प्रेम—पंथ ऐसो कठिन-(प्रश्नोत्तर)-ओशो
दिनांक 10 अप्रेल सन् 1979,
ओशो आश्रम, कोरेगांव पार्क पूना।
प्रश्न-सार
1—परमात्मा मुझे कहीं भी दिखाई नहीं पड़ता है। मैं
क्या करूं?
2--मैं संन्यास के लिए तैयार हूं। लेकिन यह कैसे
जानूं कि परमात्मा ने मुझे पुकारा ही है?
यह मेरा भ्रम भी तो हो सकता है!
3—कल आपने प्रवचन में नसरुद्दीन की कहानी
कही--कड़ाही के बच्चे होने वाली।
मैंने संजय को तपेली दी थी। तपेली मर गई, और बाद में छोटी-मोटी तपेलियां भी मर गईं। और अब फिर दिख रहा है कि
कड़ाहियों के बच्चे हो रहे हैं।
दो वर्ष पहले आपसे प्रश्न पूछा था, काफी दुख की छाया में था, आपने सूफी कहानी का संदेश
दिया था--यह भी गुजर जाएगा। बिलकुल वैसा ही हुआ है।
आपके अमूल्य सूत्र--वर्तमान में होने का और होश
को जीवन में उतारने का प्रयत्न करता रहता हूं। प्रश्न कुछ भी नहीं है, फिर भी आपसे कुछ सुनने की प्यास जरूर है!

