भक्ति जीवन का परम स्वीकार
है—पहला प्रवचन
दिनांक 11 जनवरी, 1987,
दिनांक 11 जनवरी, 1987,
श्री रजनीश आश्रम
पूना।
सूत्र :
ओम् अथातोभक्तिजिज्ञासा।।1।।
सापरानुरक्तिरीश्वरे।।2।।
तत्संस्थास्यामृतत्वोपदेशात्।।3।।
ज्ञानमितिचेन्नद्विषतोऽपिज्ञानस्यतदसस्थिते:।।4।।
तयोपक्षयाच्च।। 5।।
ओम् अथातोभक्तिजिज्ञासा!
यह सुबह, यह वृक्षों में शांति, पक्षियों की चहचहाहट... या कि हवाओं का वृक्षों से गुजरना, पहाड़ों का सन्नाटा... या कि नदियां का पहाड़ों से उतरना... या सागरों में लहरों
की हलचल, नाद... या आकाश में बादलों की गड़गड़ाहट—यह सभी ओंकार
है।
ओंकार का अर्थ है : सार—ध्वनि; समस्त ध्वनियों
का सार। ओंकार कोई मंत्र नहीं, सभी छंदों में छिपी हुई आत्मा
का नाम है। जहां भी गीत है, वहां ओंकार है। जहां भी वाणी है,
वहां ओंकार है। जहां भी ध्वनि है, वहां ओंकार है।
