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स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(आनंद स्‍वभाव) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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शनिवार, 26 दिसंबर 2015

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(अध्‍याय--62)

अतित से भविष्‍य की और—(अध्‍याय—बाष्‍ठवां)

आज हम ठहर कर देख सकते हैं कि कुछ वर्ष पूर्व ओशो जैसे मनीषी ने अपने कार्य की शुरुआत की, भारत भर में घूम—घूम कर प्रवचन दिये, नव—संन्यास आदोंलन से दुनिया को परिचित करवाया, आज के मानव के लिए बेहद उपयुक्त ध्यान विधियों का निर्माण किया, पूरी दुनिया के प्रतिभावान लोगों को अपने आसपास इकट्ठा किया, दुनिया के सर्वश्रेष्ठ शक्ति संपन्न देश अमरीका में जाकर सवा सौ एकड़ जमीन पर अपनी तरह के अनूठे शहर का निर्माण किया, विश्व यात्राएं की,
अपने क्रांतिकारी विचारों से पूरी दुनिया में एक महाक्रांति पैदा कर दी, आज के अति आधुनिक, तार्किक, संदेह से भरे मन को धर्म, ध्यान, श्रद्धा, भक्ति और मोक्ष के पथ पर अग्रसर किया। और लगभग इक्कीस साल हुए मात्र अट्ठावन वर्ष की उम्र में देह से विदा भी हो गए।

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(अध्‍याय--61)

उसकी अनुकंपा अपार है......(अध्‍याय—इक्‍ष्‍ठवां)

मारे देश में गुटखा और तंबाखू का खूब चलन है। पान की लाली रचाकर, हर कहीं उस लाली के निशान छोडना आम बात है। जिन लोगों को यह लत नहीं होती शायद वे कभी भी नहीं समझ पाते हैं कि आखिर क्यों कोई इस गुटखे या तंबाखू का ऐसा आदी हो जाता है। लेकिन जिन लोगों को इसकी लत लग जाती है वे कितनी ही कोशिश कर ले यह लत या तो उन्हें मौत तक ले जाती है या मौत आने पर यह लत उन्हें छोड देती है।

गुटखे या तंबाखू से कैंसर हो सकता है, यह बात संभवतया सभी जानते हैं। जिनको इसकी लत होती है वे भी अच्छे से जानते हैं कि यह छोटी सी पुड़िया उन्हें कैंसर जैसे खतरनाक रोग तक ले जा रही है।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(अध्‍याय--60)

विरोधाभास का आभास क्‍यों?—(अध्‍याय—छाठवां)

शो के बारे में अक्सर यह भी कहा जाता है कि वे बहुत विरोधाभासी हैं। पहली तो बात यह समझने की है कि ओशो ने हर देश, हर जाति, हर विषय पर बोला है। शायद ही ऐसा कोई विषय होगा जिस पर ओशो नहीं बोले। धर्म, दर्शन, कला, विज्ञान, मनोविज्ञान, साहित्य, शिक्षा कुछ भी तो नहीं छोड़ा। एक ही व्यक्ति पूरब से लेकर पश्चिम तक, उत्तर से लेकर दक्षिण तक फैली सारी मानवता के हर आयाम पर लगातार बोलता है।
मनुष्य के शात इतिहास से लेकर अधुनातन विषयों पर वे सतत् बोले हैं। अब क्या विभिन्न विषय इतने विरोधाभासी स्वत: ही नहीं होते हैं? हर विषय पर अपने आप में एक अलग ही दुनिया है जब एक व्यक्ति उस पर बोलेगा तो उसके वचन एक—दूसरे के खिलाफ जाते तो दिखाई देंगे ही।

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(अध्‍याय--59)

सेक्‍स पर ओशो का नजरिया—(अध्‍याय—उन्‍नष्‍ठवां)

सेक्स, सेक्स, सेक्स.. .इस शब्द में कैसा जादू है कि पढ़ते, सुनते कहीं न कहीं चोट जरूर पड़ती है। क्या कोई ऐसा व्यक्ति होता है जो इस शब्द को सिर्फ शब्द की तरह सुन ले या पढ़ ले? पश्चिम ने इस विषय पर फ्रायड के बाद विचार शुरू किया। और पूरब में भारत ने चेतना की इतनी ऊंचाइयां छुई हैं कि जीवन के हर आयाम को पूर्ण स्वीकार किया है। यहां पर चार्वाक भी महर्षि कहलाए। वात्सायन और कोक भी ऋषि तुल्य माने गये। शायद इस पृथ्वी पर सेक्स के बारे में विस्तार से चर्चा सबसे पहले भारत में ही हुई है.. .हजारों वर्ष पूर्व।

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(अध्‍याय--58)

ओशो मेरी नजर में—(अध्‍याय—अठावनवां)

शो के साथ एक युग जीया है, लौटकर देखूं तो यूं लगता है कि पता नहीं कितने सालों से, सदियों से, युगों से ओशो के साथ हूं। जिस पल ओशो मिले वहां से लेकर इस पल तक सिवाय ओशो के कुछ भी तो जीवन में नहीं हुआ है। हर पल, हर समय ओशो हर श्वास में बने रहे हैं।

ओशो से संन्यास दीक्षित हुआ, ओशो के सान्निध्य में ध्यान किये, ओशो के अनगिनत प्रवचन सामने बैठ कर सुनें। सालों तक देश भर में घूमते हुए लाखों मित्रों के साथ ओशो संदेश का आनंद लिया, ध्यान का आनंद लिया। अनगिनत मित्रों को ओशो के संन्यास में, ध्यान की राह पर दीक्षित होते देखा, न जाने कितने रूपांतरण अपनी आंखों के सामने से गुजरे......मेरे व्यक्ति—गत जीवन से लेकर लाखों मित्रों के जीवन में होने वाले परिवर्तनों, रूपांतरण को देखते, महसूस करते स्वाभाविक ही ओशो के प्रति प्रेम, श्रद्धा और उनकी महानता अधिक से अधिक होती चली गई।

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(अध्‍याय--57)

ध्‍यान के लिए स्‍थल, जगह, आश्रम, केंद्र......कम्‍यून—(अध्‍याय—सत्‍तावनवां)

पूरे देश में ध्यान शिविर लेते—लेते मुझे यह तो बहुत ही स्पष्ट हो गया कि शिविर के दौरान तीन दिन निश्चित ही मित्र पूरी त्वरा और लगन से ध्यान करते हैं लेकिन सभी मित्रों के लिए अपने—अपने घर पर नियमित ध्यान जारी रखना मुश्किल ही होता है। मैंने देखा कि अधिकांश मित्रों को कोई न कोई वजह से ध्यान ना चाहकर भी रोकना पड़ता है। मुझे लगा कि यदि देश की चारों दिशाओं में, हर तरफ ऐसी कोई जगह हो, जहां जाकर मित्र ध्यान कर सकें तो बहुत ही शुभ हो सकता है।

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(अध्‍याय--56)

सौंदर्य की पारखी नजर—(अध्‍याय—छप्‍पनवां)

शो सौंदर्य के बड़े गहरे पारखी हैं। वे हर चीज को इतना सुंदर से सुंदर बना देते हैं कि कोई सोच भी नहीं सकता। वे जीवन में सत्यम, शिवम, सुंदरम के पक्षधर रहे हैं। हर चीज में सौंदर्य हो। किसी बहाने रेल्वे स्टेशन का जिक्र करते इशारा करते हैं कि रेल्वे स्टेशन भी कितने सुंदर बनाये जा सकते हैं।

मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(अध्‍याय--55)

सुपारी किलर—(अध्‍याय—पच्‍चपनवां)

शो की दुनिया अजीब दुनिया है। ओशो कहते भी हैं कि सभी तरह के मस्त—मौला लोग तुम मेरे पास पाओगे। ओशो के साथ आने वाले लोग एक तरह से सम में हट कर जीने वाले होते हैं। हिसाबी—किताबी, सफलता, महत्वाकांक्षी, अहंकार के पीछे दौड़ने वालों को ओशो की बातें कम ही समझ आती हैं। भूले— भटके इस तरह का कोई व्यक्ति ओशो के पास आ भी जाता है तो उसे वापस जाने में देर नहीं लगती।
ओशो के साथ तो सिर्फ जुआरियों की बात बनती है, पियक्कड़ों का मेल ओशो से खूब बैठता है। सारे संसार के सभी समाजों में जो मिस फिट होते हैं वे ओशो के साथ पूरी तरह से फिट बैठ जाते हैं। ओशो की दुनिया तो दीवानों की दुनिया है, परवानों का संसार है। अब सालों तक ऐसे दीवानों—परवानों के साथ रहना कोई आसान काम नहीं है।

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(अध्‍याय--54)

आलू बैंगन, बैंगन आलू—(अध्‍याय—चौवनवां)

      भारत एक विशाल देश है। यहां बोली—चाली, रहन—सहन, खान—पान हर तरह की इतनी विविधता है कि जब आप इन सबका अनुभव करते हैं तो पता चलता है कि इस विविधता के अपने मजे हैं और अपनी चुनौतियां भी। हर तरह के मौसम और जलवायु का तो अपना अनुभव है ही लेकिन खान—पान पर एक अनूठा अनुभव यहां आपके लिए।

गुजरात के मित्रों ने जामनगर में शिविर किया। पहले दिन मैंने पूछा, 'दोपहर के भोजन में क्या बना है। तो बोले 'बैगन आलू की सब्जी।रात को बोले, 'आलू बैंगन की सब्जी।मेरे को यह समझ में ना आए कि इन दोनों सब्जियों में फर्क क्या है तो मैंने आयोजकों से पूछा, 'इसमें फर्क क्या होता है?' तो बोले, 'बैगन आलू में बैगन ज्यादा आलू कम, और आलू बैंगन में आलू ज्यादा बैगन कम।

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(अध्‍याय--53)

पहलगांव में आफत—(अध्‍याय—त्ररेपनवां)

जाने कितनी बार मित्रों की लापरवाही और बेपरवाही के कड़वे अनुभव मुझे हुए हैं। मुझे यह देखकर आश्चर्य होता कि कैसे लोग छोटी—छोटी बातों को लेकर इतने लापरवाह हो सकते हैं और किसी दूसरे को बडी परेशानी में फंसा देते हैं। ऐसा ही एक बार का अनुभव सुनाता हूं।

श्रीनगर के एक मित्र ने ध्यान शिविर आयोजित किया। चंदनवाडी के पास ही पहलगांव में शिविर होना था। मैं गुजरात में राजकोट में शिविर ले रहा था, वहां शिविर समापन के बाद मुंबई से दिल्ली होते हुए श्रीनगर पहुंचा। वहां एयरपोर्ट पर कोई भी लेने नहीं आया। अब मुझे यह समझ नहीं आया कि मैं सीधे पहलगांव जाऊं या जहां स्वामी जी श्रीनगर में रहते हैं वहां जाऊं?

रविवार, 20 दिसंबर 2015

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(अध्‍याय--52)

चंदनगढ़ में लोग मरते नहीं, मारे जाते है—(अध्‍याय—बावनवां)

राजस्थान में एक जगह है, चंदनगढ़। वहां के विद्यालय के एक मास्टर साहब ने पुणे आकर मेरे से ध्यान शिविर की तारीख ली, मैंने उन्हें तारीख दे दी। नियत दिन जब ध्यान साधना शिविर प्रारंभ होना था, मैं दोपहर एक बजे चंदनगढ़ रेल से पहुंच गया। वहां स्टेशन तो खाली पड़ा था, गाड़ी जा चुकी थी, बियाबान सन्नाटा। दूर—दूर तक कोई आदमजात तक नजर न आए, सुनसान जगह, स्टेशन पर कोई आदमी भी नहीं, कोई लेने भी नहीं आया। मैं स्टेशन मास्टर के कमरे में गया तो वहां भी कोई भी नहीं, खाली पड़े आफिस में पूरी गति से पंखा चल रहा था, और उसके नीचे पडे रजिस्टर के पन्ने खड़—खड़ करते आवाज कर रहे थे।
बाहर आकर देखा तो दूर तक सुनसान आदमी तो दूर कोई कुत्ता तक भी दिखाई नहीं दे रहा था।

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(अध्‍याय--51)

बस में सफर.......या अंतिम सफर—(अध्‍याय--इक्‍यावनवां)

क बार मैं हरियाणा में रोहतक में शिविर पूरा कर बस से पानीपत जा रहा था। दोपहर का समय रहा होगा। टूटी—फूटी सड़क पर हिचकोले खाती बस चली जा रही थी। कोई नींद निकाल रहा था, कोई उबासिया तान रहा था, कोई बस से बाहर देख रहा था.......कोई कुछ, कोई कुछ। मैं सब नजारा देखता यात्रा का आनंद ले रहा था। हमारे देश में बसों में यात्रा करना अपने आपमें एक अनूठा अनुभव होता है। सच कहूं कोई चाहे तो सिर्फ बस यात्राओं पर ऐसी रोचक किताब लिख सकता है कि पढ़ने वाले हंस—हंस कर लोटपोट हो जाएं।
क्या नहीं होता है चलती बस में......एक बार मुझे याद आता है, एक भीड़ भरी बस में राजस्थान की यह बात है......

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(अध्‍याय--50)

नहीं चमत्‍कार नहीं......पर है तो....(पचासवां)

ओशो का नजरिया इतना मौलिक और अनूठा होता है कि किसी भी विषय पर जब वे अपनी दृष्टि डालते हैं तो हम चकित रह जाते हैं कि अरे वाह, इस बात को इस तरह से भी देखा जा सकता है। प्रत्येक विषय की तह तक जाकर इतनी विपरीत दिशाओं से सत्य को समझाते कि उस विषय का कोई भी बिंदु अनदेखा नहीं रह जाता।

एक बार जब किसी ने पूछा कि कैसे ओशो एक कार एक्सीडेंट में बाल—बाल बच गए और ठीक प्रवचन देने आने के पूर्व लाओत्सु कक्ष की छत गिरने से भी वे बच गए। प्रश्नकर्ता ने कहा कि कैसे चमत्कार हुए।

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(अध्‍याय--49)

तिहाड़ जेल, कैदी और करामात—(अध्‍याय—उन्‍नचासवां)

दिल्ली की तिहाड जेल, जहां हर तरह के खतरनाक से खतरनाक अपराधी बसते हैं। एक बार ऐसा हुआ कि वहां पर टाडा के अंतर्गत गिरफ्तार कैदियों को ध्यान करवाने का अवसर आ गया। उस समय वहां किरण बेदी जी जेलर थीं। मैं समय पर पहुंचा। पहुंचने पर अच्छा स्वागत हुआ।
एक बडे से कक्ष में सारे कैदियों को बैठाया गया था। लगभग 15०० कैदी रहे होंगे। मैं बोलूं इसके पूर्व उन्हें बताया गया कि आज स्वामी जी आए हैं और आप लोगों को ध्यान करवाएंगे।

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(अध्‍याय--48)

वेशभूषा ही नहीं, सब कुछ बदल गया—(अध्‍याय—अड़तालीसवां)

ज कितने ही साधु—संत झेन की बात करते हैं, मनोविज्ञान की बात करते हैं, चेतन—अचेतन मन की बात करते हैं, सामान्यतया ये सब बातें वे ओशो की पुस्तकों से ही लेते हैं। लेकिन यह भी सच है कि इन लोगों में से कितने ही हिम्मत दिखाते हैं, साहस का परिचय देते हैं और ओशो के कारवां में शामिल हो जाते हैं।

ऐसा ही हुआ एक जैन साधु के बारे में वे ओशो की पुस्तकें पढ़ते थे। उन्हें ओशो से मिलना था। मन में प्यास उठ गई ओशो के दर्शन की।

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(अध्‍याय--47)

मोरारी बापू ऐ प्‍यारे इंसान—(अध्‍याय—सैतालिसवां)

एकबार हम कुछ मित्र मोरारी बापू से मिलने गए। मैंने उनसे पूछा, ' आप रामायण की कथा करते हैं, मुझे एक प्रश्न पूछना है।वे मुस्कराकर बोले, ' स्वामी जी हमारे पूर्वज कथा सुनाते आते रहे हैं, हम भी सुना रहे हैं, हम तो अपने वाकचातुर्य से लोगों को खुश कर रहे हैं, लोगों का प्रेम हमें मिल रहा है, राम की कथा सुनाकर लोगों को सात्वनाभर देते हैं, अब प्रश्नों से क्या लेना—देना, 'इस तरह से उन्होंने बात को टाल दिया। पर हां, वे एक बहुत ही प्यारे, भावुक इंसान हैं।

उनसे बात करते 'आपुई गई हिराय' श्रृंखला में ओशो द्वारा कही गई बात याद हो आई
'अच्छी बात है यह कि तुम समझते हो कि यह वाकचातुर्य ही है, कहीं कोई सत्य नहीं है इसमें; केवल शब्द हैं, कहीं कोई निःशब्द का संगीत नहीं है।

बुधवार, 16 दिसंबर 2015

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(अध्याय--46)

साहस कहां—(अध्‍याय—छियालीसवां)

ओशो भर में यात्राओं के दौरान पता नहीं कितने संतों—महंतों से मिलना हुआ है। ऐसे कितने ही साधुओं से मिलना हुआ जिनके पूरी दुनिया में नाम हैं। लाखों उनके शिष्य हैं। लेकिन एक बात सभी में देखने में आई कि अधिकांशत: ये सभी कायर ही हैं। कहते हैं ना कि नाम बडे और दर्शन खोटे। एक बार ओशो के साथ रह लेने के बाद, अभय की स्थिति को इतने करीब से महसूस कर लेने के बाद, कायर लोगों को पहचानने में देर नहीं लगती।

मैं एक बार बंबई से दिल्ली जा रहा था और एयरपोर्ट पर आसाराम बापू से भेंट हुई। वे अहमदाबाद जा रहे थे, बातचीत हुई। मैंने कहा, 'आसाराम जी आपके बहुत से शिष्य हैं, ओशो के बहुत से शिष्य हैं, और भी संतों के बहुत सारे शिष्य हैं,

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(अध्याय--45)

ओशो का नाम, चिंगारी की तरह—(अध्‍याय—पैतालीसवां)

दिल्ली में बिरला मंदिर के पास आर्य समाज का बहुत बड़ा मंच है। वहां के एक प्रमुख स्वामी जो अपनी उम्र 113 की बताते थे, मैं उनसे मिलने के लिए मेरे एक मित्र मिस्टर केला के साथ वहां गया। मैंने भगवा वस्त्र व ओशो की माला पहनी हुई थी। जैसे ही मैंने उन्हें प्रणाम किया उन्होंने मुझ से पूछा, 'कौन से अखाड़े से आए हो, ओशो के शिष्य हो, अरे यार उसने कितनी बेकार किताब लिखी है, कितनी बुरी है, तुम उसके शिष्य हो?' जब वे बोल चुके तो मैंने बहुत ही विनम्रता से कहा, 'आप मेरे से उम्र में बड़े हैं, कृपाकर सही उत्तर देना,
क्या आपने वह किताब पढी है— 'संभोग से समाधि की ओर' उन्होंने कहा, 'मुझे याद नहीं आता लेकिन कोई मुझे यह पुस्तक दे गया था लेकिन मैंने पढी नहीं है।मैंने कहा, 'यदि आपने यह पुस्तक पढ़ी होती तो जो आपने अपशब्द कहे वह आप कभी ना कहते।

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(अध्‍याय--44)

असली प्रश्‍नों को तो छूते भी नहीं—(अध्‍याय—चव्‍वालीस)

शो से पूरी दुनिया से आने वाले सब तरह के लोगों ने हर तरह के प्रश्न पूछे और ओशो ने हर प्रश्न का जवाब दिया। अनेक बार जब हम प्रश्न सुनते हैं तो लगता है कि अब ओशो क्या जवाब देंगे? लेकिन हर प्रश्न का सटीक, तार्किक व गहन दृष्टि से युक्त जवाब होता।
ओशो के अलावा मैंने अपने जीवन में एक भी साधु—संन्यासी या गुरु ऐसा नहीं देखा जो हर प्रश्न का जवाब दे सके। अधिकांशतया तो यही होता कि ये लोग क्रोधित हो जाते हैं। ऐसा ही एक वाकया हुआ चिन्मयानंद मिशन के स्वामी चिन्मयानंद जी के साथ।

सोमवार, 14 दिसंबर 2015

स्‍वर्णिम क्षणों की सुमधुर यादें--(अध्‍याय--43)

सत्‍य साई बाबा से मुलाकात—(अध्‍याय—तेरालिसवां)

लोगों का मूल्यांकन करना बडी आसान बात है। कोई भी बात को देख कर उस व्यक्ति के बारे में कोई विचारधारा बना लेना, धारणा बना लेना बड़ा आसान होता है। ओशो ने कहा भी है कि कभी किसी का मूल्यांकन मत करो। पुट्टपर्ती के श्री सत्य साईं बाबा के बारे में अनेकानेक बातें सुनने में आती रहती थीं।
एक बार सत्यसाईं बाबा का हमारे आश्रम के ठीक पीछे स्थित जामनगर हाउस में उनका कार्यक्रम था। मैं भी वहां चला गया। मैं भगवा कपड़ों और माला पहने वहां बैठा था। सत्य साईं बाबा वहां बैठे हुए लोगों में से किसी को व्यक्तिगत मिलने के लिए इशारे से बुलाते थे।