प्रकृत
और सहज होना
ही परमात्मा
के निकट
होना—(प्रवचन—चौदहवां)
दिनांक
4 अक्टूबर, 1974
श्री
ओशो आश्रम,
पूना।
भगवान!
एक
लंबी और थकान भरी
यात्रा में, तीन मुसाफिर
साथ हो लिये।
उन्होंने
अपने पाथेय से
लेकर सुख-दुख,
सबकी
साझेदारी कर
ली।
कई
दिनों के बाद उन्हें
मालूम हुआ कि
अब उनके पास
सिर्फ कौर भर
रोटी और घूंट
भर पानी बचा
है और वे इस
बात के लिये
झगड़ने लगे कि
यह पूरा भोजन
किसको मिले? नहीं बात
बनी, तो
उन्होंने
रोटी और पानी
को बांटने की
कोशिश की। फिर
भी वे किसी
निष्कर्ष पर
नहीं पहुंच सके।
जब
रात उतरी तब
एक ने सो जाने
का सुझाव
दिया। तय किया
कि जागने पर
वह व्यक्ति
निर्णय करेगा
जो रात में सबसे
बढ़िया स्वप्न
देखेगा।
दूसरी
सुबह
सूर्योदय के
साथ तीनों
मुसाफिर नींद
से उठे।
पहले
ने कहा, 'यह मेरा
स्वप्न है।
मैं ऐसे
स्थानों में
ले जाया गया, जिनका वर्णन
नहीं हो सकता।
वे ऐसे अपूर्व,
अदभुत और
प्रशांत थे।
और मुझे एक
ज्ञानी पुरुष
मिला, जिसने
मुझे कहा कि
तुम भोजन के
हकदार हो, क्योंकि
तुम्हारा
व्यतीत और
भावी जीवन, योग्य और
सराहनीय है।'
दूसरे
ने कहा, 'आश्चर्य की
बात है, स्वप्न
में मैंने
अपने पूरे
अतीत और
भविष्य को देखा।
और मेरे
भविष्य में
मुझे एक
सर्वज्ञ पुरुष
मिला, जिसने
कहा कि अपने
मित्रों से
बढ़कर तुम रोटी
के हकदार हो, क्योंकि तुम
अधिक विद्वान
और धैर्यवान
हो। तुम्हारा
पोषण ठीक से
होना चाहिए, क्योंकि तुम
निश्चित
मनुष्यों के
नेता बनने वाले
हो।'
तीसरे
यात्री ने कहा, 'मेरे स्वप्न
में मैंने न
कुछ देखा, न
कुछ सुना, और
न कुछ कहा।
मैंने एक दुर्निवार
वर्तमान का
अनुभव किया, जिसने मुझे
मजबूर कर दिया
कि मैं उठूं, रोटी और
पानी की तलाश
करूं और
तत्क्षण उनका
भोग करूं। और
मैंने वही
किया।'
भगवान!
इस सूफी
प्रबोध कथा को
हमें समझाने
की करुणा
करें।