलेगा तो तुम खुद ही अपने मन को कोई उत्तर देकर समझा लोगे। ऐसे ही तो सारे दर्शनशास्त्र निर्मित हुए हैं। आदमी ने पूछा—उत्तर देने वाला कोई भी नहीं है—आदमी ने ही पूछा, आदमी ने ही उत्तर दे लिए। फिर प्रश्नों की पीड़ा से बचने के लिए उत्तरों को सम्हालकर रख लिया, संजोकर रख लिया, मंजूषाएं बना लीं—वेद बने, कुरान—बाइबिल बनी। आदमी की बेचैनी समझ में आती है। उसे लगता है, क्यों? कारण होना चाहिए!

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-050)

(अशांति की समझ ही शांति)--प्रवचन—पचासवां
सारसूत्र:

अथ पापानि कम्मानि करं वालो न बुज्‍झति।
सेहि कम्मेहि दुम्‍मेधो अग्‍निदड्ढ़ो' व तप्पति।।120।।

न नग्‍गचरिया न जटा न पंका
नाकसका थण्डिलसाकिका वा।
रज्जोवजल्लं उक्कुटिकपधानं
सोधेन्ति मच्चं अवितिण्णकंखं।।121।।

अलंकतो चेपि समं चरेथ्य
सन्तो दन्तो नियतो ब्रह्मचारी।
सब्‍बेसु भूतेसु' निधाय दण्ड
सो ब्राह्मणो सो समणो स भिक्‍खू ।।122।।


हिरीनिसधो पुरिसो कोचि लोकस्मि विज्जति।
यो निन्दं अप्पबोधति अस्सो भद्रो कसामिव ।।123।।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-049)

 (महोत्सव से परमात्मा, महोत्सव में परमात्मा)--प्रवचन—उन्नचासवां 

पहला प्रश्‍न:


भगवान, मैं आपको वर्षों से सून रहा हूं, लंबे अर्से से मैं आपके पास हूं। मैंने समय—समय पर आयसे कई भिन्न—भिन्न वक्तव्य और परस्पर विरोधी वक्तव्य सुने, लेकिन उनके संबंध में कहीं कोई प्रश्न गै मन में नहीं उठा। और उनके बावजद आप मेरी दृष्टि में और मेरे हृदय में सदा—सर्वदा एक ओrर अखंड बने रहे। इस पर कुछ प्रकाश डालने की अनुकंपा करें।

मेरे पास दो ढंग से हो सकते हो। एक तो विचार से, बुद्धि से, और एक हृदय से और भाव से। बुद्धि और विचार से अगर मेरे पास हो, तो बड़ी अड़चन होगी। रोज—रोज विरोधी वक्तव्य होंगे। रोज—रोज तुम्हें सुलझाना पड़ेगा, फिर भी तुम सुलझा न पाओगे।
बुद्धि कभी कुछ सुलझा ही नहीं पाती। जहा सीधी—सीधी बात हो, वहा भी बुद्धिं उलझा लेती है। तो मेरी बातें तो बड़ी उलझी हैं। जहा सब साफ—सुथरा हो, वहा भी बुद्धि समस्याएं खड़ी कर लेती है। तो मैं तो उन रास्तों की बात कर रहा हूं जो बड़े धुंधलके से भरे हैं। एक ही रास्ते की बात हो, तो भी बुद्धि विरोध खोज लेती है। येतो अनंत रास्तों की बातें हैं।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-048)

(आज बनकर जी!)--प्रवचन—अडतालिसवां 
सारसूत्र:

सब्‍बे तसन्‍ति दण्‍डस्‍स सब्‍बे भायंति मच्‍चुनो।
अत्‍तानं उपमं कत्‍वा न हन्‍नेय न घातये ।।115।।


सुखकामानि भूतानियो दण्‍डेन विहिंसति।
अत्‍तनो सुखमेसानो पेच्‍च सो न लभते सुखं।।116।।

सुखकामानि भूतानि यो दण्‍डेन न हिंसति।
अत्‍तनो सुखमेसानो पेच्‍च सो लभते सुखं।।117।।

मावोच्‍च फरूसं कज्‍जि वुत्‍ता पटिवदेय्युतं।
दुख्‍खा हि सारम्‍भकथा पटिदण्‍डा फुस्‍सेय्यु तं।।118।।

सचंनेरेसि अत्‍तानं कंसो उपहतो यथा।
एक पत्‍तोसि निब्‍बानं सारम्‍भो ते न विज्‍जति।।119।।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-047)

(अकेलेपन की गहन प्रतीति है मुक्ति)-प्रवचन—सैतालिसवांं 

पहला प्रश्‍न:

हम तो जीते—जी और सोते—जागते भय और अपराध—भाव के द्वारा आशेष नारकीय पीड़ा से गुजर चकते हैं। क्या यह काफी नहीं है? कि मरने के बाद फिरे हमें नर्क भेजा जाए!



पहली बात, कोई भेजने वाल नहीं है, कोई भेजता नहीं है। तुम जाते हो इसे बहुत ठीक से समझ लो। अन्‍यथा बुद्ध के दृष्‍टिोण को पकड़ न पाओगे।
बुद्ध के दृष्टिकोण में जो अत्यंत आधारभूत बात है, वह यह है—धर्म, ईश्वर से शून्य। अगर तुम किसी भांति ईश्वर को पकड़े रहे, तो बुद्ध के धर्म को समझ न पाओगे। ईश्वर के बहाने तुमने किसी दूसरे पर दायित्व छोड़ा है।
तुम कहते हो, दुख तो हम भोग चुके बहुत, अब हमें नर्क न भेजा जाए—जैसे तुम्हें कोई भेजने वाला है! कि प्रार्थना और पूजा हमने इतनी की, अब हमें स्वर्ग भैजा जाए—जैसे कि कोई पुरस्कार बांट रहा है। वहां कोई भी नहीं है।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-046)

 (जीवन—मृत्यु से पार है अमृत).प्रवचन—छियालिसवां 
सारसूत्र:

वणिजो व भयं मग्‍गं अप्‍पसत्‍थोमहद्धनो।
विसं जीवितुकामो व पापनि परिवज्‍जये।।109।।

पाणिम्‍हि चे वणो नास्‍स हरेय्य पाणिना विसं।
नाब्‍बणं विसमन्‍वेति नित्‍थ पापं अकुब्‍बतो।।110।।

यो अप्‍पदुट्ठस्‍स नरस्‍स दुस्‍सति।
सुद्धस्‍स पोसस्‍स अनंगणस्‍स।
तमेव बालं पच्‍चेति पापं।
सुखमो रजो पटिवातं व खितो।।111।।

गब्‍भमेके उप्‍पज्‍जन्‍ति निरयं पापकम्‍मिनौ।
सग्‍गं सुगतिनो यन्‍ति परिनिब्‍बन्‍ति अनासवा।।112।।

रविवार, 2 अप्रैल 2017

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-045)

प्रवचन—पैंतालिसवां    
सुख या दुख तुम्हारा ही निर्णय

         पहला प्रश्‍न:

क्‍या मेरी नियति में सिर्फ विषाद की, फ्रस्ट्रेशन की एक लंबी श्रंखला लिखी है?


तुम्‍हारे हाथ में है। लिखते जाओगे, तो लिखी रहेगी। विषाद कोई और तुम्हें नहीं दे रहा है, तुम्हारा चुनाव है। तुमने चुना है। आनंद भी कोई और नहीं देगा। तुम चुनोगे, तो मिलेगा। तुम जो खोज लेते हो, वही तुम्हारा भाग्य है।
भाग्य की पुरानी धारणा कहती है, लिखा हुआ है; और किसी और ने लिखा है, तुमने नहीं। मैं तुमसे कहना चाहता हूं? भाग्य लिखा हुआ नहीं है, रोज—रोज लिखना पड़ता है। और किसी और के द्वारा नहीं, तुम्हारे ही हाथों से लिखा जाता है। यह हो सकता है कि तुम इतनी बेहोशी में लिखते हो कि अपने ही हाथ पराए मालूम होते हैं। यह हो सकता है, तुम इतनी अचेतन अवस्था में लिखते हो कि लिख जाते हो तभी पता चलता है कि कुछ लिख गया। तुम अपने को रंगे हाथ नहीं पकड़ पाते। तुम्हारे होश की कमी है। लेकिन कोई और तुम्हारा भाग्य नहीं लिखता है।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-044)

एस धम्मो संनतनो-(भाग-05)
प्रवचन-चव्वाालिसवाां    

ऊर्जा का क्षण-क्षण उपयोग: धर्म

सारसूत्र:

अभित्थरेथ कल्याणे पापा चित्तं निवारये।
दन्धं हि करोतो पुग्भ् पापस्मिं रमते मनो।।१०२।।

पापग्चे पुरिसो कयिरा न तं कयिरा पुनप्पुनं।
न तम्हि छन्दं कयिराथ दुक्खो पापस्स उच्चयो।।१०३।।

पुग्भ्ग्चे पुरिसो कयिरा कयिराथेन पुनप्पुनं।
तम्हि छन्दं कयिराथ सुखो पुग्भ्स्स उच्चयो।।१०४।।

पापोपि पस्सति भद्रं याव पापं न पच्चति।
यदा च पच्चति पापं अथ पापो पापानि पस्सति।।१०५।।

भद्रोपि पस्सति पापं याव भद्रं न पच्चति।
यदा च पच्चति भद्रं अथ भद्रो भद्रानि पस्सति।।१०६।।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-043)

एस धम्मो संनतनो-(भाग-05)
प्रवचन-043  

परमात्मा अपनी ओर आने का ही ढंग--प्ररवचन-तीरलिसवां


पहला प्रश्न:

कल तक आप हमें परमात्मा की ओर जाने को कह रहे थे, आज हमें अपनी ही ओर जाने पर जोर दे रहे हैं। आपको तो दोनों ओर, दोनों अतियों में बहना सरल है, खेल है, पर हम कैसे इतनी सरलता से दोनों ओर बहें, आपके साथ-साथ बहें? कृपा कर समझाएं।

जीवन को अतियों में तोड़कर देखना ही गलत है। जीवन को दो में तोड़कर देखने में ही भ्रांति है। तुम अगर कभी एक को भी चुनते हो, तो दो के खिलाफ चुनते हो। तुम्हारे एक में भी दो का भाव बना ही रहता है। तुम एक किनारे को चुनते हो, तो दूसरे किनारे को छोड़कर चुनते हो। छोड़ने से दूसरा किनारा मिटता नहीं। तुम्हारे छोड़ने से दूसरे किनारे के मिटने का क्या संबंध है!
वस्तुतः तुम्हारे इस किनारे को पकड़ने में दूसरा किनारा बना ही रहता है। तुम उसके विपरीत ही इसे पकड़े हो। अगर दूसरा किनारा खो जाए, तो यह किनारा भी कैसे बचेगा? जाते हैं दोनों साथ जाते हैं, रहते हैं दोनों साथ रहते हैं।

एस धम्मो संनतनो-(प्रवचन-042)

एस धम्मो संनतनो-(भाग-05)
प्रवचन-042  (झुकने से उपलब्धि)

अभिवादनसीलिस्स निच्चं पद्धापचायिनो।
चत्वारो धम्मा बङ्ढन्ति आयु वण्णो सुखं बलं।।९६।।

यो च वस्ससतं जीवे दुस्सीलो असमाहितो।
एकाहं जीवितं सेय्यो सीलवन्तस्स झयिनो।।९७।।

यो च वस्ससतं जीवे कुसीतो हीनवीरियो।
एकाहं जीवितं सेय्यो विरियमारभतं दल्हं।।९८।।

यो च वस्ससतं जीवे अपस्सं उदयब्बयं।
एकाहं जीवितं सेय्यो पस्सतो उदयब्बयं।।९९।।

यो च वस्ससतं जीवे अपस्सं अमतं पदं।
एकाहं जीवितं सेय्यो पस्सतो अमतं पदं।।१००।।

यो च वस्ससतं जीवे अपस्सं धम्ममुत्तमं।
एकाहं जीवितं सेय्यो पस्सतो धम्ममुत्तमं।।१०१।।

एस धम्मों संनतनो-(भाग-05) ओशो

एस धम्‍मो संनतनो-(भाग-05)—ओशो


जो बुद्ध के पास था, ठीक उतना ही लेकर तुम भी पैदा हुए हो। तुम्‍हारी वाणी में और बुद्ध की वाणी में रत्‍ती भर का फासला नहीं है। भला तुम्‍हारे तार ढीले हों, थोड़े कसने पड़े। या तुम्‍हारे तार थोड़े कसे हों, थोड़े ढीले करने पड़ें। या तुम्‍हारे तार वीणा से अलग पड़े हो और उन्‍हें वीणा पर बिठाना पड़े लेकिन तुम्‍हारे पास ठीक उतना ही सामान है, उतना ही साज है जितना बुद्ध के पास। अगर बुद्ध के जीवन में संगीत पैदा हो सका, तुम्‍हारे जीवन में भी हो सकेगा। इसी बात का नाम आस्‍था है।


ओशो