कुल पेज दृश्य

क्या सोवै तू बावरी-(प्रश्नोंत्तर) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
क्या सोवै तू बावरी-(प्रश्नोंत्तर) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 25 अगस्त 2018

क्या सोवै तू बावरी-(प्रवचन-07)

सातवां-प्रवचन-(निजता की घोषणा)

प्रश्नः मेडिटेशन के लिए मन भी शांत होना चाहिए?
मन ही अगर शांत हो, तो फिर ध्यान की जरूरत ही नहीं।

प्रश्नः नहीं हो, तो?

पागल है तू। यह तो ऐसा हुआ कि बीमार डाक्टर के पास जाए और डाक्टर कहे, स्वस्थ हो तो हमारे पास आओ ध्यान से मन को शांत करवा देंगे। पहले से शांत होने की जरूरत नहीं है। क्या जरूरत है शांत होने की? वह कोई शर्त नहीं है शांत होना, वह परिणाम है उसका, कांसिक्वेंस है।

प्रश्नः मन का अशांत होना, उसका नेचर नहीं है?

नहीं, बिलकुल नहीं। मन को अशांत करने के लिए बड़ी मेहनत उठानी पड़ती है। जिंदगी भर मेहनत की, तो थोड़ा-बहुत कर पाते हैं। फिर भी पूरा नहीं कर पाते हैं, नहीं तो पागल हो जाएं।


प्रश्नः इकबाल थे, जो बहुत बड़े शायर थे। उन्होंने अपने बेटे के लिए दुआ लिखी है। उन्होंने लिखा है कि खुदा तुझे किसी तूफां से आशनाई कर दे, कि तेरे बहार के मौजूं में...तो तूफान से आशनाई?

क्या सोवै तू बावरी-(प्रवचन-06)

छठवां-प्रवचन-(ध्यान हैः भगवत्ता)


प्रश्नः आजकल अनेक संत लोग चमत्कार बताते हैं, उसके संबंध में आपका क्या मंतव्य है?
आदमी बहुत कमजोर है और बहुत तरह की तकलीफों में है। उसकी तकलीफें बिलकुल सांसारिक हैं। अभी एक, और सामान्य आदमी ही नहीं--सुशिक्षित, जिनको हम विशेष कहें वे भी...। अभी एक चार-छह दिन पहले कलकत्ते से एक डाक्टर का पत्र मुझे आया। वह डाक्टर है। तबादला करवाना है, कलकत्ते से बनारस। पत्नी-बच्चे बनारस में हैं। तो मुझे लिखता है कि मैं सब तरह की पूजा-पाठ करवा चुका हूं। साधु-संतों के सब तरह के दर्शन कर चुका हूं, सैकड़ों रुपए भी खर्च कर चुका इस पर, लेकिन अभी तक मेरा तबादला नहीं हो पाया। तब आखिरी आपकी शरण आता हूं। तबादला करवा दें, नहीं तो मेरा भगवान से भरोसा ही उठ जाएगा।
इधर मैं देखता हूं, सौ मैं निन्यानबे आदमियों की तकलीफें ऐसी हैं। और जितना गरीब मुल्क होगा, उतनी ही तकलीफें ज्यादा होंगी। किसी को नौकरी नहीं, किसी को बच्चा नहीं, किसी को बीमारी है, किसी को कोई तकलीफ है। हजार तरह की तकलीफें हैं! यह जो तकलीफों से भरा हुआ आदमी है, यह चमत्कार की तलाश करता है। अगर कोई चमत्कार कर रहा है, तो इसे एक आशा बनती है। और तो सब आशा छूट गई। और यह सब उपाय कर चुका है, कुछ होता दिखाई इसे पड़ता नहीं।
लेकिन अगर यह देख ले कि कोई आदमी हवा में से भभूत दे रहा है, तो फिर इसे भरोसा आता है कि अभी भी कुछ आशा है। मुझे भी लड़का मिल सकता है। जब हवा से भभूत आ सकती है। तो साधु के चमत्कार से बच्चा भी आ सकता है। और अगर हाथ से सोना आ जाता है और घड़ियां आ जाती हैं, तो फिर क्या दिक्कत कि मेरा तबादला न हो और मुझे नौकरी न मिल जाए!

क्या सोवै तू बावरी-(प्रवचन-05)

पांचवां-प्रवचन-(संन्यास और अंतस-क्रांति)

अगर आप पुरुष हैं और आपको किसी स्त्री का आकर्षण है, तो यह आकर्षण बहुत गहरे में आपके भीतर ही जो आधी स्त्री बैठी है, उसके प्रति है। और जब तक यह स्त्री भीतर नष्ट न हो जाये, तब तक आप बाहर कितनी पत्नियां छोड़ते रहें, भागते रहें, कोई परिणाम नहीं होगा। आपके मन में स्त्री का आकर्षण बना ही रहेगा। वह घूम-फिर कर आता ही रहेगा। फिर आप नई-नई कल्पनाओं में उसका ही रस लेते रहेंगे।
संन्यास बच्चों जैसी बात नहीं है कि एक लड़के को साधु-संन्यासियों की बात सुन कर या किसी लड़की को भावावेश आ गया और उसने कपड़े बदल लिए और कुछ उलटा-सीधा कर लिया, तो वह कोई संन्यासी हो गया! भीतर उसकी साइक कैसी बनेगी! उसका पूरा का पूरा अंतःकरण और मन कैसे बनेगा?
उस मन में तो, उसके अनकांशस में विपरीत लिंग बैठा हुआ है। अगर वह पुरुष है, तो उसके अनकांशस में स्त्री है; और अगर वह स्त्री है, तो उसके बहुत गहरे में पुरुष बैठा हुआ है। और उसी का आकर्षण है भीतर। बाहर उसी की खोज चलती है।

क्या सोवै तू बावरी-(प्रवचन-04)

चौथा-प्रवचन-(विश्वास नहीं--स्वानुभव)

पहले दिन मैंने आपसे कहा, हमें इस बात का स्मरण भी नहीं है कि हम हैं। हमारी सत्ता का बोध भी हमें नहीं है। और जिसे यह भी पता न हो कि वह है...पुनर्जन्म को न मानें, कर्म को न मानें, या किसी चीज को आप जब बिलीफ की तरह पकड़ लेते हैं, तब आपका मस्तिष्क सोचना बंद कर देता है। आपने कैसे जाना कि लाख कर्म हैं? सुना तो बिलीफ बन गया। अगर आप दूसरे मुल्क में पैदा होते, जहां यह बात न सुनी जाती, तो फिर न बनता बिलीफ। यह तो आस-पास का प्रोपेगेंडा है, जिसका परिणाम है कि आप में बिलीफ पैदा हो जाता है। अब यह हिंदुस्तान में है। पड़ोस में ही दूसरे बिलीफ वाले भी रहते हैं, और आप भी रह रहे हैं। वे माइंड अपना क्लोज रखे हुए हैं। जो उनके बिलीफ से उठा है, वे पकड़े हुए हैं, जो आपके बिलीफ हैं, आप पकड़े हुए हैं। आप पड़ोसी थोड़े ही हैं किसी के, क्योंकि सब क्लोज्ड हैं, कोई किसी से मिल थोड़े ही रहा है।
जब तक आप में बिलीफ है तब तक आप किसी के पड़ोसी नहीं हो सकते। मैं हिंदू हूं, आप मुसलमान हैं, मैं कैसे प.ड़ोसी होऊंगा? और यह बिलीफ बांधे हुए है घेरे को। लेकिन अगर बिलीफ अलग हो जाए, तो जिनको हम सीकर्स आफ नालेज कहें, वे पड़ोसी होंगे, और कोई पड़ोसी नहीं हो सकता दुनिया में। विश्वास तोड़ देता है संबंध को। विश्वास लोगों से तोड़ देता है और खोज से भी तोड़ देता है।

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

क्या सोवै तू बावरी-(प्रवचन-03)

क्या सोवै तू बावरी-तीसरा प्रवचन 

प्रश्न: सारे विश्व की दौड़ ज्यादा से ज्यादा भौतिक सुख को प्राप्त करने के लिए लगी हुई है। लेकिन लोग फिर भी स्थिर नहीं हैं और अशांत हैं--भौतिक सुखों को प्राप्त कर लेने पर भी। इस संबंध में आपकी क्या धारणा है?
ऐसा है अब मेरी धारणा बहुत अजीब है। उसको समझ लें तो एक दृष्टि खुल सकती है। जब एक आदमी धन की तलाश कर रहा है, तो आमतौर से हम सोचते हैं कि वह ईश्वर के विपरीत तलाश कर रहा है। मैं नहीं सोचता। मैं सोचता हूं, वह ईश्वर की ही तलाश कर रहा है। जब एक आदमी पद की तलाश कर रहा है, तो लोग सोचते हैं, वह ईश्वर के विपरीत खोज रहा है। मैं नहीं सोचता, मैं सोचता हूं, ईश्वर को ही खोज रहा है। और इसको मैं यूं लेता हूं।
एक आदमी को हम कल्पना में ले लें--आपको ही ले लूं। मैं आपसे कहूं, आप कितने धन पर तृप्त हो जाएंगे? तो आपका मन एक आंकड़ा तय करेगा, तत्काल और आगे निकल जाएगा कि इससे काम नहीं चलेगा। मैं कोई भी आंकड़ा आपको कहूं, कोई भी संख्या, आपका मन कहेगा: "इससे काम नहीं चलेगा!' इसका क्या अर्थ हुआ? इसका अर्थ हुआ अनंत धन न मिले, तब तक काम नहीं चल सकता।

क्या सोवै तू बावरी-(प्रवचन-02)

क्या सोवै तू बावरी-प्रवचन-दूसरा 

दिनांक २४ फरवरी, १९६९; के. ई. एम. हास्पिटल, बंबई. 
मेरे प्रिय आत्मन् ,
एक परिवार में मैं मेहमान था। उस परिवार के द्वार पर ही एक पक्षी को, एक सुंदर पक्षी को पिंजड़े में बंद रखा गया। उस पिंजड़े की कांच की दीवालें थीं। शायद उस पक्षी को पता भी नहीं होगा कि उसके और दुनिया के बीच में कोई दीवाल है! कांच की दीवाल तो ट्रांसपेरेंट थी। उसके पार दिखाई पड़ता था। और इसीलिए पक्षी को शायद पता भी नहीं चलता हो कि उसे और आकाश को रोकने वाली कोई बीच में, कोई बाधा है।

क्या सोवै तू बावरी-(प्रवचन-01)

ओशो द्वारा दिए गए सात प्रवचनों का संकलन।‘अगर कोई भी विचार पहुंचाना हो, लगता हो कि प्रीतिपूर्ण है, पहुंचाने जैसा है, तो उसके लिए बल इकट्ठा करना, संगठित होना, उसके लिए सहारा बनना एकदम जरूरी है। तो उसके लिए तो डिटेल्स में सोचें, विचार करें। लेकिन ये सारी बातें जो मुझे सुझाई हैं, ये सब ठीक हैं।
(दिनांक 1 फरवरी 1969 ओर 27 नवम्बर 1968 के बीच प्रश्नोत्तर चर्चा)

क्या सोवै तू बावरी-प्रवचन-पहला 

दिनांक १ फरवरी, १९६९; ईश्वर भाई के निवास स्थान पर विचार-गोष्ठी, बंबई
तो पहली बात, सबसे पहले तो जैसा कि धीरू भाई ने कहा, जरूर एक ऐसा संगठन चाहिए युवकों का जो किसी न किसी रूप में सैन्य ढंग से संगठित हो। संगठन तो चाहिए ही। और जैसा काकू भाई ने भी कहा, जब तक एक अनुशासन, एक डिसिप्लेन न हो, तब तक कोई संगठन आगे नहीं जा सकता है--युवकों का तो नहीं जा सकता है।
तो काकू भाई का सुझाव और धीरू भाई का सुझाव दोनों उपयोगी हैं। चाहे रोज मिलना आज संभव न हो पाए तो सप्ताह में तीन बार मिलें। अगर वह भी संभव न हो तो दो बार मिलें। एक जगह इकट्ठे हों। एक नियत समय पर, घंटे-डेढ़ घंटे के लिए इकट्ठे हों। और जैसा कि एक मित्र ने कहा कि "मित्रता कैसे बढ़े?'