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शनिवार, 18 जुलाई 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--1) प्रवचन--16

अचेतन पाप के पार—(प्रवचन—सोहलवां)

प्रश्‍नसार:

1—दमन के बिना अपने स्‍त्रोत पर लौटने का क्‍या उपाय है?
2—पश्‍चिम के मनोविश्‍लेषक मन के निर्ग्रंथन के उपाय में सफल क्‍यों नहीं हो पाते?
3—क्‍या यह सच नहीं है कि कोई विधि तब तक शक्‍तिशाली नहीं होती जब तक व्‍यक्‍ति को दीक्षित न किया जाए?
4—अगर तादात्‍म्य एकमात्र पाप है तो अनेक विधियां ऐसा क्‍यों कहती है कि किसी चीज के साथ एकात्‍म हो जाओ?

शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

तंत्र--सूत्र-(भाग--1) प्रवचन--15

शुद्ध चैतन्‍य में प्रवेश की विधियां—(प्रवचन—पंद्रहवां)

सूत्र:

22—अपने अवधान को ऐसी जगह रखो,
जहां तुम अतीत की किसी घटना को देख रहे हो
और अपने शरीर को भी।
रूप के वर्तमान लक्षण खो जाएंगे,
और तुम रूपांतरित हो जाओगे।
      23—अपने सामने किसी विषय को अनुभव करो।
            इस एक को छोड़कर अन्‍य सभी विषयों की
            अनुपस्‍थिति को अनुभव करो।
            फिर विषय—भाव और अनुपस्‍थिति—भाव को भी
            छोड़कर आत्‍मोपलब्‍ध होओ।
      24—जब किसी व्‍यक्‍ति के पक्ष या विपक्ष में कोई भाव
            उठे तो उसे उस व्‍यक्‍ति पर मत आरोपित करो,
            बल्‍कि केंद्रित रहो।

बुधवार, 15 जुलाई 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--1) प्रवचन--14

प्रेम को ध्‍यान बनाओ, ध्‍यान को प्रेम—(प्रवचन—चौहदवां)

      प्रश्नसार:

      1—समाधि को केंद्रित होना क्‍यों कहते है?
      2—ध्‍यान के बिना कैसे अकेला प्रेम पर्याप्‍त है?
      3—मनुष्‍य संवेदनहीन क्‍यों है?

पहला प्रश्न :

यदि बुद्धत्‍व और समाधि का अर्थ समग्र चैतन्‍य, जागतिक चैतन्‍य, सर्वव्‍यापी चैतन्‍य है, तो आश्‍चर्य होता है कि इस जागतिक चैतन्‍य की अवस्‍था को केंद्रित होना क्‍यों कहा जाता है? क्‍योंकि केंद्रित होना एकाग्र होने जैसा लगता है। इस जागतिक चैतन्‍य या समाधि को केंद्रित होना क्‍यों कहते है?

मंगलवार, 14 जुलाई 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--1)--प्रवचन--13

आत्‍यंतिक केंद्र में प्रवेश—(प्रवचन—तेहरवां)

सूत्र:

18—किसी विषय को प्रेमपूर्वक देखो;
दूसरे विषय पर मत जाओ।
यहीं विष्‍यय के मध्‍य में—आंनद।
      19—पावों या हाथों का सहारा दिया बिना सिर्फ नितंबों
            पर बैठो। अचानक केंद्रित हो जाओगे।
      20—किसी चलते वाहन में लयबद्ध झूलने के द्वारा,
            अनुभव को प्राप्‍त हो।
          या किसी अचल वहन में अपने को मंद से मंदतर हो
            अदृश्‍य वर्तुलों में झूलने देने से भी।
      21—अपने अमृत—भरे शरीर के किसी अंग को सूई से
            भेदो और भद्रता के साथ उस भेदन में प्रवेश करो,
            और आंतरिक शुद्धि को उपलब्‍ध होओ।

सोमवार, 13 जुलाई 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--1) प्रवचन--12

उदगम की खोज में—(प्रवचन—बाहरवां)

प्रश्‍नसार:

1—कृपया बताएं कि नाभि—केंद्र, तीसरी आँख और मेरूदंड के काम क्‍या है?
2—बुद्ध की तपश्‍चर्या संसार के विपरित मालूम होती है; यह मध्‍य मार्ग नहीं मालूम होती।
3—ह्रदय केंद्र को विकसित करने के व्‍यावहारिक उपायक्‍या है?
4—क्‍या प्रेम में भी मध्‍य मार्ग पकड़ना चाहिए या प्रेम और घृणा की ध्रुवीय अति को छूना चाहिए?


कई प्रश्न हैं।

रविवार, 12 जुलाई 2015

तंत्र--सूत्र--(भाग--1) प्रवचन--11

त्रिनेत्र, नाभि—केंद्र और मध्‍य–मार्ग—(प्रवचन—ग्‍याहरवां)


      सूत्र:

15—सिर के सात द्वारों को अपने हाथों से बंद करने
पर आंखों के बीच का स्‍थान सर्वग्राही हो जाता है।

16—हे भगवती, जब इंद्रियां ह्रदय में विलीन हों,
कमल के केंद्र पर पहुंचो।

17—मन को भूलकर मध्‍य में रहो—जब तक।


ऐसा है मानो बिना केंद्र का वर्तुल। उसका जीवन सतही है, उसका जीवन बस परिधि पर है। तुम बाहर—बाहर रहते हो, कभी भीतर नहीं रहते। तुम भीतर नहीं रह सकते, जब तक कि केंद्र उपलब्ध न हो। तुम भीतर नहीं रह सकते हो। सच तो यह है कि केंद्र के बिना अंतस भी नहीं होता है।

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

तंत्र--सूत्र (भाग--1) प्रवचन--10

केंद्रित, संतुलित और आप्‍तकाम होओ—(प्रवचन—दसवां)

      प्रश्‍नसार:

1—क्‍या आत्‍मोपलब्‍धि बुनियादी आवश्‍यकता है?

2—मनन, एकाग्रता और ध्‍यान पर प्रकाश डालें।

3—नाभि—केंद्रके विकास के लिए जो प्रशिक्षण है
   वह ह्रदय और मस्‍तिक के केंद्रों के प्रशिक्षण
   से भिन्‍न कैसे है?

4—क्‍या सभी बुद्धपुरूष नाभि—केंद्रित है?

बुधवार, 24 सितंबर 2014

तंत्र--सूत्र (भाग--1) प्रवचन--09

केंद्रीभूत होने की कुछ विधियां—प्रवचन—नौवां

सूत्र:

13—या कल्‍पना करो कि मोर की पूंछ के पंचरंगें वर्तुल
निस्‍सीम अंतरिक्ष में तुम्‍हारी पाँच इंद्रियां है।
अब उनके सौंदर्य को भीतर ही धुलने दो।
उसी प्रकार शून्‍य में या दीवार पर किसी बिंदु के साथ
कल्‍पना करो, जब तक कि वह बिंदु विलीन न हो जाए।

14—अपने पूरे अवधान को अपने मेरूदंड के मध्‍य में
कमल तुतु सी कोमल स्‍नायू में स्‍थित करो।
और उसमें रूपांतरित हो जाओ।

मनुष्‍य अपने केंद्र के साथ जन्म लेता है, लेकिन उसे उसकी जानकारी जरा भी नहीं रहती। मनुष्य अपने केंद्र को जाने बिना रह सकता है, लेकिन केंद्र के बिना वह हो नहीं सकता। और यह केंद्र मनुष्य और अस्तित्व के बीच की कड़ी है। यह मूल है, आधार है।

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

तंत्र--सूत्र (भाग--1) प्रवचन--08

तांत्रिक शुद्धि का आधार अभेद है—प्रवचन—आठवां

      प्रश्‍नसार:

1—शुद्धि से तंत्र का अभिप्राय क्‍या है?

एक बात अक्सर पूछी जाती है :

तांत्रिक शुद्धि का तंत्र का क्या मतलब है जब वह कहता है की प्रगति के लिए मन का शुद्धिकरण, की शुद्धि बुनियादी शर्त है?


 सामान्‍यत: शुद्धि का जो अर्थ लिया जाता है वही तंत्र का अर्थ नहीं है। सामान्यत: हम हर चीज को शुभ और अशुभ में, भले और बुरे में बांटते हैं। यह विभाजन किसी भी कारण से हो सकता है, यह स्वास्थ्य—विज्ञान की दृष्टि से भी हो सकता है, नैतिक दृष्टि से भी हो सकता है, या किसी भी तरह हो सकता है। लेकिन हम जीवन को शुभ और अशुभ में बांट देते हैं। और जब भी हम शुद्धि का नाम लेते हैं तो उससे शुभ का ही मतलब निकालते हैं। हम चाहते हैं कि अच्छे गुणों को तो रहना चाहिए और बुरे गुणों को जाना चाहिए।

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

तंत्र--सूत्र (भाग--1) प्रवचन--07

प्रेम करते हुए प्रेम ही हो जाओ—प्रवचन—सातवां

      सूत्र:

10—   प्रिय देवी, प्रेम किए जाने के क्षण में प्रेम में ऐसे
प्रवेश करो जैसे कि वह नित्‍य जीवन हो।
     
11—   जब चींटी के रेंगने की अनुभूति हो तो इंद्रियों के
            सब द्वार बंद कर दो। तब!
     
12—   जब किसी बिस्‍तर या आसन पर हो तो अपने को
            वजनशून्‍य हो जाने दो—मन के पार।

मनुष्‍य का अपना एक केंद्र है, लेकिन वह उस केंद्र से बाहर—बाहर, दूर—दूर जीता है। और इसी से आंतरिक तनाव, सतत अशांति और संताप पैदा होते हैं। तुम वहा नहीं होते हो जहां होना चाहिए; तुम अपने सम्यकत्व में, सही संतुलन में नहीं होते, तुम संतुलन से दूर जा पड़ते हो। और यह संतुलन से, केंद्र से दूर जा पड़ना सब मानसिक तनावों का आधार है, कारण है।

बुधवार, 17 सितंबर 2014

तंत्र--सूत्र (भाग--1) प्रवचन--06

स्‍वप्‍न का अतिक्रमण कैसे हो—प्रवचन—छठवां

प्रश्‍नसार:
1—स्‍वप्‍न देखते हुए बोधपूर्ण कैसे हुआ जाए?

2—प्रयत्‍न क्‍यों करें अगर नाटक के पात्र भर है?


एक मित्र ने पूछा है :

क्या समझाने की कृप्‍या करेंगे की स्वप्न देखते हुए बोधयूर्ण होने के अन्य उपाय क्या हैं?

यह प्रश्न उन सबके लिए महत्वपूर्ण है जो ध्यान में उत्सुक हैं। क्योंकि सचाई यह है कि स्‍वप्‍न देखने की प्रक्रिया का अतिक्रमण ही ध्यान है।
तुम सतत सपना देखते हो। रात में ही नहीं, पूरा दिन भी सपना देखते रहते हो। यह समझने की पहली बात है कि जागते हुए भी तुम सपना देखते हो। दिन के किसी समय आंखें  बंद करो, शरीर को थोड़ा शिथिल करो, और पाओगे कि सपना चल रहा है।

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

तंत्र--सूत्र (भाग-1) प्रवचन--05

अवधान, शिव—नेत्र और आत्‍मोपलब्‍धि–प्रवचन—पांचवां

सूत्र:

5—    भृकुटियों के बीच अवधान को स्‍थिर कर विचार
को मन के सामने करो। फिर सहस्‍त्रार तक रूप
को श्‍वास—तत्‍व से, प्राण से भरने दो।
वहां वह प्रकाश की तरह बरसेगा।
     
6—    सांसारिक कामों में लगे हुए,
अवधान को दो श्‍वासों के बची टिकाओ।
इस अभ्‍यास से थोड़े ही दिनों में नया जन्‍म होगा।
     
      7—    ललाट के मध्‍य में सूक्ष्‍म श्‍वास, प्राण को टिकाओ।/
जब वह सोन के क्षण में ह्रदय तक पहुंचेगा तब
स्‍वप्‍न और स्‍वयं मृत्‍यु पर अधिकार हो जाएगा।
     
8—    आत्‍यंतिक भक्‍तिपूर्वक श्‍वास के दो संधि—स्‍थलों
पर केंद्रित होकर ज्ञाता को जान लो।

सोमवार, 15 सितंबर 2014

तंत्र--सूत्र (भाग--1) प्रवचन--04

मन के धोखों से सावधान—(प्रवचन—चौथा)

     प्रश्‍नसार:

1—ऐसी आसान विधियों से क्‍या ज्ञान—उपलब्‍धि संभव है?

2—काम करते हुए क्‍या श्‍वास—बोध का प्रयोग किया जा सकता है?


प्रश्न :

यह कैसे संभव है कि कोई व्यक्ति बस श्वास— क्रिया के एक विशेष बिंदु पर होश साधर ज्ञान को उयलब्ध जाए? श्वास—प्रश्वास के ऐसे छोटे क्षणिक अंतराल के प्रति सजग होकर अचेतन से मुक्त होना कैसे संभव है?

 यह प्रश्न अर्थपूर्ण है, और यह प्रश्न अनेक के मन में उठा होगा। कई चीजें यहां समझने की हैं। समझा जाता है कि अध्यात्म एक कठिन उपलब्धि है। यह दोनों में कुछ नहीं है, न यह कठिन है और न उपलब्धि ही। तुम जो भी हो तुम आध्यात्मिक ही हो। तुम्हारे अस्तित्व में कुछ जोड़ा जाने को नहीं है; न उससे कुछ हटाया जाने को है।

रविवार, 14 सितंबर 2014

तंत्र--सूत्र (भाग--1) प्रवचन--03

श्‍वास: शरीर और आत्‍मा के बीच सेतु—(प्रवचन—तीसरा)


सूत्र:

शिव कहते है:

1—हे देवी, यह अनुभव दो श्‍वासों के बीच घटित हो
सकता है। श्‍वास के भीतर आने के पश्‍चात और बहार
लौटन के ठीक पूर्व—श्रेयस है, कल्‍याण है।

2—जब श्‍वास नींचे से ऊपर की और मुड़ती है, और फिर
जब श्‍वास ऊपर से नीचे की और मुड़ती है, इन दो मोड़ों के
द्वारा उपलब्‍ध हो।

3—या जब कभी  अंत:श्‍वास और बहिर्श्‍वास एक—दूसरे
में विलीन होती है। उस क्षण ऊर्जारहित, ऊर्जापूरित
केंद्र को स्‍पर्श करो।

शनिवार, 13 सितंबर 2014

तंत्र--सूत्र (भाग--1) प्रवचन--02

योग और तंत्र; समर्पण और विधि—प्रवचन—दूसरा

प्रश्‍न सार:

1—योग और तंत्र में क्‍या फर्क है?

2—समर्पण की विधि क्‍या है?

3—कैसे कोई विधि रास आती है?

कई प्रश्न हैं।

पहला प्रश्न:

परंपरागत योग और तंत्र में भेद क्या है? क्या वे एक ही चीज हैं?

 तंत्र और योग बुनियादी रूप से भिन्न हैं। यद्यपि दोनों एक ही लक्ष्य पर ले जाते हैं, तो भी उनके रास्ते भिन्न हैं; भिन्न ही नहीं विपरीत हैं।
इसे ठीक से समझ लेना है। योग की प्रक्रिया भी उपायमूलक है। योग भी विधि ही है। योग कोई मीमांसा नहीं है। तंत्र की तरह ही योग भी क्रिया, उपाय, विधि. पर निर्भर है। तंत्र की तरह ही योग में भी कुछ करने से, क्रिया से होना या अस्तित्व उपलब्ध होता है। लेकिन दोनों के ढंग, दोनों की प्रक्रियाएं भिन्न—भिन्न हैं।

तंत्र--सूत्र (भाग--1)--प्रवचन--01

तंत्र—सूत्र (भाग—01)
ओशो

तंत्र विज्ञान है, और वह परमाणु—विज्ञान से भी ज्‍यादा गहन विज्ञान है। परमाणु विज्ञान पदार्थ से संबंधित है; तंत्र तुमसे संबंधित है। और तुम सदा ही किसी भी परमाणु—ऊर्जा से अधिक खतरनाक हो। तंत्र तुमसे, जीवित कोशिका से, स्‍वयं जीवन चेतना से संबंधित है। यही वजह है कि काम या सेक्‍स में तंत्र की इतनी गहरी रूचि है। जो व्‍यक्‍ति जीवन और चेतना में रूचि रखता है। वह अपने काम में दिलचस्‍पी लेगा।
क्‍योंकि काम जीवन का स्‍त्रोत है, प्रेम का स्‍त्रोत है। चेतना का स्‍त्रोत है। चेतना के जगत में जो भी घट रहा है। उसका आधार काम है। और अगर कोई साधक काम में उत्‍सुक नहीं है। वह दार्शनिक हो सकता है वह साधक नहीं है। और दर्शनशास्‍त्र कामोबेश कचरा है। जो व्‍यर्थ की चीजों के संबंध में ऊहापोह करता है।
तंत्र की उत्‍सुकता दर्शन में नहीं है। उसकी उत्‍सुकता वास्‍तविक और अस्‍तित्‍वगत जीवन में है। तंत्र कभी नहीं पूछता है कि क्‍या ईश्‍वर है, क्‍या मोक्ष है। क्‍या स्‍वर्ग—नरक है। तंत्र जीवन के संबंध में बुनियादी प्रश्‍न पूछता है। यही कारण है कि काम या सेक्‍स और प्रेम में उसकी इतनी रूचि है। काम और प्रेम बुनियादी है।

ओशो