मेरे
प्रिय आत्मन्,
इन
तीन दिवसों में
बहुत प्रेम की, और बहुत
शांति की, आनंद
की वर्षा
हमारे हृदयों
में रही। और
मैं तो उन
पक्षियों में
से हूं, जिनका
कोई नीड़ नहीं
होता। और मुझे
आपने अपने हृदयों
में जगह दी, मेरे
विचारों को और
मेरे हृदय से
निकले हुए उदगारों
को आपने चाहा,
उन्हें मौन
से सुना, उनको
समझने की
कोशिश की और
उनके प्रति
बहुत प्रेम
प्रकट किया, उस सबके लिए
मैं अनुगृहीत
हूं। आपकी
आंखों में, आपकी खुशी
में, और
आपकी खुशी में
आ गए आंसुओं
में मुझे जो
दिखायी पड़ा, उसके लिए भी
अनुगृहीत
हूं।

