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शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

दीया तले अंधेरा--(झेन--कथा) प्रवचन--20

'मैं' की मुक्ति नहीं, 'मैं' से मुक्ति—(प्रवचन—बीसवां)
दिनांक 10 अक्टूबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।

 भगवान!

सदगुरु तोसोत्सु ने तीन रोधक (ईंततपमते) निर्मित किये। और उन्हें वे साधुओं से पार करवाते थे।
पहला रोधक: झेन का अध्ययन है। झेन के अध्ययन का उद्देश्य है, अपने ही सच्चे स्वभाव का दर्शन करना।
अब तुम्हारा सच्चा स्वभाव क्या है?
दूसरा: जब कोई अपने सच्चे स्वभाव को प्राप्त कर लेता है तब वह जन्म और मृत्यु से मुक्त हो जायेगा।
अब जब तुम प्रकाश को अपनी आंखों से छिपा लेते हो और एक लाश हो रहते हो, तब तुम अपने को कैसे मुक्त कर सकते हो?
तीसरा: यदि तुम अपने को जन्म और मृत्यु से मुक्त कर लेते हो, तो तुम्हें जानना चाहिये कि तुम कहां हो?
अब तुम्हारा शरीर चार तत्वों में अलग-अलग हो जाता है।
तुम कहां हो?

भगवान! इन झेन रोधकों को हमारे लिए स्पष्ट करने की अनुकंपा करें।

दीया तले अंधेरा--(झेन--कथा) प्रवचन--19

परिधि के विसर्जन से केंद्र में प्रवेश—(प्रवचन—उन्नीसवां)
दिनांक 9 अक्टूबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।

 भगवान!

सदगुरु जोशु उस जगह पर गए जहां एक भिक्षु ध्यान कर रहा था। उन्होंने भिक्षु से पूछा, 'जो है, सो क्या है?' 'What is, is what?'
भिक्षु ने अपनी मुट्ठी उठाई।
जोशु ने उत्तर दिया, 'जहाज वहां नहीं रह सकते जहां पानी बहुत उथला हो।' और वे चले गए।
कुछ दिनों के बाद सदगुरु जोशु फिर उस भिक्षु के पास गए, और उन्होंने वही प्रश्न पूछा। भिक्षु ने पुराने ढंग से ही उत्तर दिया।
जोशु ने कहा, 'अच्छा दिया, अच्छा लिया, अच्छा मारा, अच्छा बचाया।' 'Well given, well taken, well Killed, well saved.’और उन्होंने भिक्षु को झुककर प्रणाम किया।

भगवान! इस झेन बोध-कथा का अभिप्राय समझाने की कृपा करें।

गुरुवार, 22 जनवरी 2015

दीया तले अंधेरा--(सूफी--कथा) प्रवचन--18

समर्पित हृदय में ही सत्य का अवतरण—(प्रवचन—अठारहवां)
दिनांक 8 अक्टूबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।

 भगवान!

सूफी सत्य के खोजी माने जाते हैं--उस सत्य के जो विषयगत हकीकत ९ठइरमबजपअम तमंसपजल० का ज्ञान होता है।      
एक अज्ञानी, लालची और प्रजापीड़क राजा ने निश्चय किया कि मैं इस सत्य को भी अपने अधिकार में ला कर रहूंगा। स्पेन के मुर्सिया नामक स्थान का स्वामी था वह और नाम था उसका रोडरिक। उसने यह भी तय किया कि तरागोना के सूफी उमर-अल-अलावी को यह सत्य बताने के लिए मजबूर किया जाये।
फलतः उमर को गिरफ्तार कर राज-दरबार में हाजिर किया गया। रोडरिक ने उनसे कहा, 'मैंने निर्णय किया है कि जो सत्य आप जानते हैं उसे आप मुझे उन शब्दों में बता देंगे जिन्हें मैं समझ सकूं। और यदि ऐसा नहीं हुआ तो आपको अपनी जिंदगी से हाथ धोना पड़ेगा।'

बुधवार, 21 जनवरी 2015

दीया तले अंधेरा--(सूफी--कथा) प्रवचन--17

अतियों से बचकर मध्य में जीना प्रज्ञा है—(प्रवचन—सत्रहवां)
दिनांक 7 अक्टूबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।

भगवान !

महान सुलतान महमूद एक दिन अपनी राजधानी गजनी की सड़कों पर घूम रहे थे। उन्होंने देखा कि एक गरीब भारिक पीठ पर भारी पत्थर का बोझ लिये दम तोड़ रहा है। उसकी हालत से द्रवीभूत होकर महमूद ने शाही ढंग से हुक्म दिया,  'ओ भारिक, उस पत्थर को नीचे गिरा दे।'
तुरंत ही आज्ञा का पालन हुआ। पर पत्थर उस रास्ते पर राहगीरों की बाधा बन कर बहुत वर्षों पड़ा रहा। अंत में अनेक नागरिकों ने बादशाह से प्रार्थना की कि वे उस पत्थर के हटाये जाने का हुक्म निकालें। प्रशासकीय बुद्धि से विचार कर सुलतान ने कहा, 'जो हुक्म के द्वारा किया गया है, वह वैसे ही समान हुक्म से रद्द नहीं किया जा सकता। क्योंकि उससे लोग यही सोचेंगे कि शाही फरमान झक से प्रेरित होते हैं। पत्थर जहां है, वहीं रहेगा।'
नतीजा हुआ कि सुलतान महमूद के जीते जी वह पत्थर वहीं रहा। और जब वे मरे, तब भी शाही हुक्म के आदर के लिए उसे नहीं हटाया गया।

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

दीया तले अंधेरा--(झेन--कथा) प्रवचन--16

धर्म का मूल रहस्य स्वभाव में जीना है—(प्रवचन—सोलहवां)
दिनांक 6 अक्टूबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।

भगवान!

सेहेई के शिष्य सुईबी ने एक दिन अपने गुरु से पूछा, 'गुरुदेव, धर्म का मूल रहस्य क्या है?'
सदगुरु ने कहा, 'प्रतीक्षा करो। और जब हम दोनों के अतिरिक्त यहां कोई भी नहीं होगा, तब मैं तुम्हें बताऊंगा।'
और फिर उस दिन बहुत बार ऐसे मौके आये जब कि वे दो ही झोपड़े में थे और हर बार सुईबी ने अपने प्रश्न भी दुहराये, लेकिन वह अपना प्रश्न पूरा भी नहीं कर पाता था, कि सेहेई अपने होठों पर उंगली रख कर उसे चुप होने को इशारा कर देते थे।
और फिर सांझ हो गई और सदगुरु का झोपड़ा बिलकुल खाली हो गया। शिष्य ने फिर पूछना चाहा, लेकिन फिर वही होठों पर रखी हुई उंगली उत्तर में मिली।
फिर रात उतर आयी और पूर्णिमा का चांद आकाश में ऊपर उठ आया।
सुईबी ने कहा, 'अब मैं और कब तक प्रतीक्षा करूं?'
तब सेहेई उसे लेकर झोपड़े के बाहर आ गये और उसके कानों में उन्होंने फुसफुसा कर कहा, 'बांसों के ये वृक्ष यहां लम्बे हैं और बांसों के ये वृक्ष यहां छोटे हैं। और जो जैसा है वैसा है--इसकी पूर्ण स्वीकृति ही स्वभाव में प्रतिष्ठा है। और स्वभाव धर्म है। और स्वभाव में जीना धर्म का मूल रहस्य है। शब्द में धर्म की अभिव्यक्ति है--तथाता ९एनबीदमे० और निःशब्द में उसकी अभिव्यक्ति है--शून्यता (विंपकदमे)।'

भगवान! इस झेन बोध-कथा को हमें विस्तार से समझाने की अनुकंपा करें!

सोमवार, 19 जनवरी 2015

दीया तले अंधेरा--(सूफी--कथा) प्रवचन--15

संतत्व का लक्षण: सर्वत्र परमात्मा की प्रतीति—(प्रवचन—पंद्रहवां)
दिनांक 5 अक्टूबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।

 भगवान!

संत रयोकान किसी पहाड़ की तलहटी में एक झोपड़े में रहते थे। अत्यंत ही सादा जीवन था उनका। एक संध्या एक चोर उनके झोपड़े में घुसा, लेकिन उसने देखा कि झोपड़े में तो कुछ भी नहीं है।
इस बीच संत झोपड़े पर वापस आए और उन्होंने चोर को निकलते देख लिया। उस चोर से उन्होंने कहा, 'तुम लंबी यात्रा करके मुझसे मिलने आये, इसलिए तुम्हारा खाली हाथ लौटना उचित नहीं है। कृपा कर भेंट में मेरे अंगवस्त्र लिये जाओ।'
चोर तो बहुत हैरान रह गया। बहुत झेंप के साथ उसने कपड़े लिये और चुपचाप गायब हो गया।
संत रयोकान अब नंगे थे। और नंगे ही बैठ कर आकाश में चंद्रमा को निहारते रहे। और फिर उन्होंने मन ही मन कहा:
'काश, उस गरीब को मैं यह सुंदर चांद भी दिये देता!'

भगवान! इस सुंदर झेन बोध -कथा का मर्म क्या है?

रविवार, 18 जनवरी 2015

दीया तले अंधेरा--(सूफी--कथा) प्रवचन--14

प्रकृत और सहज होना ही परमात्मा के निकट होना—(प्रवचन—चौदहवां)

दिनांक 4 अक्टूबर, 1974
श्री ओशो आश्रम, पूना।

 भगवान!

एक लंबी और थकान भरी यात्रा में, तीन मुसाफिर साथ हो लिये। उन्होंने अपने पाथेय से लेकर सुख-दुख, सबकी साझेदारी कर ली।
कई दिनों के बाद उन्हें मालूम हुआ कि अब उनके पास सिर्फ कौर भर रोटी और घूंट भर पानी बचा है और वे इस बात के लिये झगड़ने लगे कि यह पूरा भोजन किसको मिले? नहीं बात बनी, तो उन्होंने रोटी और पानी को बांटने की कोशिश की। फिर भी वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सके।      
जब रात उतरी तब एक ने सो जाने का सुझाव दिया। तय किया कि जागने पर वह व्यक्ति निर्णय करेगा जो रात में सबसे बढ़िया स्वप्न देखेगा।
दूसरी सुबह सूर्योदय के साथ तीनों मुसाफिर नींद से उठे।     
पहले ने कहा, 'यह मेरा स्वप्न है। मैं ऐसे स्थानों में ले जाया गया, जिनका वर्णन नहीं हो सकता। वे ऐसे अपूर्व, अदभुत और प्रशांत थे। और मुझे एक ज्ञानी पुरुष मिला, जिसने मुझे कहा कि तुम भोजन के हकदार हो, क्योंकि तुम्हारा व्यतीत और भावी जीवन, योग्य और सराहनीय है।'
दूसरे ने कहा, 'आश्चर्य की बात है, स्वप्न में मैंने अपने पूरे अतीत और भविष्य को देखा। और मेरे भविष्य में मुझे एक सर्वज्ञ पुरुष मिला, जिसने कहा कि अपने मित्रों से बढ़कर तुम रोटी के हकदार हो, क्योंकि तुम अधिक विद्वान और धैर्यवान हो। तुम्हारा पोषण ठीक से होना चाहिए, क्योंकि तुम निश्चित मनुष्यों के नेता बनने वाले हो।'
तीसरे यात्री ने कहा, 'मेरे स्वप्न में मैंने न कुछ देखा, न कुछ सुना, और न कुछ कहा। मैंने एक दुर्निवार वर्तमान का अनुभव किया, जिसने मुझे मजबूर कर दिया कि मैं उठूं, रोटी और पानी की तलाश करूं और तत्क्षण उनका भोग करूं। और मैंने वही किया।'

भगवान! इस सूफी प्रबोध कथा को हमें समझाने की करुणा करें।

शनिवार, 17 जनवरी 2015

दीया तले अंधेरा--(बोध--कथा) प्रवचन--13

मृत्यु है जीवन का केंद्रीय तथ्य—(प्रवचन—तेरहवां)


दिनांक 3 अक्टूबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।

 भगवान!

किसी समय एक आदमी के पास बहुत से पशु-पक्षी थे। उसने सुना कि हजरत मूसा पशु-पक्षियों की भाषा समझते हैं। वह उनके पास गया और बहुत हठ करके उसने उनसे वह कला सीखी। तब से वह आदमी अपने पशु-पक्षियों की बातचीत सुनने लगा।
एक दिन मुर्गे ने कुत्ते से कहा कि घोड़ा शीघ्र ही मर जायेगा। यह सुनकर उस व्यक्ति ने घोड़े को बेच दिया ताकि हानि से वह बच जाये। कुछ दिनों के बाद उसने उसी मुर्गे को कुत्ते से कहते सुना कि जल्द ही खच्चर मरने वाला है। मालिक ने खच्चर को भी बेच दिया। फिर मुर्गे ने कहा कि अब गुलाम की मृत्यु होनेवाली है। और मालिक ने गुलाम को भी वैसे ही बेच डाला और बहुत खुश हुआ कि ज्ञान का इतना-इतना फल प्राप्त हो रहा है। तब एक दिन उसने मुर्गे को कुत्ते से कहते सुना कि यह आदमी खुद मर जानेवाला है। अब तो वह भय से कांपने लगा। वह दौड़ता हुआ मूसा के पास पहुंचा और पूछा कि अब मैं क्या करूं?
मूसा ने कहा, 'जाओ और अपने को भी बेच डालो'

भगवान! मेवलाना रूमी की इस बोध-कथा का संदेश क्या है?

शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

दीया तले अंधेरा--(झेन--कथा) प्रवचन--12

मन से मुक्त होना ही मुक्ति है—(प्रवचन—बारहवां)


दिनांक 2 अक्टूबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।


भगवान!
मात्सु साधना में था। वह अपने गुरु-आश्रम के एकांत झोपड़े में, अहर्निश मन को साधने का अभ्यास करता था। जो उससे मिलने भी जाते, उनकी ओर भी वह कभी ध्यान नहीं देता था।
उसके गुरु एक दिन उसके झोपड़े पर गये। मात्सु ने उनकी ओर भी कोई ध्यान नहीं दिया। पर गुरु दिन भर वहीं बैठे रहे और एक ईंट को पत्थर पर घिसते रहे।
मात्सु से अंततः न रहा गया और उसने पूछा, 'आप यह क्या कर रहे हैं?'
गुरु ने कहा, 'इस ईंट का दर्पण बनाना है।'
मात्सु ने कहा, 'ईंट का दर्पण? पागल हुए हैं क्या? जीवन भर घिसते रहने से भी दर्पण नहीं बनेगा।'
यह सुनकर गुरु हंसने लगे और उन्होंने मात्सु से पूछा, 'तब तुम क्या कर रहे हो? ईंट दर्पण नहीं बनेगी तो क्या मन दर्पण बन सकता है?'

भगवान! इस झेन बोध-कथा पर प्रकाश डालने की कृपा करें।

गुरुवार, 15 जनवरी 2015

दीया तले अंधेरा--(झेन-कथा) प्रवचन--11

बुद्धि के अतिक्रमण से अद्वैत में प्रवेश—(प्रवचन—ग्यारहवां)


दिनांक 1 अक्टूबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।

 भगवान!

सदगुरु शुजान ने अपना छोटा डंडा उठाया और कहा:
'अगर तुम इसे छोटा डंडा कहते हो, तो तुम इसके सत्य का विरोध करते हो। और अगर तुम इसे छोटा डंडा नहीं कहते हो, तो तुम इसके तथ्य को अस्वीकारते हो। अब कहो, तुम इसे क्या कहना पसंद करोगे?'

If you call it a short] you oppose its reality. And if you do not call it a short staff, you ignore the face.’

('टिलवन बंसस पजीवतज जिलवन वचचवेम पजे तमंसपजल् : दकपिलवन कव दवज बंसस पजीवतज जिलवन पहदवतम जीम बिज्')

भगवान! झेनगुरु की इस पहेली में निहित अभिप्राय समझाने की अनुकंपा करें।

बुधवार, 14 जनवरी 2015

दीया तले अंधेरा--(सूफी-कथा) प्रवचन--10

श्रद्धा की आंख से जीवित ज्योति की पहचान—(प्रवचनदसवां)
 

दिनांक 30 सितंबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।

भगवान!

एक अंधेरी रात में किसी सुनसान सड़क पर दो आदमी मिले। पहले ने कहा: 'मैं एक दूकान की खोज में हूं जिसे लोग दीये की दूकान कहते हैं।'
दूसरे ने कहा, 'मैं यहां पास ही रहता हूं और तुम्हें उसका रास्ता बता सकता हूं।'
'मैं खुद खोज लूंगा। मुझे रास्ता बता दिया गया है और उसे मैंने लिख भी लिया है।' पहला आदमी बोला।
'फिर तुम इस संबंध में बात ही क्यों करते हो?' दूसरे ने पूछा।
'सिर्फ बात करने के लिये।'
'लेकिन अच्छा रहेगा, किसी स्थानीय व्यक्ति से जानकारी ले लो।'
'जो मुझे बताया गया है उस पर मुझे भरोसा है; वही मुझे यहां तक लाया भी है। मैं किसी और आदमी या चीज का भरोसा नहीं कर सकता।' पहला आदमी बोला।

मंगलवार, 13 जनवरी 2015

दीया तले अंधेरा--(सूफी--कथा) प्रवचन--09

सत्य और असत्य के बीच चार अंगुल का अंतर—(प्रवचन—नौवां)

दिनांक 29 सितंबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।

भगवान!
किसी समय एक शहर था, जिसमें दो समानांतर गलियां थीं। एक दरवेश किसी दिन एक गली से दूसरी गली में जा पहुंचा और लोगों ने देखा कि उसकी आंखों में आंसू हैं।
'दूसरी गली में कोई मर गया है,' एक आदमी ने चीखकर कहा। और तुरंत ही पास के बच्चों ने उसकी बात को सिर पर उठा लिया। वास्तव में हुआ यह था कि दरवेश प्याज छील रहा था।
थोड़ी ही देर में बच्चों की आवाज पहली गली में पहुंच गई। और दोनों गलियों के सयाने इतने दुखी और भयभीत हुए कि उन्हें चीख-पुकार का कारण जानने की हिम्मत भी नहीं रही।
एक समझदार आदमी ने समझाने की कोशिश भी की, कि कारण का पता लगाना चाहिए। लेकिन तब तक लोग इतनी घबराहट और विभ्रम से भर गये थे कि उन्हें इसका होश भी नहीं रहा कि वे क्या कह रहे हैं।

सोमवार, 12 जनवरी 2015

दीया तले अंधेरा--(बोध--कथा) प्रवचन--08

द्वैत के विसर्जन से एक-स्वरता का जन्म—(प्रवचन—आठवां)
 

दिनांक 28 सितंबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।

 भगवान!
झेन सदगुरु बांकेई के विहार के पास ही एक अंधा आदमी रहता था। बांकेई की मृत्यु हुई, तब उस अंधे व्यक्ति ने अपने एक मित्र से कहा:
'क्योंकि मैं अंधा हूं और किसी व्यक्ति के चेहरे का निरीक्षण नहीं कर सकता, इसलिये मुझे उसके चरित्र का निर्णय उसकी आवाज से ही करना होता है। आमतौर से जब मैं किसी को उसकी खुशी या सफलता के लिये दूसरे को बधाई देते सुनता हूं, तो उसमेंर् ईष्या की प्रच्छन्न ध्वनि भी सुनता हूं। और जब दूसरे की विपत्ति में शोक प्रकट किया जाता है, तब मैं उसके भीतर प्रसन्नता और संतोष भी सुनता हूं। मानो शोक प्रगट करनेवाला सचमुच खुश है कि उसकी अपनी दुनिया में कोई उपलब्धि होनेवाली है।
'लेकिन मेरे पूरे अनुभव में बांकेई की आवाज में सदा सच्चाई ही झलकती थी। जब उन्होंने प्रसन्नता प्रगट की, तब मैंने प्रसन्नता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं सुना। और जब उन्होंने शोक प्रगट किया, तो मैंने शुद्ध शोक ही सुना।'

भगवान! इस बोध-कथा पर प्रकाश डालने की कृपा करें।  

रविवार, 11 जनवरी 2015

दीया तले अंधेरा--(झेन कथा) प्रवचन--07

कृत्य नहीं, भाव है महत्वपूर्ण—(प्रवचन—सातवां)


दिनांक 27 सितंबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।

भगवान!
सीरो विहार के सदगुरु होगेन, रात्रि-भोजन के पूर्व प्रवचन करने ही वाले थे कि उन्होंने देखा कि जो बांस की जाली ध्यान के लिए लटकायी गयी थी, वह अभी तक समेटी नहीं गयी है। उन्होंने उसकी ओर इशारा किया और तुरंत दो साधु सभा से उठकर उसे समेटने लगे।
उस प्रकृत क्षण का निरीक्षण करते हुए सदगुरु ने कहा: 'पहले साधु की दशा तो अच्छी है, पर दूसरे की नहीं।'        

भगवान! इस झेन बोध-कथा का अभिप्राय बताने की कृपा करें।

स बोध कथा में प्रवेश के पूर्व कुछ बातें समझ लेनी जरूरी हैं।
एक: जीवन की पहचान बड़े-बड़े कृत्यों में नहीं, छोटे-छोटे कृत्यों में छिपी है। एक क्षण के लिए तो कोई भी शहीद हो सकता है। पूरे जीवन त्याग से जीना बहुत कठिन है। सारी दुनिया देख रही हो तब थोड़ी देर के लिए महात्मा हो जाना बहुत आसान है। कोई न देखता हो--एकांत में, अकेले में, निर्जन में महात्मा होना बहुत कठिन है।

शनिवार, 10 जनवरी 2015

दीया तले अंधेरा--(सूफी संत रूमी ) प्रवचन--06

प्रेम गली अति सांकरी, जा में दो न समाहिं—(प्रवचनछठवां)

दिनांक 26 सितंबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।

 भगवान!
रूमी ने एक गीत में कहा है:
प्रेयसी के द्वार पर किसी ने दस्तक दी।
भीतर से आवाज आई, 'कौन है?'
जो द्वार के बाहर खड़ा था उसने कहा, 'मैं हूं।'
प्रत्युत्तर में उसे सुनाई पड़ा, 'यह घर मैं और तू, दो को नहीं संभाल सकता।'
और बंद-द्वार बंद ही रहा।
प्रेमी तब जंगल चला गया।
वहां उसने तप किया, उपवास किये, प्रार्थनायें कीं।
बहुत चांदों के बाद वह लौटा, और दुबारा उसने वे ही द्वार खटखटाये।
और फिर वही प्रश्न: 'बाहर कौन है?'
पर इस बार द्वार खुल गये। क्योंकि उसका उत्तर दूसरा था। उसने कहा था, 'तू ही है।'

भगवान! मेवलाना रूमी के इस गीत में निहित संदेश को समझाने की कृपा करें।

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

दीया तले अंधेरा--(सूफी-कथा) प्रवचन--05

मृत्यु के सतत स्मरण से अमृत की उपलब्धि—(प्रवचन—पांचवां)

दिनांक 25 सितंबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।

भगवान!
एक दरवेश समुद्र-यात्रा पर था। परिपाटी के अनुसार सभी यात्री एक-एक कर उसके पास गये और उससे नेक सलाह मांगी। दरवेश ने सबको एक ही बात कही:
'मृत्यु के प्रति होश रखो, जब तक मृत्यु को जान ही न लो।' दरवेश-ध्यान का एक सूत्र था यह। लेकिन किसी मुसाफिर को भी यह बात रास नहीं आई।
थोड़ी देर बाद समुद्र में भयानक तूफान उठा। समूचे जहाज में त्राहि-त्राहि मच गई। नाविक और यात्री, सभी घुटनों पर झुक गये और ईश्वर से जहाज को बचाने की प्रार्थना करने लगे। लेकिन इस आतंक के बीच भी दरवेश अनुद्विग्न और शांत बैठा रहा।
फिर समुद्र भी शांत हुआ। तब एक सहयात्री ने दरवेश से पूछा, 'क्या आपने नहीं देखा कि इस खौफनाक तूफान के दरम्यान हमारे और मौत के बीच एक तख्ते से ज्यादा मजबूत कुछ भी नहीं था?'
'हां, मैं जानता था,' दरवेश ने उत्तर में कहा, 'कि समुद्र में ऐसा सदा रहता है। लेकिन जब मैं जमीन पर था, तब भी बराबर देखा किया कि आम जिंदगी में हमारे और मृत्यु के बीच इससे भी कम बचाव है।'

भगवान! इस सूफी बोध-कथा पर प्रकाश डालने की कृपा करें।

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

दीया तले अंधेरा--(झेन कथा) प्रवचन--04

मृत शब्दों से जीवित सत्य की प्राप्ति असंभव—(प्रवचन—चौथा)

दिनांक 24 सितंबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।


भगवान!
एक घुमक्कड़ साधु ने एक बूढ़ी स्त्री से तैजान का रास्ता पूछा। तैजान एक प्रसिद्ध मंदिर है और समझा जाता है कि वहां पूजा करने से विवेक की उपलब्धि होती है।
बूढ़ी स्त्री ने कहा: 'सीधे आगे चले जाओ।'
जब साधु कुछ दूर गया था तो बुढ़िया ने स्वयं से कहा: 'यह भी एक साधारण मंदिर जाने वाला है।'
किसी ने यह बात जोशू से कह दी।
जोशू ने कहा: 'रुको, जब तक मैं जांच-पड़ताल न कर लूं।'
दूसरे दिन जोशू गया, उसने वही सवाल पूछा और बुढ़िया ने वही उत्तर दिया।
जोशू ने कहा: 'मैंने उस बुढ़िया की जांच कर ली।'

भगवान! इस पहेली जैसी झेन-कथा का अभिप्राय क्या है?

बुधवार, 7 जनवरी 2015

दीया तले अंधेरा--(सुफी कथा) प्रवचन--03


समाज की उपेक्षा कर स्वयं में छिपे ध्यान-स्रोत की खोज करें—(प्रवचन—तीसरा)  

दिनांक 23 सितंबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।


भगवान!
किसी पुराने समय में मूसा के गुरु खिद्र ने चेतावनी दी कि एक खास तारीख के बाद दुनिया के सारे पानी का गुण बदल जायेगा और उसे पीनेवाले पागल हो जायेंगे। केवल वे ही लोग सही-सलामत रहेंगे जो थोड़ा पानी अलग बचा कर रख लेंगे और उसे ही पीयेंगे
केवल एक व्यक्ति ने खिद्र की चेतावनी पर ध्यान दिया। उसने थोड़ा पानी बचाकर रख लिया।
निश्चित तिथि के बाद वही हुआ जो खिद्र ने कहा था। और इस एक आदमी को छोड़ कर गांव के सभी लोग पागल हो गये। लेकिन जब उसने लोगों से बातचीत की, तब उसे पता चला कि सब उसे ही पागल समझते हैं।

धीरे-धीरे उसके लिये पागलों के बीच अपना अकेलापन असह्य हो गया और उसने भी नया पानी पी लिया। फिर तो वह यह भी भूल गया कि उसने कुछ शुद्ध जल बचा रखा था। और गांव के लोग कहने लगे कि वह जो एक पागल था उनके बीच, वह भी स्वस्थ हो गया है।

भगवान! इस सूफी कथा का अभिप्राय क्या है, यह हमें विस्तार से समझाने की अनुकंपा करें।

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

दीया तले अंधेरा--(बोधकथा) प्रवचन--02

अकंप चित्त में सत्य का उदय—(प्रवचनदूसरा)


दिनांक 22 सितंबर, 1974.
श्री ओशो आश्रम, पूना।

 भगवान!
दो साधु एक झंडे के बारे में विवाद कर रहे थे।
एक ने कहा: 'झंडा डोल रहा है।'
दूसरे ने कहा: 'हवा डोल रही है।'
तभी छठे कुलगुरु वहां से गुजर रहे थे।
उन्होंने कहा: 'न हवा, न झंडा, मन डोल रहा है।'

भगवान! इस झेन लघुकथा का अर्थ क्या है?

 स बोध कथा में प्रवेश के पहले मन के संबंध में कुछ बातें समझ लेनी चाहिए। पहली बात, कितना ही तेज तूफान हो, सागर की सतह ही कंपित होती है, सागर का अंतस्तल नहीं। ऊपर आंधियां बहें, तो भी लहरें ही डोलती हैं। सागर का अंतस केंद्र बिना डोला ही रहता है।