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मंगलवार, 22 मार्च 2016

भावना के भोज पत्र--(पत्र--पाथय--50)

पत्रपाथय50

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय

प्रिय मां,
कल रात्रि कोई महायात्रा पर निकल गया है। उसके द्वार पर आज रुदिन है।
सुबह—सुबह घूमकर लौटा हूं। देखता हूं कि सड़क के किनारे कुछ लोग जमा है। एक भिखारी शरीर से मुक्त हो गया है।
एक बचपन की स्मृति मन पर दुहर जाती है। पहली बार मरघट जाना हुआ था। चिता जल गई थी और लोग छोटे—छोटे झुंड बनाकर बातें कर रहे थे। गांव के एक कवि ने कहा था:, ‘‘मैं मृत्यु से नहीं डरता हूं। मृत्यु तो मित्र है।’’

भावना के भोज पत्र--(पत्र--पाथय--49)

पत्रपाथय49

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय

मां,
नयी सुबह। नया सूरज। नई धूप। सोकर उठा हूं। सब नया—नया है। जगत् में कुछ भी पुराना नहीं है।
कई सौ वर्ष पहले यूनान में किसी ने कहा था, ‘‘एक ही नदी में दो बार उतरना असंभव है।’’
सब नया है पर मनुष्य पुराना पड़ जाता है। मनुष्य नये में जीता ही नहीं इसलिए पुराना पड़ जाता है। मनुष्य जीता है स्मृति में, अतीत में, मृत में। यह जीना ही है, जीवन नहीं है। पर अर्ध—मृत्यु है।
कल एक जगह यही कहा हूं। मनुष्य अपने में मृत है। जीवन योग से मिलता है। योग चिर—नवीन में जगा देता है। योग चिर—वर्तमान में जगा देता है।
मानव—चित्त स्मृति के भार से मुक्त हो तो ‘‘जो है’‘ वह प्रगट हो जाता है। स्मृति भूल का संकलन है। इससे जीवन को नहीं पाया जा सकता है। वह ज्ञान में भटकता है। उससे जो अज्ञान है, उसके द्वार नहीं खुलते हें।
ज्ञान को जाने दो ताकि अज्ञान प्रगट हो सके। मूल को जाने दो ताकि जीवित प्रगट हो सके—योग का सार—सूत्र यही है।

 28 मार्च 1963
रजनीश के प्रणाम

भावना के भोज पत्र--(पत्र--पाथय--48)

पत्रपाथय48

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय
25 मार्च 1962

प्रिय मां,
दोपहर तप गई है। पलाश वृक्षों पर फूल अंगारों की तरह चमक रहे हैं।
एक सुनसान रास्ते से गुजरता हूं। बांसों के घने झुरमुट हैं और उनकी छाया भली लगती है।
कोई अपरिचित चिड़िया गीत गाती है। उसके निमंत्रण को मान वहीं रुक जाता हूं। एक व्यक्ति साथ हैं। पूछ रहे हैं, ‘‘क्रोध को कैसे जीते, काम को कैसे जीते?'' यह बात तो अब रोज—रोज पूछी जाती है। इसके पूछने में ही भूल है। यही उनसे कहता हूं। समस्या जीतने की है ही नहीं। समस्या मात्र जानने की है। हम न क्रोध को जानते हैं और न काम को जानते हैं।

भावना के भोज पत्र--(पत्र--पाथय--47)

पत्र—पाथय—47  

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय

प्रिय मां,
सांझ से ही आधी पानी है। हवाओं ने थपेड़ों से बड़े—बड़े वृक्षों को हिला डाला है। बिजली बद हो गई और नगर में अंधेरा है।
घर में एक दीपक जलाया गया है।
उसकी लौ ऊपर की और उठ रही है दीया भूमि का भाग है पर लौ न मालूम किसे पाने निरंतर ऊपर की और भागती रहती है।
लौ की भांति मनुष्य की चेतना है।

भावना के भोज पत्र--(पत्र--पाथय--46)

पत्र—पाथय—46

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय
प्रिय मां,
एक कागज की नाव पानी में डूब गई है।
कल कुछ रेत के घरोंदे बच्चों ने बनाए थे वे भी मिट गये हैं।
रोज नावें डूबती हैं और रोज घरोंदे टूट जाते हैं।
एक महिला आईं थीं। सपने उनके पूरे नहीं हुए हैं। जीवन से मन उनका उचाट है। आत्म हत्या के विचार ने उन्हें पकड़ लिया है। आंखें गड्डों में चली गई हैं और सब व्यर्थ मालूम होता है।
मैंने कहा, ‘‘सपने किसके पूरे होते हैं। सब सपने अंतत: दुःख ही देते हैं; कारण, कागज की नावें कहीं भी तो कितनी दूर बह सकती हैं? इसमें भूल सपनों की नहीं है।

सोमवार, 14 मार्च 2016

भावना के भोज पत्र--(पत्र--पाथय--45)

पत्रपाथय45

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय

प्रिय मां,
कल एक जगह बोला हूं।
कहा, मैं तुम्हें असंतुष्ट करना चाहता हूं। एक दिव्य—व्यास, एक अलौकिक—अतृप्ति सबमें पैदा हो यही मेरी कामना है। मनुष्य जो है उसमें तृप्त रह जाना मृत्यु है। मनुष्य विकास का अंत नहीं है। वह भी एक सीढ़ी है। एक विशाल—सोपान है। जो उसमें प्रगट है वह अप्रगट की तुलना में कुछ भी नहीं है।

भावना के भोज पत्र--(पत्र--पाथय--44)

पत्रपाथय(44)

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय

प्रिय मां,
सुबह एक पत्र मिला है। किसी ने उसमें पूछा है कि जीवन दुःख में घिरा है फिर भी अपि आनंद की बातें कैसे करते हैं? जो है उसे देखें तो आनंद की बातें कल्पना प्रतीत होती है।

भावना के भोज पत्र--(पत्र--पाथय--43)

पत्रपाथय43

 निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय

प्रिय मां,

सुबह आंखें खोली। अंधेरा था और खिड़की के बाहर अभी तारे थे। देर तक चुपचाप पड़ा रहा। सब शांत था। नींद टूट गई थी पर मन अभी नहीं जागा था। फिर आहिस्ता—आहिस्ता मन जागने लगा। विचार तेरते हुए आने लगे। मैं देखता रहा। विचार बाहर से आते हैं। स्व जहां है—चेतना जहां है—वहां विचार पैदा नहीं होते हैं। इसे स्पष्ट देखा जा सकता है।

भावना के भोज पत्र--(पत्र--पाथय--42)

पत्रपाथय42

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय

प्रिय मां,
दोपहर की शांति। उजली धूप और पौधे सोये—सोये से। एक जामुन की छाया तले दूब पर आ बैठा हूं। रह—रहकर पत्ते ऊपर गिर रहे हैं। अंतिम पुराने पत्ते मालूम होते हैं। सारे वृक्षों पर नयी पत्तियां आ गई हैं। और नयी पत्तियों के साथ न मालूम कितनी नई चिड़ियों और पक्षियों का आगमन हुआ है। उनके गीतों का जैसे कोई अंत ही नहीं है।

भावना के भोज पत्र--(पत्र--पाथय--41)

पत्रपाथय41

 निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय

 प्रिय पारख जी,
प्रणाम! कृपा—पत्र मिला है। उसकी लम्बाई से बहुत प्रसन्नता हुई है। मैं जानकर ही पुस्तिका नहीं भेजा था और जो कारण आपने अनुमान किया वह शत—प्रतिशत ठीक है! जाग्रत जो है उन्हें क्या भेजूं यह सोचकर ही नहीं भेजा हूं!

भावना के भोज पत्र--(पत्र--पाथय--40)

पथ पथय40

निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय

 प्रिय मां,
टिक् टिक् टिक्.......घड़ी फिर से चलनी शुरु हो, गई है। वह अपने में तो चलती ही थी; मेरे लिए बन्द हो गई थी या ठीक ही कि कहूं कि मैं ही यहां बन्द हो गया था जहां कि उसका चलना है!
एक दूसरे समय में चला गया था। आंखें बंद किये बैठा था कि स्वप्‍न—चित्र चलने लगे थे।

भावना के भोज पत्र--(पत्र--पाथय--39)

पत्र पाथय39

 निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
                                                जबलपुर (म. प्र.)
आर्चाय रजनीश
दर्शन विभाग
महाकोशल महाविद्यालय

 रात्रि : 24. 2. 62
प्रिय मां,
चांद ऊपर उठ रहा है। दरख्तों को पार करता उसका मद्धिम प्रकाश रास्ते पर पड़ने लगा है और आम्र—फूलों की भीनी गंध से हवायें लुवासित हो रही हैं।