चैथा प्रवचन-(सत्य का बोध)
12-6-1966 फर्गुसन कालेज पूना।
सत्य के संबंध में कल थोड़ी सी बातें मैंने विचार कीं। मैंने आपको कहा, जिसे हम जीवन समझते हैं, जीवन मानते हैं, वह वास्तविक न होकर छाया का जीवन है। और जो व्यक्ति छाया का पीछा करेगा, उसकी उपलब्धि क्या होगी? पहली बात यह है कि छाया का हम कितना भी पीछा करें उसे कभी पकड़ नहीं सकेंगे। असंभव है कि हम छाया को पकड़ लें। और छाया को पकड़ भी लें तो भी हमारी मुट्ठी में क्या होगा, हमारे पास क्या होगा?
यह जो छाया का जीवन है, यह जो शैडो एक्झिस्टेंस है, इसके प्रति यदि हम जाग जाए, और यह हमारे बोध में आ सके कि क्या असार है और क्या सार है, वास्तविक है और क्या काल्पनिक है, क्या स्वप्न है और क्या सत्य है तो जीवन में एक नई दिशा का उदघाटन प्रारंभ होता है। उसके संबंध में थोड़ा सा हमने विचार किया।
आज मैं इस संबंध में आपसे बात करना चाहूंगा, यह जो छाया का जीवन है, यह जो स्वप्न का जीवन है, यह जो अवास्तविक, यह जो असार है, यह किन आधारों पर खड़ा है? यह मन के किन मार्गों पर, मन की किन वृत्तियों पर खड़ा है? क्योंकि चाहे हम स्वप्न देखते हों, और चाहे जाग गए हों, दोनों स्थितियों में हमारा मन रचना कर रहा है, कुछ निर्माण कर रहा है।