पत्र—पाथय—50
निवास:
115, योगेश भवन, नेपियर टाउन
जबलपुर
(म. प्र.)
आर्चाय
रजनीश
दर्शन
विभाग
महाकोशल
महाविद्यालय
प्रिय मां,
कल
रात्रि कोई
महायात्रा पर
निकल गया है।
उसके द्वार पर
आज रुदिन है।
सुबह—सुबह
घूमकर लौटा
हूं। देखता
हूं कि सड़क के
किनारे कुछ
लोग जमा है।
एक भिखारी
शरीर से मुक्त
हो गया है।
एक
बचपन की
स्मृति मन पर
दुहर जाती है।
पहली बार मरघट
जाना हुआ था।
चिता जल गई थी
और लोग छोटे—छोटे
झुंड बनाकर
बातें कर रहे
थे। गांव के
एक कवि ने कहा
था:, ‘‘मैं
मृत्यु से
नहीं डरता हूं।
मृत्यु तो
मित्र है।’’